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व्यंग्य : बेहतर की खोज में बेहतर को खो देना

अक्सर ऐसा होता है कि हालात भले ही कितने अच्छे हों फिर भी ज्यादातर लोग उससे संतुष्ट नहीं होते वे इससे बेहतर की खोज में रहते हैं वो जब उन्हें हासिल नहीं होता तब अपने गुजरे हुए बेहतर हालात का आनंद नहीं उठाने का अफ़सोस प्रकट करते हैं। ऐसे लोग उस जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी जीती हुई रकम इस आस में दाँव पर लगा देता है कि वो जीतकर मालामाल हो जाएगा और जब हारने लगता है तो और%बढ़चढ़कर दाँव पव दाँव लगाता है । फिर पूरी तरह कंगाल होकर ही दम लेता है। जब किसी का अच्छा समय चल रहा होता है तब उसकी उन्पति के रास्ते खुल जाते हैं। और वो यह मान लेता है कि अब कभी असफलता तो उसके पास आएगी ही नहीं यह सफलता की चकाचौंध उसे अभिमानी और बददिमाग बना देती है जिससे उसे शिखर से शून्य तक आने में देर नहीं लगती इसके बाद वो लाख कोशिशें करता है पर कुछ हासिल नहीं होता तब उसे अपार दुख होता है जिसका सबसे बड़ा कारण वो खुद होता है। इसी तरह हम संबंधों को लेकर भी भूल करते हैं। और अच्छे दोस्त की तलाश में अच्छे दोस्त को खो देते हैं फिर कहीं के नहीं रहते  मंजू के बड़े बेटे की बहू सरला अच्छे स्वभाव की थी सबका ख्याल रखने वाल...

व्यंग्य: दुश्मनी का दिखावा

जिस तरह कुख लोग दोस्ती का दिखावा कर दुश्मनी पाले रहते हैं और अवसर की तलाश करते रहते हैं उसी तरह कुछ ऐसे भी होते हैं । जो दुश्मनी का दिखावा करते हैं जिससे उनकी दोस्ती होती है। उससे जाहिर तौर पर दुश्मन की तरह लड़ते हैं । पर यह बहुत बड़े झाँसे बाज होते हैं। इनकी दोस्ती जिससे होति है उसमें छल कपट छिद्र कूट कूट कर भरा होता है वो खुद भी ऐसे होते हैं धोखा दगा इनकी नस नस में भरा होता है यह जिसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं उससे दोस्ती का झूठा दिखावा करते हैं। उसके सामने यह आपस में खूब लड़ते हैं इनमें गर्मागर्म बहस भी होती है कभी कभी तो ऐसे लगता है कि इनमें कहीं खून खराबा न हो जाए अगला बीच बचाव करता है। फिर यह दोनों उससे एक दूसरे की बुराई करते हैं। उसके मन की बात जानते हैं फिर लोग उनके बारे भें क्या सोचते हैं यह मालूम करते हैं। दूसरे दिन शाम को आपस मे एक दूसरे की जान के प्यासे होकर लड़ने वाले गले मे हाथ डालकर घूमते हुए नजर आते हैं। खूब घुट गुटकर बाते करते हैं दोनों की बाते छल कपट भरी होती हैं। इसके बाद यह दोनों मिलकर सबसे ज्यादा क्षति उसे पहुँचाते हैं जिससे यह दोस्ती का दिखावा कर रहे थे। ...

व्यंग्य: हर हाल में संबंधों का निर्वाह जरूरी तो नहीं

कभी कभी रिशते निभाना हमारी गले में अटकी हड़डी की तरह पीड़ा दायक हो जाते हैं फिर भी हम उन्हें निभाते हैं कभी इसकी हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है क्या इस तरह से संबंधों का निर्वाह जरूरी है। कई बार तो इनमें जान दाँव पर लगाने की । नौबत तक आ जाती है। इस संबंध में एक घटना याद आ रही है जिसका उल्लेख करना यहाँ उचित होगा। हरिप्रसाद के साले अनोखी लाल के लड़के का मुंडन समारोह था हरिप्रसाद का उस समय बहुत जरूरी काम पड़ रहा था। साले का व्यवहार भी ठीक नहीं था उसकी इच्छा आयोजन में शामिल होने की नहीं थी पत्नी और बच्चे जा हो रहे थे लेकिन उसकी पत्नी ने ऊँच नीच समझाकर उसे आयोजन में शामिल होने पर विवश कर दिया वो अपना केरियर दाँव पर लगाकर आयोजन में शामिल हुआ वे लोग अच्छे नहीं थे उसकी उन्होंने खास पूछ परख नहीं की। साले का सार्वजनिक नल पर पानी को लेकर एक परिवार से झगड़ा हो गया । झगड़ा इतना बड़ा की साले ने उस महिला के पति पर चाकू से हमला कर दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई । तब हरिप्रसाद वहाँ नही था लेकिन उसका नाम भी हत्या रों के साथ लिखवा दिया गया। उसकी एक नहीं सुनी गई और उसे आजीवन कारावास की सजा हो ...

व्यंग्य: अधूरी खुशियाँ

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे इस दौर ने जहाँ खुशियों की मात्रा घटा दी हैं वहीं खुशियों को भी अधूरा कर दिया है। अभाव में थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती है वहीं संपन्नता में बड़ी बड़ी खुशियाँ भी बौनी हो जाती हैं। जैसे सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार अगर साधारण कार भी खरीद ले तो उसके परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता दूसरी अति संपन्न लोग करोड़ों की कार भी खरीद लें तो भी उनको वैसी खुशी नहीं मिलती ऐसे लोगों को नर्म मुलायम बिस्तर पर भी नींद नहीं आती। जो लोग बुरे काम करते है अनीतीपूर्वक धन कमाते हैं दुखी लाचार बेबस को सताते हैं उनका शोषण करते हैं उनकी हर ख़ुशी अधूरी होती है। खुशियों के मापदण्ड ऐसे लोगों की समझ से परे रहते हैं। जीवन सुख पूर्ण हो आनंद से भरा रहे खुशियाँ हर पल मौजूद रहे ऐसा सभी चाहते हैं पर कितने लोग सुखी रह पाते हैं क्षेत्रीय विधायक कौशल जी के पास आज हर प्रकार की सुख सुविधाएँ हैं फिर भी वे खुश नहीं है। उन्हे रह रहकर अपने वै दिन याद आते हैं। जब वे मजदूर थे तब थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती थी कोई मोटर सायकिल पर बिठा ले तो बहुत मजा आता था। आज ऐसा नहीं होता। आपधापी दौड़धूप भरी जिंदगी मे...

व्यंग्य: समय की करवट

इस बात से तो सभी सहमत होंगे की समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी अच्छा समय होता है तो कभी बुरा और यह कब करवट बदल ले यह कोई जान नहीं सकता। कहते हैं कि समय अच्छा होतो फकीर भी बादशाह बन जाता है और समय अगर खराब हो जाए तो बादशाह को भी फकीर बनते देर नहीं लगती। जरा हम उन लोगों के विषय में सोचें जिनका समय अच्छा चल%रहा है। वे बहुत प्रभाव शाली हैं समाज में उनका रुतबा है मान है पूछ परख है। इससे उनमें अभिमान आ गया है वे खुद को खूब बड़ा समझने लगे हैं लोगों को हिकारत की नजर से देखते हैं किसी की भी बेइज्जती करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता वे घमंडी हो गए हैं इस घमंड ने उनको यह विश्वास दिला दिया है कि वे हमेशा ही ऐसे रहेंगे। इसी भ्रम में वे जी रहे हैं लेकिन वे यह नहीं जानते जब वक्त करवट लेगा तो उनका क्या होगा हरी भरी बेल भी तो आखिर सूख ही जाती है। बुरे वक्त में उनके अपने भी उनका साथ छोड़ जाएँगे गुमनामी की जिंदगी जीना पड़ेगी और अंत बड़ा खराब होगा। लेकिन इसकी वे कभी कल्पना नहीं करेंगे। वे यह मान लेंगे कि ऐसा उनके साथ कभी नहीं होगा । और जब हो जाएगा तो उसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। एक बड़ी क...

व्यंग्य: भाईयों का वैर

एक तरफ जहाँ आपस में भाईचारा रखने की बात होती है दूसरी तरफ सगे भाईयों में भी वैर होता हुआ देखा गया है। इनकी आपस की दुश्मनी देखकर तो दुश्मन भी दंग रह जाते हैं। जमीन जायदाद का बँटवारा तो हो जाता है। लेकिन एक दूसरे की जमीन मकान तो पास पास ही होते हैं कभी खेत की मेढ़ को लेकर तो कभी पालतू पशु द्वारा नुक्सान कर देने पर इनके बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं। यह झगड़े कभी कभी खूनी संघर्ष में बदल जाते है। कभी कभी तो किसी की जान भी चली जाती है। पिछले दिनों अस्पताल जाना हुआ वहाँ रमेश चंद्र जी भर्ती थे जो ठेकेदारी करते थे। उनके सगे भतीजे ने उन पर हमला कर दिया था उनके सिर में बारह टाँके लगे थे अंदरूनी चोट भी लगी थी भतीजे ने उन्हें बेरहमी से पीटा था। उन्हें इस बात का दुख था कि जिसे बड़े लाड़ से पाला था उसी ने बढ़े होकर उन पर जानलेवा हमला कर दिया था। इससे ज्यादा दुख की बात तो यह थी कि उनका सगा भाई भी अपने बेटे का पक्ष ले रहा था । उनकी भाभी जिसका घर उजड़ने से उन्होंने बचाया था उसी के कहने पर उसके बैटे ने रमेश पर जानलेवा हमला किया था। सबसे ज्यादा दुखी तो माँ थी वो रो भी नहीं सकती थी। इस घटना के बाद ...

व्यंग्य: खोटीं की चमक

अक्सर खरे से खोटे ज्यादा चमकदार होते हैं वे अपनी चमक से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं और उनकी चमक से प्रभावित होकर लोग खरे को छोड़कर खोटे को अपना लेते हैं। खरे खोटे की परख तो पारखी ही कर सकता है। और पारखियों की तो वैसे ही कमी बनी रहती है इसिलिए हीरे तो धूल में पड़े रहते हैं और काँच के टुकड़े हीरे मान लिए जाते हैं। यह खोटे लोग खरे को आगे नहीं बढ़ने देते उनके सारे अवसरों को झटक लेते हैं जहाँ पर खरों को होना चाहिए वहाँ ये खोटे नजर आते हैं। सारे सम्मान ये हड़प लेते हैं खरों को जो पदवी मिलना चाहिए ये उसे हासिल कर लेते हैं। एक पत्रिका के संपादक इस बात से दुखी थे कि रचनाओं का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है। अच्छे कवि लेखकों की बड़ी कमी है हमने उनसे कहा कि आप कितने रचनाकार की रचनाएँ छापते हैं वे बोवे मुश्किल से आठ की इसके अलावा कोई स्तरीय मिलता ही नहीं है हमने कहा आप खोज ही नहीं करते। जो आपको सहज उपलब्ध हो गए उनको महत्व दे रहे हैं उनके बारे में जरा छानबीन तो करो वे बोले इतना समय किस के पास है हमारे पास और भी काम है। ये आठ लोग वे थे जिनका ग्रुप बना हुआ था उस ग्रुप में पत...

व्यंग्य: भलमनसाहत की कीमत

प्रायः अनेकों लोग यह कहते हुए मिल जाएँगे कि आज के ज़माने में भलमनसाहत की भी कीमत चुकानी पड़ती है। बहुत सारे अहसान फरामोश ऐसे मिल जाएँगे जो आपके अहसानों का बदला चुकाने की तो दूर की बात है। आपको धन्यवाद देना तक उचित नहीं समझेंगे। कुंजीलाल भले आदमी थे अनोखीलाल उनके दोस्त थे कुंजी लाल संपन्न थे । अनोखीलाल गरीब कुँजीलाल जी ने अनोखीलाल जी पर खूब अहसान किए थे। जिनकी कोई गिनती नहीं। उनका मिलना जब होता था जब अनोखीलाल जी को पैसे की जरूरत पढ़ती थी। अनोखी लाल जी को थोड़ा थोड़ा करते हुए वे अब तक दस लाख रुपये कर्ज में दे चुके थे। आजकल अनोखीलाल का लड़का भी कमाने लगा था। घर में पैसे की आवक हो रही थी मगर%अनोखीलाल जी ने कु॔जीलाल जी का एक भी रुपये का कर्ज अदा नहीं किया था बल्कि उनसे मिलना जुलना ही बंद कर दिया था। अनोखीलाल जी की नीयत में खोट आ गई थी। एक दिन कुँजीलाल जी बहुत दुखी थे कह रहे थे जो मेरा दस लाख रुपये का कर्ज खा कर बैठा है वो लोगों से कह रहा है कि उसने कुँजीलाल पर बहुत अहसान किए हैं कुंजीलाल आज जो कुछ हैं वो उनकी बथौलत है। इस बात से वे दुखी थे उन्होंने अपना पैसा जब अनोखीलाल से वापस म...

व्यंग्य: कोरी दिलासाएँ

दिलासा देने के नाम पर ज़ख्मों पर नमक छिड़कने वाले बहुत मिल जाएँगे ऐसे लोगों में छल कपट रखने वालों की संख्या सबसे ज्यादा होगी ।वहीं कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो आपसे जलते हैं लेकिन जाहिर नहीं होने देते ये मन ही मन आपका बुरा चाहते हैं। जब आपका बुरा होजाए तो इन्हें बहुत खुशी होती है। ये लोग अपनी खुशी को छिपाकर उसको दिलासा देने के बहाने उसके जख्मों को कुरेदने पहुँच जाते हैं उससे झूठा अपनापन दिखाकर सारी बातें जान लेते हैं वो इन्हें हमदर्द समझकर अपने मन की सारी बातें इन्हें बता देते जिसे सुनकर यह भीतर ही भीतर गदगद हो जाते हैं और ऊपरी तौर पर कहते हैं अरे यह तो बुरा हुआ ऐसा नहीं होना चाहिए । और मन ही मन कहते हैं अच्छा हुआ ऐसा ही होना चाहिए।  ऑफिस के सहयोगी वर्मा जी की पत्नी का असामयिक निधन हो गया था वर्मा जी बहुत दुखी थे किसी तरह अपने आँसुओं चो रोके हुए थे। उनके घर मातमपुर्सी करने उनके ही ऑफिस के दिनेश जी आए और उन्हें तसल्ली देने लगे वर्मा जी बड़े सँभलकर उनसे बात कर रहे थे पर दिनेश जी तो कुछ ओर चाहते थे इसलिए वे उनकी भावनाओं को भडकाते हुए बोले आपकी तो दुनिया ही उजड़ गई ।आपके जीवन का सूरज...

व्यंग्य: दोस्तों की तलाश

आज की दुनिया में दोस्ती तो है पर दोस्त नहीं हैं। मतलबी हैं अवसरवादी हैं लोभी है लालची हैं धोखेबाज हैं दगाबाज हैं अगर नहीं हैं तो सच्चे दोस्त नहीं है इस भीड़ में दोस्त गुम हो गए हैं । न कोई सच्ची दोस्ती करना चाहता है न दोस्त बनना चाहता। अगर किसी को दोस्त मान भी लो तो वो इसे हमारी कमजोरी समझ लेगा और फिर हमारी कमजोरियों का खूब लाभ उठाएगा। आप किसी से अपनी तरफ से तो सच्ची दोस्ती कर रहे हैं पर वो आपसे दोस्ती कर रहा है इसकी कोई गारंटी नहीं हो सकता है उसका आपसे कोई मतलब निकल रहा हो इसलिए वो दोस्ती का दिखावा कर रहे है और आप उसे सच्चा समझ रहे हों। मनीष और%नवीन दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। मनीष के पास बाईक थी नवीन बस से कॉलेज जाता था जिसके किराये में उसका बहुत सा पैसा खर्च हो रहा था। इसे बचाने के लिए उसने मनीष से दोस्ती कर ली। दोस्ती क्या दोस्ती का दिखावा करना शुरं कर दिया। कुछ दिनों में ही उसने मनीष से घनिष्ठता चर ली। उसकी भावनाओं से कुछ इस तरह से खिलवाड़ किया कि मनीष उसे अपनी बाइक पर बिठाकर कॉलेज ले जाने लगा नवीन ने मनीष से तो ये कहा कि उसके पिता पर कर्ज है इसलिए वो बस का किराया ...
व्यंग्य बुरा करो या भला आपकी मर्जी ****** हम एक वक्त में एक ही काम कर सकते है॔ या तो किसी का भला करें या बुरा या फि अपना स्वार्थ हल कर लें। हम जो भी कर्म करते हैं उसके जिम्मेदार हम ख़ुद होते हैं उसका फल भी हमें ही भुगतना पड़ता है। जैसे भोज में होता है कोई मिठाई खा रहा होता है कोई तेज मिर्च मसाले वाला समोसा एक वक्त में दो अलग अलग काम हो रहें हैं एक को मिठाई में आनंद आ रहा है । दूसरे का तेज मिर्च मसाले से मुँह लाल हो रहा है आँखों से पानी बह रहा है वो सी सी कर रहा है । परेशान है फिर भी उसे  अच्छा लग रहा है क्योंकि समोसा खाना उसकी इच्छा पर निर्भर था वो चाहे तो मिठाई भी खा सकता था दोनों के परिणाम अलग अलग होते है। जीवन में भला बुरा करने के हमेशा विकल्प रहते हैं। लेकिन कभी कोई विकल्प ही नहीं होता  जो करना है वो करना ही पड़ेगे भले ही हमारी इच्छा हो या न हो भले ही काम नीति संगत न हो। पर जीवन में ऐसी नौबत कभी कभार ही आती है। जीवन को यदि मधुर सुखमय आनंदायक बनाना है तो सबसे मेल जोल बनाए रखने में ही भलाई है। लेकिन जो लोग बार बार मनाए जाने पर भी नहीं मानते तो उनसे मेल जोल कैसे करेंगे...

व्यंग्य: यादों की कसक

इंसान के जीवन में कोई भी घटना शाश्वत नहीं रहती समय कभी नहीं थमता समय गुज़र जाता है लेकिन अपने पीछे अनेक खट्टी मिठी यादें छोड़ जाता है। जो अच्छी यादें होती हैं वो मन को बहुत सुकून देती हैं ।जो कड़वी पीड़ादायी यादें होती हैं उनकी कसक मन को व्याकुल किए रहती हैं। कभी कभी ऐसा भी होता है जब हम कुछ लोगों को खास महत्व देते हैं। उनकी आव भगत और पूछ परख के फेर में हम कई लोगों की तरफ ध्यान तक नहीं देते कुछ लोगों की हम घोर उपेक्षा करते हैं। यहाँ तक कि उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी कर देते हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि समय से अधिक कोई बलवान नहीं है । कब किसी का समय बिगड़ जाए और कब किसी का समय सुधर जाए यह कोई नहीं जानता। जिनकी हमने अतीत में घोर उपेक्षा की थी जिनको अपमानित किया था । वे जब समर्थ बन जाते हैं। सक्षम बन जाते हैं ।समाज में उनकी खूब मान प्रतिष्ठा हो जाती है। लोग उनकी कृपकाँक्षी हो जाते हैं। तब वे लोग उनसे नजरें मिलाने तक की स्थिति में नहीं रहते जो उनकी कभी घोर उपेक्षा करते थे उन्हें हमेशा उनकी औकात याद दिलाते रहते थे अब वे कहीं के नहीं रहते। लेकिन जिनकी वे उपेक्षा करते थे उनका कद बहुत ...

व्यंग्य: ख़ुद को महान समझने वाले

कुछ दंभी खोखले घटिया दर्जे के लोग खुद को महान समझने की गलतफहमी पाल बैठते हैं यह लोग अपने सामने किसी की भी तारीफ बर्दाश्त नहीं कर सकते ये चाहते हैं कि सब इनकी तारीफ करें इसके लिए ये हर हद सू गुजर जाते हैं ये लोग कुछ खुशामदियों को अपने साथ रखते हैं जो इनकी जी भर कर झूठी तारीफ करते हैं।  ऐसे खुशामदिए लोग इनसे अपना स्वार्थ हल करते रहते हैं इनका उनसे कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता जब तक इनका मतलब हल होता रहता है तब तक ये झूठी खुशामद करते रहते हैं। इनका झूठी तारीफ सुनकर दिमाग सातवे आसमान पर पहुँच जाता है ये खुद को महान समझने लगते हैं । पर कोई ऊँट पहाड़ से ऊँचा नहीं होता ऊँट अपने आपको भले सबसे बड़ा समझ ले लेकिन जब वो पहाड़ के नीचे आता है तब उसे अपने कद का अहसास होता है। पर पहाड़ से गुजरने के बाद फिर ये अपने आपको महान समझने लगते हैं। यह लोग झूठ बोलने में माहिर होते हैं अपनी झूफी महानता के किस्से सबको बढ़ चढ़कर सुनाकर दूसरों पर रौब गाँठने में इन्हें खूब मजा आता है। ऐसे लोगों की पीठ फेरते हो लोग इनकी बुराइयों का पुलंदा खोलना शुरू कर देते हैं । दिनेश एक जगह लोगों के बीच में अपनी झूठी महानता...

व्यंग्य: अपमान का घाव

व्यक्ति सब कुछ भूल सकता है हर तरह का घाव भी भर सकता है । पर जो घाव अपमान से दिल को लगता हो वो कभी नहीं भरता उससे जो दर्द होता है वो भी किसी उपाय से बंद नहीं होता।जो अपने अपमान का बदला ले लेते हैं वे भी अपने अपमान को भूल नहीं पाते। किसी का अपमान अगर सार्वजनिक रूप से किया जाए तो वो अत्यंत दुखदायी होता है। जो सबसे ज्यादा दर्द देता हैं । कुछअहंकारी लोग जो अपने सामने सबको कमतर समझते हैं । वे किसी का भी अपमान करने में जरा भी नहीं हिचकते ऐसे लोग तो अपमानित करके भूल जाते हैं लेकिन अपमानित व्यक्ति उस अपमान को कभी नहीं भूलता । जिनका ये अपमान नहीं कर सकते उसे ताने देते हैं या दूसरों को माध्यम बनाकर उनको अप्रत्यक्ष रूप से अपमानित करते हैं। अक्सर ये लोग अपने से छोटे कमजोर दुखी लाचार बेबस का सबसे ज्यादा अपमान करते हैं उसके सामने कभी इज्जत से पेश नहीं आते जो दबा हुआ होता है वो अपना अपमान चुपचाप सह तो लेता है पर उसे कभी भूल नहीं पाता। जो लोग अपमान का बदला नहीं चुका पाते वे बददुआ देते हैं रात दिन कोसते रहते हैं और जब संयोग से कुछ अप्रिय घटित हो जाए तो इसे अपनी बददुआ को फलीभूत मानकर ख़ुश हो लेते हैं।...

व्यंग्य: आखिर कब आएगा अच्छा समय

ज्यादातर लोग इसी उम्मीद में अपनी जिंदगी को जीते रहते हैं कि कभी तो उनका अच्छा समय आएगा। ऐसे लोग वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। कल जो गुजर गया उसको दुहराना नहीं चाहते और भविष्य से उम्मीदें रखे रहते हैं। ऐसा करते करते सारा समय बीत जाता है। जब जिंदगी का आखिर पढ़ाव आ जाता है तब व्यक्ति अपने गुजरे हुए वक्त का आकलन करता है तड उसे पता चलता है कि जो समय गुजर गया उसी में ही अच्छा समय भी था जिसकी हमने कीमत नहीं की और भविष्य में और बेहतर%समय आने की प्रतीक्षा करते रहे जो कभी नहीं आया अब जो समय आ रहा है ये तो पहले से भी खराब है और जो आने वाला है वो और खराब होगा। बुढ़ापे ने अपना शिक॔जा कस लिया शरीर को बीमारियों ने जकड़ लिया है मिठाई खाने के दिन जा चुके हैं अब तो मिठाई से कई गुना ज्यादा मँहगी कड़वी दवाइयाँ खाना पड़ रही हैं यात्रा कर नहीं पा रहे पैसा भी कमा नहीं पा रहे हैं जो पेंशनर हैं उनकी पेंशन का बड़ा भाग गोली दवाओं में खर्च हो रहा है। जिनके पास बुढ़ापे में खूब धन संपदा है वे भी दुखी हैं वे अब उसका भोग नहीं कर पा रहे हैं दो रूखी रोटी और%कम मिर्च तेल मसाले की सब्जी खाकर रहना पड़ रहा है। यह बात...

व्यंग्य: चमकदार खोटे

यह बात तो सभी कहते हैं कि जो खोटा होता है । उसमें खरे से ज्यादा चमक होती है। और जो पारखी नहीं होते वे खोटे को खरा समझ लेते हैं और खरे को खोटा ये उनकी भूल होती है जिसका नुक्सान ही उठाना पड़ता है। उनकी सोच से समझ से न कभी खोटा खरा हो सकता है न खरा खोटा। पारखी इनको अलग अलग कर देता है।  इसी तरह लोग भी होते हैं जो झूठा होता है वो उसे सच्चा साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । जबकि सच्चा कभी अपनी सच्चाई को प्रचारित नहीं करता। जो दुश्मनी को छिपाकर दोस्ती का दिखावा करते हैं। उसकी दोस्ती को लोग सच्ची समझ लेते हैं उनका यह भ्रम जब तक दूर नहीं होता तब तक वे अपनी दुश्मनी निकालने में सफल नहीं हो जाते।  किशोर इसी तरह का फर्जी आदमी था उसकी बोली जितनी मीठी थी उतना ही कड़वा उसमें जहर भरा था। वो सबका लाभ उठा लेता था। पर उसका क ई लाभ नहीं उठा सकता था। लोग उसकी बातों के सम्मोहक जाल में फँसकर छटपटाते रहते थे जिसे देखकर उसे पैशाचिक आनंद की प्राप्ति होती रहती थी। ऐसे लोगों में ईर्ष्या छल कपट लोभ मोह अभिमान कुटिलता कूटकूटकर भरी होती है। इनसे तो सँभलकर रहना ही ठीक है। मगर ऐसा हो नहीं पाता ये लोग ब...

व्यंग्य: हर किसी से राज की बातें मत कहो

कुछ लोग अपने कुछ दोस्तों को बहुत करीबी समझते हैं उनसे कोई बात नहीं छिपाते अपने मन की सारी बातें उन्हें बता देते हैं। जो उनके लिए बहुत नुक्सानदायक साबित होती हैं। जिसका खामियाजा उन्हें जीवन भर भरना पड़ सकता है। कुछ राज की बातें तो ऐसी होती हैं जो किसी भी हाल में किसी भी परिस्थिति में कभी किसी को भी नहीं बताना चाहिए। अपने निकट से निकटतम परिजन को भी नहीं कसम खाकर या कसम देकर राज की बातें बताने वाले भी परेशानी में पड़ते हुए देखे गए हैं। राजेश और सोमेश दोनों गहरे दोस्त थे। राजेश अपने मन की सारी बातें सोमेश को बता देता था । ऐसी कोई राज की बात नहीं थी जो सोमेश को नहीं मालूम हो दोनों रोज शाम को मिलते थे और खूब फातें करते थे दोनों का जी हल्का हो जाता था। राजेश व्यवसायी था और सोमेश सरकारी नौकरी करता था राजेश दौलतमंद था और सोमेश मध्यप वर्गीय। जितना सोमेश को साल भर में वेतन मिलता था उससे अधिक का तो वो इन्कम टेक्स भरता था। फिर भी राजेश सोमेश को बराबरी का दर्जा देता था एक दिन किसी बात पर उनके बीच मतभेद पैदा हो गए। कुछ कहा सुनी भी हुई बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए थे त...

व्यंग्य: कसर निकालने वाले

कुछ कपटी कुटिल लोग अपनी दुश्मनी को कुछ इस तरह छिपाकर रखते हैं कि दुश्मन को इसका अहसास जरा भी नहीं हो पाता। ये अपने दुश्मन से दोस्ती का दिखावा करते हैं क्योंकि खुलकर दुश्मनी करना इनकी फितरत नहीं होती ऐसे लोग अपनी कसर निकालने का अवसर तलाशते रहते हैं। और जैसे ही इन्हें मौका मिलता है ये अपना हिसाब बराबर कर लेते हैं। ऐसे लोग बड़े खतर नाक होते हैं साँप और बिच्छू से भी ज्यादा । क्योंकि साँप के तो मुँह में जहर होता है और बिच्छू की पूँछ से साँप से भी बचा जा सकता है और बिच्छू से भी बचा जा सकता है। पर ऐसे कुटिल कपटी दुश्मन से बचना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकी इनके तो मुँह में भी जहर होता है तथा पूँछ में। जब पूँछ से डँसते हैं तो जानलेवा तड़फाते हैं और मुँह से डँसते हैं तो काम तमाम ही कर देते हैं। समझदार लोगों को इनकी पहचान होती है वे इनकी फितरत से अच्छी तरह वाकिफ रहते हैं इसलिए वे इनका शिकार नहीं बन पाते । बाकी जो भावुक सीधे सादे दयालु टाइप के इंसान होते हैं वे इनका शिकार आसानी से बन जाते हैं। गाँव के सजनसिंह तथा रजन सिंह दोनों मित्र थे सजन सिंह संपन्न थे सपष्ट वादी थे साफ दिल के थे अच्छी ब...

व्यंग्य: हमेशा तनाव में रहने वाले

जो हमेशा तनाव में रहते वे कभी खुलकर हँस नहीं पाते वे लोग चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं जो उनके संपर्क में आते वे उनके चेहरे की मुस्कान को भी छीन लेते हैं। इनको पूरे ज़माने से शिकायत रहती है। ऐसे लोगों के अनुसार दुनिया निकम्मे कामचोर और लापरवाह मसखरे लोगों से भरी हुई है। यह सबके काम में मीन मेख निकालते हैं जबकि खुद कोई काम ठीक से नहीं कर पाते। ऐसे लोग जब हँसते हैं तो उनकी हँसी में कुटिलता छिपी रहती है। लोग इनसे बचकर रहना पसंद करते हैं क्योंकि यह किसी की भी बेइज्जती सबके सामने करने में जरा भी नहीं हिचकते।  ऐसे ही एक व्यक्ति हैं चतर सिंह आजकल उनकी हालत बड़ी खराब वे एक छोटे शहर में रहते हैं जहाँ एक दूसरे को सब अच्छी तरह से जानते हैं। उनके स्वभाव के कारण शहर के दुकानदारों ने उन्हें सामान देना बंद कर रखा है। उन्हें देखते ही दुकानदार हाथ जोड़कर%खड़े हो जाते हैं और कहते हैं माफ कीजिए आपके लायक मेरी दुकान में कोई सामान नहीं है। वे ही चतर सिंह अपने संबंधी की बिटिया का रिश्ता पक्का करने दूसरे शहर में गए थे। वहाँ किसी ने उन्हें बाजार से रसगुल्ला लाने के लिए भेज दिया। वहाँ दुकानदार से इस...

व्यंग्य: झूठी सहानुभूति जताने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके हितैषी बनने का दिखावा करते हो पर भीतर से वो आपका भला होते हुए देखना नहीं चाहते। कई बार यह हमें नुक्सान पहुँचाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं लेकिन कभी खुलकर सामने नहीं आते । ऐसे लोग हमारा बना बनाया काम बिगाड़कर फिर हमारे सामने झूठी सहानुभूति दिखाने आते हैं । अपनी खुशी को भीतर छिपाकर। फिर दुख प्रगट करते हुए सारी जानकारी प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग हमारे दोस्त भी हो सकते हैं। परिचित भी हो सकते हैं। हमारे निकट संबंधी भी हो सकते हैं जिनके बारे में हम सपने में भी यह नहीं सोच सकते कि यह ऐसे होंगे। यह हमारा सौदा फेल करा देंगे। रिश्ता तुड़वा देंगे दोस्त से झगड़ा करा देंगे सुलझते मामले को उलझा देंगे। अपने किए का इल्जाम दूसरों पर मढ़ देंगे।  राकेश और मोहन दो दोस्त थे। राकेश के पास निजी मकान था मोहन किराये के घर में रह रहा था। राकेश इसी बात को लेकर उसकी खिल्ली उड़ाया करता था। औरों के सामने नीचा दिखाता रहता था। इससे तंग आकर मोहन ने एक फ्लेट खरीदने का विचार किया। फ्लेट देख भी लिया वो उसे समझ में भी आ गया उसका सौदा भी हो ही गया था। उस फ्लेट के विषय में मोहन ने ...

व्यंग्य: समय की करवट

समय कब किस का कौन सी करवट बदल ले ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता । समय अगर मेहरबान हो तो रंक को राजा बनने में देर नहीं लगती वही समय अगर करवट बदल ले तो राज भी रंक बन जाता है। कई नगर सेठ दर?दर के भिखारी बनते हुए देखे गए हैं। एक किसान के खेत पर जाने का अवसर मिला उसके खेत में एक लगभग पचास वर्ष का मजदंर काम कर रहा था। खेत मालिक ने उसके विषय में बताया कि ये भी इसी गाँव का है इसके पास सौ एकड़ जमीन थी शानदार हवेली थी पचासों नौकर चाकर इसके यहाँ काम करते थे कभी इसका बड़ा रुतबा था आसपास के पच्चीस गाँवों में इसकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी । लेकिन समय ने करवट बगली इसके हालात बिगड़े और ये मिटता चला गया। अंत में सब कुछ बिक गया न जमीन रही न जायदाद एक छोटी सी झुग्गी में रह रहा है सबने इसका साथ छोड दिया है सारा रुतबा खत्म हो गया है। खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। इसलिए कहा गया है कि समय सबका एक सा नहीं रहता किसी का समय अच्छा होता है तो किसी का बुरा। जो बीज जमीन में पडकर अंकुरित होकर ऊग आते हैं। वे बड़े होकर फल फूल जाते हैं बाकी असंख्य बीच चक्की में पिसकर आटा में बदल जाते हैं जो भोजन में ब...

व्यंग्य: उधारी की आदत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें मजबूरी में उधार लेना पड़ता है। दूसरी ओर कुछ लोग आदतन उधार लेने वाले होते हैं जिनको उधारी की आदत पड़ जाती है वे हमेशा आर्थिक संकट से घिरे रहते हैं उनका खर्च आय से अधिक होता है जिससे वे उधारी के दललद में हमेशा हो फँसे रहते हैं ।जो उधारी लेकर वापस नहीं करते उनकी हालत और भी अधिक दयनीय हो जाती है। ऐसे लोग भरोसा तोड़ देते हैं फिर उन्हें उधार देने वाला कोई नहीं मिलता। जिनका यह पैसा खा चुके होते हैं उनसे इन्हें बचकर रहना पड़ता है अगर इनका कभी उधारी वसूल करने वाले से सामना हो जाए तो फिर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपने अपमान को सहन करना पड़ता है। सोहन और रोहन एक ही ऑफिस में नौकरी करते थे । दोनों का वेतन भी बराबर था उस वेतन में सोहन का तो आराम से गुजारा चल जाता था पर रोहन हमेशा आर्थिक संचट से घिरा रहता था उसने सोहन से भी कर्ज ले रखा था जिसे वो लौटाने का नाम भी नहीं लेता था जिस दिन उसे वेतन मिलता था उस दिन उसके यहाँ उधारी वसूल करने वालों की भीड़ लगी रहती थी उसने बैंक से भी लोन ले रखा था जिसकी किश्त में उसके वेतन का बड़ा हिस्सा चला जाता था। सोहन का कहीं कोई उधारी का ख...

व्यंग्य: समस्या निवारक

हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएँ आती हैं जिनका सामना उसे करना ही पड़ता है । लेकिन कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जो उसे विचलित कर देती हैं जिसका समाधान उसे सूझता नहीं है। वह बार बार कोशिश करता है फिर भी उसे हल नहीं सूझता। और वो परेशान हो जाता है। ऐसी स्थिति में कुछ इतने सूझबूझवाले और समझदार लोग होते हैं जिनके पास हर समस्या का समाधान होता है । वे भी हमारे आस पास ही होते हैं जब उनके पास समाधान के लिए जाते हैं तो वे हमें ऐसे हल सुझाते हैं कि हम भी चकित रह जाते हैं। वे हमारी समस्या का समाधान कर के हमें चिंतामुक्त कर देते हैं। जबकि उनका तो यह स्वभाव ही होता है कोई भी उनके पास समस्या लेकर आता है तो वे बिना किसी भेदभाव के सच्चे मन से उसकी समस्या का समाधान बताते हैं। और इसी में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। रमेश जी ने पहली बार सरपंच का चुनेव लड़ा था और वे चुनाव जीत गए थे । सरपंच का पदभार भी उन्होंने ग्रहण कर लिया था। इसके बाद उनके ग्राम के स्कूल में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन होना था। उसमें उन्हें ध्वजारोहण करना था तथा भाषण भी देना था भाषण उन्होंने अपने जीवन में कभी दिया नहीं था भाषण कैसे दें यह...

व्यंग्य: हारने वाले की पीड़ा

चुनाव में जिनकी जीत होती है उनके तो जलवे ही निराले होते हैं पर जो चुनाव हार जाते हैं उनकी पीडा का बखान नहीं किया जा सकता है हारने वाला जिस दौर से गुजर रहा होता है इस विषय में सोचते ही दिल?काँप जाता है ।हार का अंतर अगर बहुत कम रहा हो तो हारने वाले की पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है । हारने वाला भी चुनाव में खूब खर्च करता है लगभग दीवालिया हो जाता है। जीतने वाला तो अपना खर्च वसूल कर ही लेता है। लेकिन हारने वाले के माथे पर तो सारा खर्च ही मढ़ जाता है। रतन सिंह ने विधायक का चुनाव लड़ा था सुनते हैं कि टिकट के लिए उन्होंने पूरे पाँच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसके बाद पंरे दो महीने उन्होंने अथक परिश्रम किया पानी की तरह पैसा बहाया उनका हाईवे वाला ढाबा बिक गया दो बसें बिक गईं पूरी जमा पूँजी खर्च हो गई । उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा था ढोल ढमाके मिठाई सबकी व्यवस्था उन्होंने कर ली थी। मतगणना शुरू हुई वे दोपहर तक लीड बनाए हुए थे दोपहर बाद बराबरी पर आ गए आखिरी राउंड में आठ सौ मतों से पीछे रह गए। सारे सपने चकनाचूर हो गए कोई उनके पास नहीं रहा अकेले घर आए । दुख के साथ इस बात की उन्हें कसक थी कि उनका भरो...

व्यंग्य: मोह का टूटना

हर घटना का वक्त निर्धारित होता है। उसी तरह हम भी लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह पाते। अक्सर हम जिस शहर में रहते हैं जिस मोहल्ले में रहते हैं जिस घर में रहते हैं उससे हमें मोह हो जाता है वहाँ रहने वालों से भी हमारा मोह होता है। उनमें से कुछ हमारे बचपन के साथी होते हैं। कुछ दोस्त होते हैं । कुछ रिश्तेदार जिनके बीच हम रहते हैं उनमें जो बिछड़ जाते हैं उनके बिछड़ने का हमें दुख होता है। सबसे ज्यादा पीड़ा हमें तब होती है जब हमारा प्रिय जन इस दुनिया को छोड़कर ही चला जाता है। बेबालाल जी सेवानिवृत्त पोस्टमेन थे वे जिस शहर के रहने वाले थे वहीं उनकी नौकरी लग गई थी वे जिस मोहल्ले में रहते थे वहाँ आपस मे बहुत भाई चारा था वहाँ उनका पैतृक मकान था पूरा परिवार उसमें सुखपूर्वक रहता था बाबूलाल जी भी रिटायर होने के बाद वहाँ खुश रहते थे क्योंकि वहाँ उनके हम उम्र बहुत थे जिनसे उनकी मेल मुलाकात होती रहती थी उनके बच्चे आधुनिच सोच के थे उन्हें वो घर असुविधाजनक लगता था वे शहर की पॉश कॅलोनी में घर लेना चाहते थे पर इतने पैसे उनके पास नहीं थे उन्होंने पिताजी पर दवाब डाल कर वो पुशूतैनी घर बिकवा दिया जिस दिन उन...

व्यंग्य: ख़ुशी और ग़म के अलग अलग हिसाब किताब

दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसके पास ख़ुशी ही ख़ुशी हों ग़म बिल्कुल हों हीं नही। या किसी के पास गम ही गम हो खुशी बिल्कुल हो नही हो । खुशी और गम साथ साथ चला करते हैं पर इनके हिसब किताब अलग अलग होते हैं। किसी से किसी की क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। वर्मा जी को शराब की लत थी वे सरकारी नौकरी करते थे लडका बेरोजगार था उसे नौकरी मिल नहीं रही थी वर्मा जी के वेतन का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था वे किराये के मकान में रह रहे थे अधिक शराब के सेवन से उनका लीवर खराब हो गया किडनी फेल हो गईं। और वे रिटायरमेन्ट के एक साल पहले ही परलोक सिधार गए उनकी मौत से सब दुखी थे। यह दुख तो कभी दूर नहीं हो सकता था पर इस दुख के साथ बहुत सारी खुशियाँ भी आ गई थीं वर्मा जी को फन्ड ग्रेच्यूटी बीमा जीपी एफ के रूप में एक बड़ी रकम उनकी पत्नी को मिली थी इसके अलावा पेंशन भी अच्छी मिल रही थी लड़के को अनुकंपा नौचरी मिल गई थी फंड के पैसों से उन्होंने मकान खरीद लिया था लड़के की शादी हो गऍई थी। यह सब खुशियाँ उन्हें मिली थीं भले ही वे ये खुशियाँ खुलकर नहीं मना सकते थे पर इनकी अनुभूति तो उन्हें हो ही रही थी। जैसे सुब्ह किस...

व्यंग्य: विपरीत स्वभाव के रिश्तेदार

रिश्तेदार अगर एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत हों तो रिश्ते भी असहज हो जाते हैं। और यदि पति पत्नी स्वभाव के विपरीत हों तो दाम्पत्य गीवन कष्टदायी हो जाता है। अक्सर बाप बेटे एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत देखे जाते हैं। ऐसा होने पर बाप बेटों में मतभेद हमेशा कायम रहते हैं और ये उनकी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बनते हैं फिर उनमें जनरेशन गेप तो होता ही है जो उनमें दूरिया पैदा करता है। कई बार देखा जाता है कि पिता जिम्मेदार है ईमानदार है कर्तव्य परायण है सिद्धान्तवादी है नियम का पक्का है । अनुशासन प्रिय है तो उसका बेटा उसके एक दम विपरीत होगा वो लापरवाह होगा उसका रवैया गैर जिम्मेदाराना होगा अनुशासन होगा ही नहीं कोई काम ठीक से नहीं करेगा कोई सिद्धान्त नहीं होंगे जुबान का सच्चा भी नहीं होगा उसके पिता से उसकी कभी नहीं बनेगी। ऐसे ही एक कृषि विभाग में अधिकारी थे संतोष जी उनकी दो बेटियाँ थीं उनकी शादी उन्होंने कर दी थी वे एक सिद्धानूतवादी ईमानदार व्यक्ति थे उनका लड़का था रोहित वो माँ का लाड़ला था उसका स्वभाव उसके पिता से विपरीत था पढ़ाई लिखाई में उसकी रूचि नही थी । वो पिताजी से हमेशा रुष्ट रहता था। उस...

व्यंग्य: मतलबी यार

आज के इस दौर में मतलबियों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। ऐसे मतलबी लोग संवेदना शून्य होते हैं इनमें न दया होती है न सहानुभूति भीतर से यह पूरी तरह भाव शून्य होते हैं।   जब तक इनका किसी से कोई मतलब न निकलता हो तब तक यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते जान पहचान के होते हुए भी हालचाल तक नहीं पूछते। लेकिन जैसे ही इनका मतलब निकलता है। वैसे ही यह सकिय हो जाते हैं उसे अपना घनिष्ठ बना लेते हैं ऐसा जाहिर करते हैं जैसा आपका उनसे बड़ा हितैषी कोई और हो ही नहीं सकता। इनका आकर्षण इतना ज्रबर्दस्त होता है कि लोगों की सोच ही गुम हो जाती है यह भतलबी जब तक अपना मतलब पूरी तरह हल नहीं कर?लेते तब तक वे आपको अपने आकर्षण के जाल में फँसाए रखते हैं उनकी सम्मोहिनी से आप बाहर ही नहीं निकल पाते जब उनका मतलब पूरा हो जाता है और सम्मोहन टूटता है तब व्यक्ति अपने आपको ठगा सा महसूस करता हैं उसे बहुत अफसोस होता है तब तक देर हो चुकी होती है। प्रकाश चंद्र इसी तरह के इंसान थे मतलब के आगे उनके रिश्तों की कोई अहमियत नहीं थी। उनका कोई सगा नहीं था वे सिर्फ मतलब से ही वास्ता रखते थे उनकी सगी बहन सरला को मकान खरीदना थ...

व्यंग्य: शंका और दुविधा

शंका और दविधा हर व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आती है। जो लोग शंकाओं से घिरे रहते हैं दुविधाओं में पड़े रहते हैं। वे चाहकर भी कोई काम नहीं कर पाते और बाद में सिवाय पछतावे के उनके पास और कुछ नहीं बचता । कहने वाले कहते हैं कि बुरे काम करने से पहले हज़ार बार सोचना चाहिए । और उसे टालने की सूरत निकालना चाहिए अगर टल जाए तो खुश होना चाहिए । इसके विपरीत अगर भला काम करना हो तो उसे करने में देरी नहीं करना चाहिए भला काम करने में सोच विचार की अधिक जरूरत?नहीं होना चाहिए भला काम करने से खुशी होती है साथ ही अदभुत आनंद की प्राप्ति भी। यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। हमारी सूझबूझ और समझ हमारे अंदर शंका उतूपन्न नहीं होने देती और जब शंका नहीं रहती तो विश्वास का जन्म होता यह विश्वास ही हमें सफल बनाता है। दुविधा में पड़े हौए लोग विश्वास को खो बैठते हैं। जिससे वे आगे नहीं बढ़ पाते और अपने विकास को अवरुद्ध कर लेते हैं। एक व्यापारी ने प्याज और लहसुन के वूयापार में चार महीने में चालीस लाख रुपये कमाए और दूसरे व्यापारी ने उसी व्यापार में बीस लाख का घाटा उठाया इसमें शंका तथा दुविधा प्...

व्यंग्य: अहं पर चोट

अक्सर जो अहंकारी होते हैं उनके अहं पर सबसे ज्यादा चोट लगती है। ऐसे लोग हमेशा विचलित रहते हैं इसका फायदा भतलबी उठाते हैं वे अहंकारी के अहं को संतुष्ट करते हुए उससे लाभ उठाते रहते हैं जब तक उसे इसका अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है।  जो बड़े पद पर होते हैं वो अगर अभिमिनी हों तो वे सबकी परेशानी का कारण बन जाते हैं। जैसे कोई बड़ा साहब अपने अधीनस्थ को डाँट रहा हो उसे निकम्मा नकारा कह रहा हो उसके खिलाफ कार्यवाही की धमकी दे रहा हो तो अधीनस्थ का परेशान होना स्वाभाविक है बड़े साहब ने अपने अधीनस्थ को बुलाया और काम सौंपते हुए कहा कि दो दिन के अंदर काम पूरा करना है अन्यथा तुम्हारे खिलाफ सख्त कार्यवाही करूँगा अधीनस्थ ने खूब कहा कि यह अकेले के बस का काम नहीं है आप दो दिन की बात कर रहे हैं यह तो दस दिन में भी पूरा नहीं वाला इस पर साहब आग बबूला हो गए और अंतिम निर्णय देते हुए बोले कुछ भी हो दो दिन में काम पूरा होना इससे अधीनस्थ डिप्रेशन में आ गया काम पूरा नहीं होना था। साहब ने सख्त कार्यवाही कर उसकी वेतन वधद्धि रोक दूसरे को काम सौंपा वो भी नहीं कर पाया उसका भी यही हाल हुआ जब तीसरे को शिकार...

व्यंग्य: सुखों के दौर के साथी

कहते हैं जब वक्त अच्छा हो और पास में भरपूर सुख हों तो बहुत से ऐसे होंगे जो आपके खास साथी बनकर रहेंगे वे आपके साथ खूब मजे करेंगे आप से हर तरह का लाभ उठाएँगे आप को ऐसी चपत लगाएँगे जिसका अहसास तक आपको नहीं होगा । आप भी इनको अपना सबसे बड़ा हितैषी मान लेंगे ऐसे लोग सच्चे हितैषियों को आपके पास भी फटकने नहीं देंगे। लेकिन इनसे बड़ा घातक कोई नहीं ये ऊपरी तौर पर संवेदन शील बनेंगे भीतर इनमें जज्बात नाम की कोई चीज नहीं होगी। कुंदनलाल जब क्षेत्रीय विधायक थे तब उनके यहाँ समर्थकों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी उनमें से कुछ तो उनके बहुत करीबी थे जो उनसे कई प्रकार के उचित अनुचित लाभ उठाते रहते थे वे भी यही सोचते थे कि उनके पास शुभचिंतको की ऐसी भीड़ है जो किसी भी हाल में उनका साथ नहीं छोड़ेंगे वही कुन्दनलाल जी जब चुनाव में पराजित हो गए । तो सारे हितैषी सारे शुभचिंतक नदारद हो गए कोई हालचाल पूछने वाला नहीं रहा। अकेले अपनी हार का वे शोक मना रहे थे और उनके अनेक कथित सच्चे हितैषी जीतने वाले के जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे । वे जब पॉवरलेस हो गए तो उनकी पूछ परख करने वाला कोई न रहा। इसलिए कहा गया है कि सच्चे ...

व्यंग्य: गलतफहमी चा शिकार

हमारे आसपास अक्सर ऐसे कई लोग मिल जाएँगे जो यह मानकर चलते हैं कि उनके बिना किसी का काम नहीं चल सकता ऐसे लोग अपने आपको महत्वपूर्ण मानकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। ये फिर अभिमानी हो जाते हैं इनकी काफी पूछ परख करना पड़ती है। यह लोग अक्सर एटीटयूड में रहते हैं कई बार ये दूसरों की बेइज्जती करने में भी संकोच नहीं करते। लोग इनको यह सोचकर बर्दाश्त कर लेते हैं क्योंकि उनका कोई विकल्प उन्हें नजर नहीं आता। वे इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाते हैं ऐसे लोग हर जगह आपके भिल जाएँगे। सामजिक संगठन हों या घर परिवार या संस्थाएँ अथवा प्रतिष्ठान हों यह कई बार तो अपनी मनमानी पर उतर आते हैं। ऐसे लोगों का अभिमान भी चूर चूर होतः है। उमानाथ जी ऐसे ही व्यक्ति थे वे एक संस्था में पदाधिकारी थे। और सर्वेसर्वा बनकर रहते थे वे सभी पर अपने निर्णय थोपते थे। संस्था के अन्य सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को यह अहसास कराते रहतः थः कि उनके दम पर यह संस्था चल रही है वो जिस दिन इस संस्था से हट जाअःगे उस दिन यह संस्था भी खत्म हो जाएगी। यह बहुत दिनों तक चलता रहा फिर एक बार ऐसी स्थिति निर्मित हुई जो उनको अप्रिय लगी उन्होंने इसे...

व्यंग्य: मज़बूरी का अनुचित लाभ उठाने वाले

एक ओर दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो दुखी लाचार बेबसों की मदद करते हैं और उनकी मद करके खुश होते हैं दंसरी ओर ऐसे लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है। जो दुखी कमजोर और मज़बूर लोगों का अनुचित लाभ उठाते हैं उन्हें लूटकर ठगकर खुश होते हैं ऐसे लोगों में इंसानियत बिल्कुल नहीं होती न ही इनमें जमीर होता है ये अपनी ठगी के किस्से दूसरों को बढ़चढ़कर सुनाते हैं।  । ऐसा ही एक उदाहरण याद आ रहा है जो इस प्रकार है। रमेश के पास मिनी ट्रक था ।उसका वो खुद ही ड्राइवर था । उसका उसने अच्छी तरह मेन्टीनेन्स कर रखा था घर में कमाने वाला एक वही था । अचानक वो गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसके इलाज में बहुत से रुपये खर्च हो गए । जब वो ठीक होकरआया तो बहुत कमजोर था घर में कुछ भी नही था कर्ज भी हो गया था। उसकी मज़बूरी का फायदा उसके ही परिचित सोमेश ने उठाया उसका पाँच लाख का मिनी ट्रक उसने दो लाख रुपये में खरीद लिया। वो तो ड्राइवर से ट्रक मालिक बन गया और रमेश ठीक होकर?ड्राइवर बन कर अपने परिवार का पालन कर रहा था। इसी तरह कुछ मानवता विहीन ऐसे लोग भी हैं । जो मजबंरों को बीस परसेन्ट प्रतिमाह ब्याज की दर से कर्ज देते ...

व्यंग्य: अनजानी वक्त की बर्बादी

जो लोग यह सोच कर किसी काम में अपना वक्त खर्च कर रहे हैं कि यही समय का सही उपयोग है शायद उन्हें नही मालूम की वो ऐसा कर के अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हों ।कुछ लोग यह तय ही नहीं कर पाते कि उनकी ज़िंदगी का मक़सद क्या है। जिन्हें वे समझदार समझते हैं वो उन्हें जैसा बताते हैं वैसा ही करने लगते हैं खुद का दिमाग नहीं लगाते । ऐसा करते हुए जब बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है तब उन्हें अहसास होता है कि वे तो अपना वक्त बर्बाद कर रहे थे। उनकी दशा उस मुसाफ़िर की तरह हो जाती है जो यह उम्मीद लेकर चला था कि वो जिधर जा रहा है वही उसकी मंजिल है यह सोचकर वो हर कठिनाई से गुजरता है हर रुकावट दूर करता है और जब पहुँचता है तो पता चलता है कि यह तो उसकी मंजिल है नहीं वो तो विपरीत दिशा में चल रहा था । यहाँ से तो उसकी मंजिल दोगुनी दूर है। उसके पास समय नहीं बचता हताशा उसे घेर लेती है और वो गहरे अवसाद में डूब जाता है उसके सपने चूर चूर हो जाते हैं जीवन बोझ लगते लगता है। वैसे देखा जाए तो हमारी हर गलती के सबसे बड़े जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। हम क्यों किसी के बहकावे में आए हमारा किसी ने ब्रेनवाश कर दिया और?हमने वो ...

व्यंग्य: वक्त की मार से पीड़ित

लोग बुरा वक्त इस उम्मीद में काटते हैं कि कभी तो उनका अच्छा वक्त आएया तब सब कुछ उनके अनुकूल होगा जिंदगी आनंद दायक हो जाएगी जिनका वक्त बदल जाता है उनकी तो हर इच्छा पूरी होने लगती हैं पर जिनका वक्त नहीं बदलता वे इंतजार करते ही रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो सुनहरे वक्त को बिताकर गर्दिश के दौर को काट रहे होते हैं ऐसे लोग इतनी बुरी तरह से बर्बाद होते हैं कि उनकी दुबारा सँवरने की संभावना हो समाप्त हो जाती है। दौलत राय कभी शहर के जाने माने ज्वेलर थे समाज में उनका बड़ा सम्मान था वे नगर परिषद में पार्षद भी थे। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी विधान सभा के चुनाव आए समर्थकों के कहने पर उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ा उसमें अनाप शनाप पैसा खर्च किया फिर भी चुनाव हार गए फार्म हाउस बिक गया दो मकान बिक गए फिर भी करोड़ों रुपये का कर्ज सिर पर था जवेलर की दुकान लड़के ने सम्हाल रखी थी । लेनदारों ने उनकी दुकान पर कब्जा करना चाहा तो बेटे ने कागजात दिखाकर बताया कि यह दुकान तो मेरी है। यह सुनकर लेनदार तो मायूस हो गए पर दौलतराम को भी सदमा लगा चुनाव की व्यस्तता का लाभ उठाकर लड़के ने उनके भरोसे का अनुचित फ...

व्यंग्य: भरोसे की भैंस

ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत खूब प्रचलित है कहावत इस प्रकार है भरोसे की भैंस पाड़े को जन्म देती है। इस कहावत का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी पर पूरा भरोसा करते हैं और वो भरोसा तोड़ देता है । इतना ही नही वो विश्वास घात भी करता है। आज के इस दौर में तो बिश्वास देकर विष देने वाले बहुत मिल जाएँगे। कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं जो लाभ लेते समय बड़े दावे से कहते हैं कि कभी हम भी तुम्हारे काम आएँगे। इन पर कितने ही अहसान करो ये यही कहेंगे कि आपके सब अहसानों का बदला चुका देंगे। और यही लोग मुसीबत में कन्नी काट कर निकल जाएँगे इनके घर जाओ तो घर से बाहर नहीं निकलेंगे बच्चों से कहलवा देंगे कि पापा घर पर नहीं हैं यह मतलबी लोग सिर्फ मतलब से अपना वास्ता रखते हैं। मतलब निकल जाने के बाद मुड़कर देखते तक नहीं। इसलिए सयाने कहते हैं किसी पर भी पूरा भरॅसा करके आँखें बंद कर मत बैठ जाओ हमेशा इसका विकल्प तैयार रखो। कुछ लोग बड़े घटिया टाइप के होते हैं। वो उस वक्त नदारद हो जाते हैं जिस वक्त उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। समय निकलने के बाद ये अचानक प्गट हो जाते हैं। फिर बड़ी मासूमियत से कहते हैं मैं कहीं गय...

व्यंग्य: मोह से जुड़े रिश्ते

रिश्ते दो तरह से जुड़ते हैं एक तो स्वार्थ पर आधारित होता है। दूसरा रिश्ता मोह जनित होता है। मोह को कोई गुण नहीं कहा गया नही उस को अच्छा कहा गया पहले के मनीषियों ने मोह को व्याधि का मूल कहा है यदि कहा जाए कि सारी बुराई पाप मोह के कारण भी होते हैं। तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। कहते हैं कि यदि अंधा मोह नहीं होता तो पिता के सौ पुत्र युद्ध में नहीं मारे जाते पिता को पुत्र से मोह था और पुत्र को राज्य से कर्ण को मित्र से। इस मोह के कारण इंसान न तो भले बुरे का विचार करता है न ही परिणामों की परवाह करता है। मोह के कारण व्यक्ति पक्षपात करता है सरासर अन्याय करता है। झूठ बोलता है नैतिकता अनैतिकता की भी उसे चिंता नहीं रहती। इसलिए काम क्रोध मद मोह को नरक के पंथ कहा गया है। इस मोह को छोड़ना आसान नहीं है। माया मोह का कारण होती है। मोह इंसान की सोच पर भी असर डालता है । कई परिवारों में देखा जाता है कुछ माता पिता मोह के कारण अपनी ही संतानों के साथ पक्षपेत करने लगते हैं। जो लाड़ला होता है उसके सौ गुनाह भी माफ कर दिए जाते हैं और जो उपेक्षित होता है उस पर लगे झूठे आरोपों को भी सच मानकर प्रताड़ि...

व्यंग्य: मुफ़्तखोर

एक ओर जहाँ दिल फरियाद लोगों की कमी नहीं है वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो मुफ्त खोर होते हैं इनकी जेब से कोई एक रुपया भी खर्च नहीं करवा सकता लेकिन दूसरों के माल पर मौज उड़ाने भें इन्हें बहुत मजा आता है। जो दिल फरियाद होते हैं उन्हें खिलाने में मजा आता है। शहर के युवा व्यवसायी है किशोर गुप्ता जी दिन भर दुकान पर रहकर खूब व्यवसाय करते हैं और देर शाम को नोटों से भरा पर्स लेकर अपनी मित्र मंडली में शामिल हो जाते हैं। फिर उनका पर्स और दोस्तों की फरमाइशों के बीच मुकाबला होता है जिसमें उनके पर्स की सदैव जीत होती है। यह क्रम अनवरत कई वर्षों से जारी है जो कभी ट्टटूटा नहीं हैं वे रविवार को अपना कारोबार बंद रखते हैं । उस दिन वे दोस्तों के साथ घूमने निकल जाते हैं तब भी वे किसी का एक रुपया भी खर्च नहीं होने देते। इससे उनकी बरकत बनी रहती है ऐसा कभी कोई दिन नहीं आया जब उनका पर्स खाली रहा हो । वे खर्च करने में खुश होते हैं। इसके बाद भी वे धन संपन्न हैं। और उनके रुपयों पर मौज करने वाले हमेशा ही उनके मुकाबले में बहुत कम रहते आए हैं। इसके विपरीत उन लोगों की दशा पर विचार करें जो घर से ही फटी जेब ले...

व्यंग्य: दोस्त का दुश्मन बन जाना

वैसे तो जो सच्चे दोस्त होते हैं वो मरते दम तक दोस्ती निभाते हैं उनकी दोस्ती को नमन है लेकिन जो कभी बहुत गहरा दोस्त रहा हो वो अगर दुश्मन बन जाए तो उससे अधिक खतरनाक और कोई नहीं होता । और होता भी यही है । जो कभी गहरे दोस्त रहे हों वे सबसे बड़े दुश्मन बनकर सामने आते हैं। और एक दूसरे को गहरी चोट देते हैं। दोस्ती का जन्म प्रेम से होता है और दुश्मनी का नफ़रत से। जितनी ज्यादा नफ़रत बढ़ती है उतनी गहरी दुश्मनी भी हो जाती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने दोस्तों को मन की बातें बता देते हैं । उनसे कोई बात छिपाते नहीं दोस्त को उनकी सारी कमजोरियाँ मालूम होती हैं लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वो अपने दोस्त को प्रेम करते हैं उसे दिल से चाहते हैं उसे अपना समझते हैं इसलिए उससे अपनी हर बात साझा करते हैं। यह सब तब घातक साबित हो जाता है जब उनकी आपस में दुश्मनी हो जाती है। दुश्मनी हो जाने पर ऐसा दुश्मना बना दोस्त बड़ा खतरनाक सिद्ध होता है वो आपकी छवि बिगाड़ देता है वो आपको बदनाम कर देता है और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वो आपको कहीं मुँह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ता । यह सब शुरू से चला आ रहा है फिर भी लो...

व्यंग्य: कहीं नाम न डूब जाए

जब किसी का जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता नाम बाद में रखा जाता है वही नाम उसकी पहचान बन जाता है वो अपने नाम से इतना अधिक जुड़ जाता है कि हमेशा अपना नाम ऊँचा रखने की कोशिश में लगा रहता है ।कोई भी मशहूर होता है तो नाम से ही होता है। और अगर बदनाम होता है तो वो भी नाम से ही होता है। हर व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक उसकी यही सोच होती है कि वह कुछ ऐसा करे कि उसका नाम अमर हो जाए इसके लिए वो हर संभव प्रयत्न करता है । किसी की तारीफ भी नाम से होती है और बुराई भी नाम से नाम जब चलता है तो बहुत से काम तो नाम से ही हो जाते हैं कुछ लोग कहते भी हैं कि मेरा नाम ले देना तुम्हारा काम हो जाएगा। अखबारों में नाम भी यही सोचकर छपवाया जाता है कि लोग उनको याद रखें। लेकिन इस पर जरा गंभीरता से विचार करें तो समय बीतने के साथ नाम भी भुला दिए जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि बेटे से वंश चलता है पिता का नाम भी चलता है। पर कोई ऐसा विरला ही होगा जिसे अपने चौथी पीढ़ी के पूर्वज का नाम याद हो । क्षेत्र कोई भी हो नाम हमेशा के लिए नहीं होता। तभी तो आए दिन ऐसी खबरे आती रहती हैं कि अपने ज़माने के कई मशहूर ...

व्यंग्य: बदले का भाव

बदला निकालने का भाव रखने वाले लोग अपनी सारी शक्ति और समय बदला निकालने में लगा देते हैं इसके लिए वे किसी हद तक गिर जाते हैं। और उनके अगर इरादे सफल हो जाएँ तो उन्हें परम संतुष्टि प्राप्त होती है पर यह सुख थोड़े दिन का होता है। जिससे इन्होंने अपना बदला निकाला था वो भी बदले की भावना से भर जाता है तथा अवसर की तलाश करता रहता है। जिसका फायदा कुछ चालाक लोग खूब उठाते हैं। यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। चाहे जिंदगी भले खत्म हो जाए। सयाने कहते हैं कि इंसान को वदलाव के लिए प्रयास करना चाहिए अपने आप में सुधार कर बेहतर इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन लोग ऐसा करते नहीं हैं वे बदले निकालने के फेर में बदतर इंसान बनकर रह जाते हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाना और खुद को ऊँचा समझना इंसान को एक घटिया इंसान बना देता है। कई बार आवेश में कही हुई तीखी बात किसी को बुरी लग जाती है । पर वो इसे जाहिर नहीं होने देता। जब वो बदला निकालने में सफल हो जाता है तब हम समझ पाते हैं पर तब तक देर हो चुकी होती है। अगर हम एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश न करें । और सबकी सच्चे मन से मदद करें तो हम बेहतर इंसान बन सकते ...

व्यंग्य: भाग्य के भरोसे

भाग्य का रोना रोने वालों में अधिकतर वे लोग होते हैं जो अपनी लापरवाहियों और सुस्ती के कारण असफल हो चुके होते हैं ।ये भाग्य के भरोसे बैठे हुए लोग कोई भी कार्य की पहल इसिलिए नहीं करते क्योंकि वे यह मान लेते हैं कि उनकी किस्मत ही खराब है। जो उनकी किस्मत में लिखा ही नहीं है वो उन्हें कैसे मिलेगा यह उनकी सोच होती है। इसके विपरीत जो मेहनत साहस और बुद्धि बल से सफल हो जाते हैं वे इस विषय में विचार तक नहीं करते उनके पास अपने कार्य की रुपरेखा होती है योजना होती है। वे अपना पूरा समय अपने कार्य को अंजाम देने में लगा देते हैं। और जब तक सफल नहीं हो जाते तब तक चैन से नहीं बैठते। इनकी सफलता को देखकर असफल उन्हें किस्मत का धनी कहकर उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं । और अपनी किस्मत को दोष देने लगते हैं।  कभो कभी ऐसा भी होता है कि दो व्यक्ति एक साथ एक ही स्थान पर मजदूरी करते हैं। दोनों की आय बराबर होती है फिर भी उनमें से जो मेहनती साहसी और बुद्धिमान होता है वो उन्नति के पथ पर चल पड़ता है धीरे धीरे सफलता उसके कदम चूमने लगती है । वो मजदूरी करना बंद कर के छोटा मोटा धंधा शुरू चर देता है फुटपाथ पर बैठकर...

व्यंग्य: छोड़कर जाने के बाद

अक्सर ऐसा होता है । कि हम जिसके साथ रहते हैं उसके महत्व का हम आँकलन नहीं कर पाते हमे उससे उकताहट होने लगती है फिर हमारे उससे संबंध खराब होने लगते हैं। अगर वो हमारा आश्रित तो हम उसे बोझ समझने लगते हैं। कुछ तो यह तक कह देते हैं कि हराम की खा रहा है । जब खुद कमाकर खाएगा तब पता चलेगा कि कितनी मुश्किल से पैसा कमाया जाता है। डससे संबंध अधिक कटु हो जाते हैं तो इनका अंत तभी होता है जब कोई छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद उसकी अहमियत का पता चलता है। तब उसकी कमी खूब खलती है लेकिन फिर वो हमारी पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। रश्मि ने जब बी एस सी कर ली तो बी एड करने के लिए वो अपने भाई भाभी के पास बड़े शहर में आ गई। भैया भाभी और उनका एक वर्ष का बैटा था रिंकं भाई का थ्री बी एच के फ्लेट था। एक कमरा उसे रहने के लिए दे दिया गया। रश्मि पढ़ाई के अलावा घर के कामों में भी सहयोग करती थी उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उसके पापा उठा रहे थे भाई के यहाँ तो वो भोजन करती थी और रहती थी। बाजार से सामान भी खरीद कर वो लाती थी रिंकू की देखभाल भी करती थी। कभी कभी रसोई में भी हाथ बँटाती थी । फिर भी रश्मि की भाभी को ...

व्यंग्य: जानबूझकर अवसर गँवाने वाले

जीवन में अच्छे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते है। और जो लोग ऐसा अवसर यह सोचकर गँवा देते हैं कि आगे चलकर इससे अच्छा अवसर मिलेगा उसका लाभ उठा लेंगे ।फिर ऐसा अवसर कभी नहीं आता । और अवसर गँवाने वाले के पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचता। कई बार ऐसा होता है । जिसे हम छोटा अवसर समझकर छोड़ देते बाद में वही बेहतर अवसर साबित होता है। जो फिर हमें कभी नहीं मिलता। आलोक और सुरेश कामर्स विषय से हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहे थे। बारहवीं की परीक्षा देने के बाद सुरेश को एक अवसर मिला गल्ला व्यापारी लाभमल जी को एक लिखापड़ी करने वाले की जरूरत थी । वे सुरेश को जानते थे। उन्होंने उससे अपने यहाँ काम करने को कहा वेतन कम था । इसलिए उसने मना कर दिया लाभमल जी बोले । कोई ओर काम करने का इच्छुक हो तो बताना सुरेश ने यह बात आलोक से कहते हुए कहा कि बी कॉम करेंगे तो अच्छा रहेगा किसी दुकान पर लिखा पढ़ी का काम कर के क्यों अपना भविष्य बिगाड़ें। मगर आलोक की सोच ऐसी नहीं थी। वो लाभमल जी के पास पहुँचा और काम करने की इच्छा प्रकट की। लाभमल जी ने उसे काम पर रख लिया। दिनभर की लिखापढ़ी का काम तीन घंटे में पूरा हो जाता था। ...

व्यंग्य: विश्वासघाती

कहते हैं कि विश्वास को बड़ी मुश्किल से कायम किया जाता हैं। आज के दौर में आसानी से विश्वास नहीं जमाया जा सकता जबकि विश्वास को तोड़ना आसान हैं लेकिन फिर टूटे हुए विश्वास को जोड़ना मुमकिन नहीं है। जो विश्वास तोड़ देते हैं । वे विश्वासघाती कहलाते हैं। जिन पर दुबारा कोई कभी विश्वास नहीं करता। जो चतुर चालाक चपल अवसरवादी टाइप के लोग होते हैं वे जरा से लोभ में विश्वास तोड़ने में देरी नहीं करते। ऐसे लोग बहुत बड़ी गलती कर बैठते हैं जिसके परिणाम का उनको भी अंदाज नहीं होता। पुरुषोत्तम दास जी एक ईमानदार नेक दिल और भले इंसान थे । उनकी बाजार में दुकान थी कुछ लेनदेन का काम भी करते थे। कुल मिलाकर वे सुखी जीवन जी रहे थे । लोग भी उनसे खुश थे और उन्हें भी किसी से कोई शिकायत नहीं थे। आज तक उन्होंने किसी का विश्वास नहीं तोड़ा था। न ही उनका किसी ने भरोसा तोड़ा था। इसिलिए उनका कारोबार आराम से चल रहा था उनकी जुबान से निकली बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह मानी जाती थी। उनका इकलौता लड़का था। हरीश उसके अपने पिताजी से गहरे मतभेद थे। वो अपने पिताजी की कार्य प्रणाली से संतुषट नहीं था। वो अति महत्वाकाँक्षी था। वो ...

व्यंग्य: सामंती सोच

वैसे तो सामंतवाद दुनिया से कब का खत्म हो चुका है लेकिन सामंती सोच अभी तक खत्म नहीं हुई है। यह अभी भी कायम है। शहरी क्षेत्र में ये अलग रूप में है और ग्रामीण क्षेत्रों में अलग रूप में है। जो सामंती सोच वाले हैं वे अक्सर संपन्न और प्रभावशाली वर्ग के होते हैं इनके क्षेत्र में कोई भी गतिविधा इनकी सहमति के बिना नहीं हो सकती कोई कितना ही सक्षम क्यों न हो पर इनकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन सामंतवादी सोच रखने वालों ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है। एक गाँव के त्रिभुवन सिंह का रौब भी ऐसा ही था। गाँव में उनसे बड़ा किसी का मकान नहीं था । कोई उनसे आँख से आँख मिलाकर बात नहीं कर सकता था बाहर से जो भी अतिथि या कोई और किसी काम से आता तो उसे सबसे पहले उनके दरबार में उपस्थित होना पढ़ता था। कोई मँहगे और अच्छे कपड़े भी नहीं पहन सकता था भले ही वो कितना ही संपन्न क्यों न हो कोई अगर मेहमानी करने गाँव से बाहर जाता तो वो अच्छे कपड़े गाँव की सीमा के बाहर पहनता था। और जब वापस आता तो कपड़े बदल कर गाँव की सीमा में प्रेवेश करता था एक बार की बात हैं एक ग्रामीण कुंजीलाल ने एक...

व्यंग्य: चाहत के रूप

किसी के दिल में किसी के प्रति जो चाहत उत्पन्न होती है उसके कई कारण हो सकते हैं ठीक उसी प्रकार नफरत भी कई कारणों से हो सकती है। चाहत का मतलब प्रेम ही नहीं होता। ये चाहत कभी स्लार्थ के कारण भी हो सकती है। जिससे काम निकालना हो उसके प्रति भी चाहत होती है।  जो संबंध स्वार्थ के आधार पर बनते हैं उनमें प्रेम का अभाव होता है । ऐसे संबंध स्वार्थ पूरा होने पर टूट भी जाते हैं।  जिस तरह प्रेम किसी से भी हो सकता है । उसी तरफ नफरत भी किसी से भी हो सकती है प्रेम विवाह करने वाले भी शादी के कुछ साल बाद यह कहते नजर आते हैं कि तुमसे शादी के बाद पछता रहे हैं। जब पति पत्नी के बीच संबंध कटु हो जाते हैं तो बच्चों का मोह उन संबंधों को बनाए रखता है। सच्चा प्रेम इन सबसे हटकर होता है। सच्चे प्रेम त्याग समर्पण और बलिदान का जज्बा रहता है इस में प्रेमी प्रेमिका एक दूसदरे की चाहत में अपनी जान तक भी दे सकते है। यदि हम संबंधों को प्रेम का आधार बना लें तो स्वार्थ का भाव ही तिरोहित हो जाएगा। दिल में प्रेम रखकर हम यदि किसी का काम करेंगे तो उस काम को करने से खुशी मिलेगी । न उकताहट झुँझलाहट और बैचेनी। होगी...

व्यंग्य: सुख के सपने

जिनके पास दुखों की भरमार है वे सुख के सपने सजाकर अपनी जिंदगी जीते रहते हैं । वे सोचते हैं कि कभी वो दिन भी आएगा जब हमें भी खूब सुख मिलेंगे हमारी भी सारी कामनाएँ पूरी होंगी। दिन गुजरते चले जाते हैं इच्छित सुख भी मिलते हैं फिर भी इंसान सुखी नही दिखता । क्योंकि फिर वो नए सुख के सपने देखने लगता है। नई कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वो इनकी पूर्ति में जुटा रहता है। यह सब करते हुए वो उम्र की गिनती भी भूल जाता है समय के साथ व्यक्ति तो बूढ़ा हो जाता है लेकिन मन जवान रहता है। जब शरीर साथ नहीं देता कार्यक्षमता घट जाती है । तब उसे पुराने दिन याद आते हैं। फिर वो सोचता है कि पुराने दिन कितने अच्छे थे सब कुख कितना बेहतर था। आज की तुलना में तो कई गुना बेहतर था । बुढ़ापे में अक्सर लोग पुराने दिनों की यादों को तरोताजा करने लगते हैं। क्योंकि भविष्य से उनकी आस खत्म हो जाती है वे समझ जाते हैं कि बुढ़ापे का भविष्य मौत है । वे इस मौत के डर को भुलाना चाहते हैं इसिलिए अतीत में खोए रहते हैं।     नरेन्द्र जी एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे खूब रुतबा था मोटी तनखा मिलती थी। ऑफिस में सब उन से डरते थे हर...

व्यंग्य: आगे निकलने की होड़

एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने आदमी का सुख चैन छीन लिया हैं अच्छा मकान है अच्छी नौकरी है सारे सुख साधन है। फिर भी व्यक्ति को संतोष नहीं है वो अपने सुखों से इतना सुखी नहीं होता जितना दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होता है। किसी के पास सात लाख की कार है और कोई उसका परिचित पन्द्रह लाख की कार ले आया तो उसे अपने सात लाख की कार बुरी लगने लगेगी ऐसा रोहन के साथ हुआ जैसे ही उसके प्रतिद्वंदी रितिक ने पन्द्रह लाख की कार खरीदी वैसे ही रोहन की सात लाख की कार की खुशी दुख में बदल गई । उसकी पत्नी उससे ज्यादा दुखी रहने लगी उनका इम्प्रेशन डाउन हो रहा था। वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे। रोहन की इतनी आमदनी भी नहीं थी। फिर भी वे बैचेन थे ये कार खरीदे उन्हें छ़ महीने ही हुए थे। और अंततः यह हुआ कि वो कार उन्होंने चार लाख रुपये में बेच दी और बाइस लाख की कार वे ले आए अब रोहन का परिवार खुशी से फूला नहीं समा रहा था जबकि रितिक के यहाँ मातम पसरा हुआ था उन्हें अब अपनी पन्द्रह लाख की कार बुरी लगने लगी थी। इस प्रतियोगिता ने उन्हें गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया था। हम भौतिक वस्तुओं पर गर्व कर रहे हैं ...

व्यंग्य: अपमानित

कई परिवारों में ऐसे बुजुर्ग मिल जाएँगे जो बहू बैटों के द्वारा किए गए अपमान को सहकर अपने बुढ़ापे के दिन गुजार रहे हैं । इनमें उन पिताओं की संख्या ज्यादा है जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी परिवार को सँवारने में गुजार दी व्यवसाय जमायः बच्चों को पढ़ाया लिखाया उनका विवाह किया नाती पोतों की वरवरिश में भी अहम भूमिका निभाई जब वे ज्यादा बूढ़े हो गए और उनके सारे कारोबार पर बेटों ने कब्जा कर लिये तो अब उन्हें अपमानित होकर जिंदगी जीना पड़ रहा है।  स्थिति तब और बिगड़ जाती है जब उनकी बूढ़ी जीवन संगिनी का निधन हो गया हो ऐसे में वे अपने मन की बातें भी नहीं कह पाते और अपमान सहकर घुटते रहते हैं।    सोमनाथ जी ने गाँव से शहर आकर एक होटल में वेटर का काम कर धन कमाना शुरू किया था उन्होंने खूब परिश्रम किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने एक मिष्ठान्न भंढार और एक होटल तथा एक भोजनालय खोल लिया । बड़ा मकान बनवाया दो बेपों एक बेटी की शादी धूमधाम से की परिवार को समृद्ध और सुखी बनाया। फिर अपना सारा कारोबार बेटों को सौप दिया वे यह सोचकर खुश थे कि अब वे अपने बुढ़ापे के दिन आराम से गुजारेंगे। बेटे क...

व्यंग्य: बुरी नियत वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी नियत बहुत बुरी होती है ये खुद चिपड़ी रोटी खा रहे हों मेवा मिषाठान्न का सेवन कर रहे हों उसकी उन्हें इतनी खुशी नहीं होती जितना दुख किसी रूखी सूखी खाने वालो को दो टाइम का भर पेट भोजन मिल जाए तब होता है। यह उससे जलने लगते हैं। इनसे कम हैसियत वाला अगर कार खरीद ले तो इनके कलेजे पर साँप लोटने लगता है। फिर ये उसके पीछे हाथ धोकर पड छाते हैं उसकी आय के स्त्रोत बंद करने का प्रयास करते हैं उसके सामने आर्थिक संकट खड़े कर देते हैं। उसका पैसा खर्च कराने की साजिशें रचते हैं ओर जब वो घोर आर्थिक संकट में घिर कर अपनी कार को औने पौने दाम में बेच देता है तो इनके कलेगे को बड़ी ठंडक पहुँचती है। कुठ लोग की नियत दूसरे की जमीन जायदाद पर लगी होती है । किसी का घर इन्हें समझ में आ जाए तो उसे बिकवाने की कोशिशें करना ये शुरू कर देते हैं।  रामलाल का मकान सड़क पर था पिछले कुछ सालों में वहाँ अच्छा बाजार विकसित हो गया था । सोहनलाल का मकान गली में था उसकी दुकान किराये की थी । उसकी गलत नजर रामलाल के मकान पर लगी हुई थी । वो उस मकान को हड़पना चाहता था । उसकी सोच यह थी कि अगर रामला...

व्यंग्य: गलती किसकी

आजकल माता पिता इस बात से दुखी रहते हैं कि उनके बच्चे संस्कारी नहीं हैं मतलबी हैं संवेदना विहीन हैं लालची हैं गुस्सैल हैं ।किसी की मजबूरी का फायदा उठाने में भी उन्हें संकोच नहीं होता है। पर इसमें गलती किसकी है ।  कभी इस पर भी तो विचार करों क्या उनके माता पिता की कोई गलती नहीं है क्या एक युवक कह रहा था कि शाम को मैं और पिताजी एक साथ शराब का सेवन करते है। ऐसे लोग अपने बच्चों से भले की उम्मीद रखते हैं। बच्चा छोटा था आपने उसे झूठ बोलना सिखाया आपने उसे छल कपट करना सिखाया बेईमानी करना सिखाई आपने उसे बड़ों की इज्जत करना नहीं सिखाई अगर उसने आपके सामने बड़ों की बेइज्जती की तब भी आपने कुछ नहीं कहा। अब जब वो आपको दुख दे रहा है परेशान कर रहा है तो आप तिलमिला रहे हो ऐसे संस्कार विहीन बच्चे ही तो माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं। यहि आप बच्चों को संस्कारी बनाना चाहते हैं तो आपको भी संस्कारी बनना ही होगा आपको बच्चों के सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ेगा तब कहीं बच्चे संस्कारी हो पाएँगे। बच्चों को अंपनी संस्कृति का ज्ञान चरना भी आवश्यक है। महापुरूषों के जीवन के उदाहरण बताना जरूरी...

व्यंग्य: ख़ुशियाँ बाँटने वाले

वैसे तो दोपावली खुशियों का त्यौहार है ये रोशनी हमारी खुशी और आनंद को बढ़ाने वाली होती है । लोग यह त्यौहार खुशी के साथ मनाते हैं पर आपके लिए खुशी जुटाने वाले आपको खुशियाँ बाँटने वाले किस हाल में रहते हैं ये कोई जानने का प्रयास नहीं करता लोगों को खुशी बाँटने वाले यह लोज ठीक से त्यौहार भी नहीं मना पाते। कपड़े सीने वाले त्यौहार के दिन तक भी लगातार काम करते हैं जब वह रात को ग्यारह बजे घर पहुँचते हैं तब उनके यहाँ लक्ष्मी जी का पूजन होता है और दिए जलते हैं इसी तरह दुकानों पर काम करने वाले भी लगातार काम करते रहते हैं दीपावली के दिन बाजार में खूब भीड़ होती है। और व्यापारी तथा उनके यहाँ काम करने वाले लगातार काम करते रहते हैं कमर सीधी करने की भी उन्हें फुरसत नहीं मिलती । जो धनवान हैं साधन संपन्न हैं वे तो धूमधाम से त्यौहार मना लेते हैं लेकिन जो गरीब हैं उनका त्यौहार फीका ही रहता है। किशनलाल जहाँ काम करता था वहाँ से उसका काम छूट गया फिर उसकी तबियत खराब हो गई। इसी बीच दीपावली का पर्व आ गया घर में कुछ नहीं था थोड़े से चावल बनाए दो दीपक जला लिए और इस तरह दीपावली पूजन करके आधा पेट भोजन करके उनका त...

व्यंग्य: अपनी खुशियों को बाँटकर तो देखो ज़रा

ऐसा कहा जाता है कि यदि अपना दुख किसी को बता दो तो वह कुछ कम हो जाता है। ठीक उसके विपरीत खुशियों को अगर बाँट दो तो वह कई गुना बढ़ जाती है। अब मन में यह विचार आता है कि ये खुशियाँ कहाँ बाँटी जाएँ । तो इसका सीधा सरल जवाब है कि इन्हें हमारे आसपास के लोगों में भी बाँटा जा सकता है । ढूँढोगे तो ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जिन्हें आपकी मदद की जरूरत है।  कारखाने में काम करने वाला हीरा बीमारी के कारण दो महीने तक काम पर नहीं जा सका जिसके कारण न उसे वेतन मिला न ही बोनस उसके मालिक में इतनी संवेदना नहीं थी जो वे इस ओर ध्यान देते दीवाली के त्यौहार पर उन्हें कई बड़े लोगों को लाखों रुपयों के गिफ्ट देने थे उसका खर्च निकालने के लिअः उन्होंने इस बार श्रमिकों के बोनस में भी कटौती कर दी कितनों की तनखा काट दी थी । या रोक दी थी। आर्थिक संकट से पीड़ित हीरा की पत्नी त्यौहार के एक दिन पहले गोयल जी के घर आई और उनकी पत्नी सुरेखा से बोली दीदी पन्द्रह हज़ार रुपये की जरूरत है । आप मेरे ये सोने के कान के टॉपस गिरवी रख लो और पैसे दे दो तो आपकी बड़ी कृपा हो जाएगी और हमारा त्यौहार मन जाएगा। यह बात गोयल साहब...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...