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व्यंग्य: अधूरी खुशियाँ

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे इस दौर ने जहाँ खुशियों की मात्रा घटा दी हैं वहीं खुशियों को भी अधूरा कर दिया है। अभाव में थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती है वहीं संपन्नता में बड़ी बड़ी खुशियाँ भी बौनी हो जाती हैं।
जैसे सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार अगर साधारण कार भी खरीद ले तो उसके परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता दूसरी अति संपन्न लोग करोड़ों की कार भी खरीद लें तो भी उनको वैसी खुशी नहीं मिलती ऐसे लोगों को नर्म मुलायम बिस्तर पर भी नींद नहीं आती।
जो लोग बुरे काम करते है अनीतीपूर्वक धन कमाते हैं दुखी लाचार बेबस को सताते हैं उनका शोषण करते हैं उनकी हर ख़ुशी अधूरी होती है। खुशियों के मापदण्ड ऐसे लोगों की समझ से परे रहते हैं। जीवन सुख पूर्ण हो आनंद से भरा रहे खुशियाँ हर पल मौजूद रहे ऐसा सभी चाहते हैं पर कितने लोग सुखी रह पाते हैं क्षेत्रीय विधायक कौशल जी के पास आज हर प्रकार की सुख सुविधाएँ हैं फिर भी वे खुश नहीं है। उन्हे रह रहकर अपने वै दिन याद आते हैं। जब वे मजदूर थे तब थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती थी कोई मोटर सायकिल पर बिठा ले तो बहुत मजा आता था। आज ऐसा नहीं होता। आपधापी दौड़धूप भरी जिंदगी में हम ठीक से खुशियाँ मनाना ही भूल गए हैं ।हमारी चिंताएँ हमारे तनाव हमें ठीक से खुशियाँ मनाने का मौका नहीं देते हैं। इधर खुशी मिली नहीं कि तुरंत ही अनेक परेशानियाँ समस्याएँ सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और हम खुशियों को मानना छोड़ उन कामों में व्यस्त हो जाते। रोते किलपते हुए जिंदगी बीत जाती है आखिरी में कुछ हासिल नहीं होता। जैसा हम प्राप्त करना चाहते हैं वैसा अगर न मिले तो यह हमारा दुख का कारण बन जाती है। लोगों की अपेक्षाएँ हमेशा ज्यादा ही होती हैं जो हमारी खुशियों में बाधक बन जाती है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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