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व्यंग्य: कोरी दिलासाएँ

दिलासा देने के नाम पर ज़ख्मों पर नमक छिड़कने वाले बहुत मिल जाएँगे ऐसे लोगों में छल कपट रखने वालों की संख्या सबसे ज्यादा होगी ।वहीं कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो आपसे जलते हैं लेकिन जाहिर नहीं होने देते ये मन ही मन आपका बुरा चाहते हैं। जब आपका बुरा होजाए तो इन्हें बहुत खुशी होती है।
ये लोग अपनी खुशी को छिपाकर उसको दिलासा देने के बहाने उसके जख्मों को कुरेदने पहुँच जाते हैं उससे झूठा अपनापन दिखाकर सारी बातें जान लेते हैं वो इन्हें हमदर्द समझकर अपने मन की सारी बातें इन्हें बता देते जिसे सुनकर यह भीतर ही भीतर गदगद हो जाते हैं और ऊपरी तौर पर कहते हैं अरे यह तो बुरा हुआ ऐसा नहीं होना चाहिए । और मन ही मन कहते हैं अच्छा हुआ ऐसा ही होना चाहिए। 
ऑफिस के सहयोगी वर्मा जी की पत्नी का असामयिक निधन हो गया था वर्मा जी बहुत दुखी थे किसी तरह अपने आँसुओं चो रोके हुए थे। उनके घर मातमपुर्सी करने उनके ही ऑफिस के दिनेश जी आए और उन्हें तसल्ली देने लगे वर्मा जी बड़े सँभलकर उनसे बात कर रहे थे पर दिनेश जी तो कुछ ओर चाहते थे इसलिए वे उनकी भावनाओं को भडकाते हुए बोले आपकी तो दुनिया ही उजड़ गई ।आपके जीवन का सूरज तो दिन में ही डूब गया आपकी तो सारी जिंदगी में ही अंधेरा छा गया फिर उन्होंने पत्नी बिना आगे के जीवन का कुछ इस तरह से वर्णन किया कि वर्मा जी फफक फफक कर रो पड़े ।जब वो रोने लगे तब कहीं दिनेश जी की आत्मा को शांति मिली उन्हें रोता हुआ देखकर इन्हें असीम सुख की प्राप्ति हुई। वर्मा जी का मन भारी हो गया था दिनेश के जाने के बाद वे गहरे दुख के सागर में डूब गए थे। अगर दिनेश जी दिलासा देने के नाम पर उनसे इस तरह की बात नहीं करते तो उनका ऐसा हाल नहीं होता। ऐसे विघ्न संतोषी लोग दो गहरे दोस्तों में भी झगड़ा कराकर सुख की अनुभूति करते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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