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व्यंग्य: उधारी की आदत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें मजबूरी में उधार लेना पड़ता है। दूसरी ओर कुछ लोग आदतन उधार लेने वाले होते हैं जिनको उधारी की आदत पड़ जाती है वे हमेशा आर्थिक संकट से घिरे रहते हैं उनका खर्च आय से अधिक होता है जिससे वे उधारी के दललद में हमेशा हो फँसे रहते हैं ।जो उधारी लेकर वापस नहीं करते उनकी हालत और भी अधिक दयनीय हो जाती है।
ऐसे लोग भरोसा तोड़ देते हैं फिर उन्हें उधार देने वाला कोई नहीं मिलता। जिनका यह पैसा खा चुके होते हैं उनसे इन्हें बचकर रहना पड़ता है अगर इनका कभी उधारी वसूल करने वाले से सामना हो जाए तो फिर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपने अपमान को सहन करना पड़ता है। सोहन और रोहन एक ही ऑफिस में नौकरी करते थे । दोनों का वेतन भी बराबर था उस वेतन में सोहन का तो आराम से गुजारा चल जाता था पर रोहन हमेशा आर्थिक संचट से घिरा रहता था उसने सोहन से भी कर्ज ले रखा था जिसे वो लौटाने का नाम भी नहीं लेता था जिस दिन उसे वेतन मिलता था उस दिन उसके यहाँ उधारी वसूल करने वालों की भीड़ लगी रहती थी उसने बैंक से भी लोन ले रखा था जिसकी किश्त में उसके वेतन का बड़ा हिस्सा चला जाता था।
सोहन का कहीं कोई उधारी का खाता नहीं था नियमित बचत से जो उसके पास पैसा इकठ्ठा हौआ था उससे उसने आवासीय भूखंड खरीद लिया था उसकी पत्नी भी ट्यूशन पढ़ाकर कुछ रुपये कमा लेती थी चार साल में सोहन ने अपना मकान बनवा लिया था जबकि रोहन इस बीच आठ मकान बदल चुका था हर मकान से उसे किराया अदा न करने के कारण बेदखल किया गया था। सोहन की तो अब ओर ज्यादा बचत होने लगी थी क्योंकि उसे अब मकान किराये की झंझट से मुक्ति मिल गई थी। दूसरी ओर रोहन की उधारी लेने की आदत उसकी कमजोरी बन गई थी। जिसके कारण वो परेशान बना रहता था। वो उधारी के दलदल में इतना अधिक धँस गया था जिससे उबर पाना उसके लिए मुशूकिल हो गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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