व्यंग्य
बुरा करो या भला आपकी मर्जी
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हम एक वक्त में एक ही काम कर सकते है॔ या तो किसी का भला करें या बुरा या फि अपना स्वार्थ हल कर लें। हम जो भी कर्म करते हैं उसके जिम्मेदार हम ख़ुद होते हैं उसका फल भी हमें ही भुगतना पड़ता है। जैसे भोज में होता है कोई मिठाई खा रहा होता है कोई तेज मिर्च मसाले वाला समोसा एक वक्त में दो अलग अलग काम हो रहें हैं एक को मिठाई में आनंद आ रहा है । दूसरे का तेज मिर्च मसाले से मुँह लाल हो रहा है आँखों से पानी बह रहा है वो सी सी कर रहा है । परेशान है फिर भी उसे
अच्छा लग रहा है क्योंकि समोसा खाना उसकी इच्छा पर निर्भर था वो चाहे तो मिठाई भी खा सकता था दोनों के परिणाम अलग अलग होते है।
जीवन में भला बुरा करने के हमेशा विकल्प रहते हैं। लेकिन कभी कोई विकल्प ही नहीं होता
जो करना है वो करना ही पड़ेगे भले ही हमारी इच्छा हो या न हो भले ही काम नीति संगत न हो। पर जीवन में ऐसी नौबत कभी कभार ही आती है। जीवन को यदि मधुर सुखमय आनंदायक बनाना है तो सबसे मेल जोल बनाए रखने में ही भलाई है। लेकिन जो लोग बार बार मनाए जाने पर भी नहीं मानते तो उनसे मेल जोल कैसे करेंगे उससे अच्छा यही है कि हम उन्हें हमेशा के लिए छोड़ ही दें। जब हम लोग के बीच रहते हैं तब हमारा कई तरह के लोगों से सामना होता है। कुछ लोग परोपकार कर रहे होते हैं कुछ लोग अपने भले की सोचते रहते हैं कुछ भिखारी भीख माँगते हैं तो कुछ लोग उनको भीख देते हैं। संवेदनाएँ सबकी एक जैसी होती हैं। अनुभूतियाँ भी एक जैसी रहती हैं सिर्फर कर्म के अनुसार ही हमारा परिणाम तय होता हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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