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व्यंग्य: अपनी खुशियों को बाँटकर तो देखो ज़रा

ऐसा कहा जाता है कि यदि अपना दुख किसी को बता दो तो वह कुछ कम हो जाता है। ठीक उसके विपरीत खुशियों को अगर बाँट दो तो वह कई गुना बढ़ जाती है। अब मन में यह विचार आता है कि ये खुशियाँ कहाँ बाँटी जाएँ । तो इसका सीधा सरल जवाब है कि इन्हें हमारे आसपास के लोगों में भी बाँटा जा सकता है । ढूँढोगे तो ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जिन्हें आपकी मदद की जरूरत है। 
कारखाने में काम करने वाला हीरा बीमारी के कारण दो महीने तक काम पर नहीं जा सका जिसके कारण न उसे वेतन मिला न ही बोनस उसके मालिक में इतनी संवेदना नहीं थी जो वे इस ओर ध्यान देते दीवाली के त्यौहार पर उन्हें कई बड़े लोगों को लाखों रुपयों के गिफ्ट देने थे उसका खर्च निकालने के लिअः उन्होंने इस बार श्रमिकों के बोनस में भी कटौती कर दी कितनों की तनखा काट दी थी । या रोक दी थी। आर्थिक संकट से पीड़ित हीरा की पत्नी त्यौहार के एक दिन पहले गोयल जी के घर आई और उनकी पत्नी सुरेखा से बोली दीदी पन्द्रह हज़ार रुपये की जरूरत है । आप मेरे ये सोने के कान के टॉपस गिरवी रख लो और पैसे दे दो तो आपकी बड़ी कृपा हो जाएगी और हमारा त्यौहार मन जाएगा। यह बात गोयल साहब सुन रहे थे सुरेखा कुछ जवाब देती इसके पहले वो वहाँ आ गए वे बड़े संवेदनशील व्यक्ति थे उनकी हैसियत बड़ी थी वे उससे बोले आज धन तेरस है आज के दिन तो लोग सोना चाँदी बर्तन खरीदते हैं और आप टॉपस गिरवी रख रही हैं। लेकिन मैं ऐसा होने नहीं दूँगा फिर उन्होंने सुरेखा से कहचर बीस हजार रुपये उसे दिलवा दिए । इसके बाद वे बहुत सारे गिफ्ट लाए जो उन्हें लोगों ने दिए थे और कहा इनमें से जो चाहिए वो ले लो। वह उन्हें लेने में संकोच करने लगी तो सुरेखा ने उसके मन की बात जानकर इच्छित उपहार उसे देकर कहा खूब अच्छे से त्यौहार मनाओ हम ये पैसे देकर भूल गए तुम इस बात की चिंता मत करना कि इसका ब्याज देना पड़ेगा। या लौटाना पड़ेगा हमारे लिए ये कोई बड़ी रकम नहीं है हमारे परिवार के होटल मे खाने वाले एक डिनर का बिल है। जो हम घर पर डिनर कर इसकी भरपाई कर लेंगे। इससे हीरा की पत्नी वो इतनी खुश हुई कि उसकी खुशी का पारावार न रहा उसके लिए बीस हजार की रकम एक बड़ी रकम थी जो उपहार उसे दिए गए थे ले भी सात हजार रुपये से कम नहीं थे। इन पैसों में उसका त्यौहार अच्छे से मनने वाला था।
आज गोयल जी बहुत खुश थे उनकी आत्मा को अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी ऐसा आनंद अगर वे फाइव सूटार होटल में जाकर डिनर भी करते तब भी प्राप्त नहीं होता ये एक जरूरतमंद को खुशी देने का सुपरिणाम था। गोयल साहब की तरह हम भी सच्ची खुशी के अवसरों की तलाश अपने आस पास ही कर सकते हैं बस आपको अपनी सोच एवं नजरिया बदलना पड़ेगा।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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