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व्यंग्य: मुफ़्तखोर

एक ओर जहाँ दिल फरियाद लोगों की कमी नहीं है वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो मुफ्त खोर होते हैं इनकी जेब से कोई एक रुपया भी खर्च नहीं करवा सकता लेकिन दूसरों के माल पर मौज उड़ाने भें इन्हें बहुत मजा आता है। जो दिल फरियाद होते हैं उन्हें खिलाने में मजा आता है।
शहर के युवा व्यवसायी है किशोर गुप्ता जी दिन भर दुकान पर रहकर खूब व्यवसाय करते हैं और देर शाम को नोटों से भरा पर्स लेकर अपनी मित्र मंडली में शामिल हो जाते हैं। फिर उनका पर्स और दोस्तों की फरमाइशों के बीच मुकाबला होता है जिसमें उनके पर्स की सदैव जीत होती है। यह क्रम अनवरत कई वर्षों से जारी है जो कभी ट्टटूटा नहीं हैं वे रविवार को अपना कारोबार बंद रखते हैं । उस दिन वे दोस्तों के साथ घूमने निकल जाते हैं तब भी वे किसी का एक रुपया भी खर्च नहीं होने देते। इससे उनकी बरकत बनी रहती है ऐसा कभी कोई दिन नहीं आया जब उनका पर्स खाली रहा हो । वे खर्च करने में खुश होते हैं। इसके बाद भी वे धन संपन्न हैं। और उनके रुपयों पर मौज करने वाले हमेशा ही उनके मुकाबले में बहुत कम रहते आए हैं।
इसके विपरीत उन लोगों की दशा पर विचार करें जो घर से ही फटी जेब लेकर आते हैं उनकी जेब में एक रुपया नहीं रहता पूरा दिन दूसरों के रुपयों पर मौज करते रहते हैं एक हिसाब से तो इन्हें खूब धन संपन्न होना चाहिए पर ऐसा सोता नहीं है ये भिखारी के भिखारी बने रहते हैं ये कभी दानी नहीं बन सकते भिखारी दिन भर भीख माँगकर रात को चाहे भरी झोली लेकर घर पहुँचे पर सुब्ह वो खाली झोली लेकर ही घर से निकलता है और जो दानी है। उसकी खूब दान करने के बाद भी झोली भरी रहती है। ऐसी में उनकी मान प्रतिष्ठा रहती है। ऐसे लोग कभी गरीब नहीं हो सकते । और जिनकी सोच दीन हीन बनकर दूसरों का धन ऐंठने की हो वो कभी अमीर नहीं हो सकते।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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