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व्यंग्य: ख़ुशियाँ बाँटने वाले

वैसे तो दोपावली खुशियों का त्यौहार है ये रोशनी हमारी खुशी और आनंद को बढ़ाने वाली होती है । लोग यह त्यौहार खुशी के साथ मनाते हैं पर आपके लिए खुशी जुटाने वाले आपको खुशियाँ बाँटने वाले किस हाल में रहते हैं ये कोई जानने का प्रयास नहीं करता लोगों को खुशी बाँटने वाले यह लोज ठीक से त्यौहार भी नहीं मना पाते।
कपड़े सीने वाले त्यौहार के दिन तक भी लगातार काम करते हैं जब वह रात को ग्यारह बजे घर पहुँचते हैं तब उनके यहाँ लक्ष्मी जी का पूजन होता है और दिए जलते हैं इसी तरह दुकानों पर काम करने वाले भी लगातार काम करते रहते हैं दीपावली के दिन बाजार में खूब भीड़ होती है। और व्यापारी तथा उनके यहाँ काम करने वाले लगातार काम करते रहते हैं कमर सीधी करने की भी उन्हें फुरसत नहीं मिलती । जो धनवान हैं साधन संपन्न हैं वे तो धूमधाम से त्यौहार मना लेते हैं लेकिन जो गरीब हैं उनका त्यौहार फीका ही रहता है।
किशनलाल जहाँ काम करता था वहाँ से उसका काम छूट गया फिर उसकी तबियत खराब हो गई। इसी बीच दीपावली का पर्व आ गया घर में कुछ नहीं था थोड़े से चावल बनाए दो दीपक जला लिए और इस तरह दीपावली पूजन करके आधा पेट भोजन करके उनका त्यौहार मना चावल थे उसमें नमक मिलाकर सबने भोजन किया था। उनकी ऐसी दीवाली मनी थी। समाज में जब तक आर्थिक असमानता रहेगी तब तक गरीबों के त्यौहार ऐसे ही मनेंगे। उनके लिए तो सब दिन एक से हैं जब काम मिल रहा हो तो उनकी रोज की दीवाली है और काम मिलना बंद हो गया तो फिर मुफलिसी है। त्यौहार आने से पहले वे लोग जो संपन्न हैं वे स्वेच्छा से फिजूल खर्ची न करते हुए अगर ऐसे लोगॅ को भी अपनी खुशी में शामिल कर लें तो सबकी दीवाली खुशियों से भरी हो सकती है। दीपावली की शुभकामनाएँ देने के साथ ही इनकी मदद करना भी जरूरी है। इन्हें काम देकर भी इनकी मदद की जा सकती है। 



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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