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व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है।
इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है। 
रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन हो गया उसके पिताजी ख़ुशी से फूले नहीं समाए। सब जगह इसकी चर्चा हो गई। रोहित की शादी के प्रस्ताव आने लगे पर रोहित नौकरी नहीं करना चाहता था यह बात उसने अपने दोस्त अशोक से कही अशोक ने भी बी ई किया था उसने भी उसी नौकरी पर आवेदन किया था उसकी सरकारी नौकरी पाने की बड़ी इच्छा थी उसका नाम वेटिंग लिस्प में था उसने नौकरी की उम्भीद छोड़ दी थी। रोहित की यह बात जब अशोक ने उसके पिता को बताई तो उसके पिता ने रोहित को बुलवाया तथा उससे कहा अगर वो नौकरी न करे तो अशोक को अवसर मिल जाएगा रोहित बोला मुझे तो पिताजी की बात मानकर नौकरी करना पड़ेगी इस पर वे सौदेबाजी पर उतर आए बोले अगर तुम नौकरी नहीं करोगे तो पच्चीस लाख रुपये दूँगा। रोहित ने जब मना किया तो बोले आधा बीघा जमीन भी ले लो । यह सुनकर रोहित सोच में पड़ गया अंततः उसने अशोक के पिताजी की बात मान ली। कुख दिन बाद जब अशोक की नौकरी लग गई । तो इधर अशोक के घर जश्न मनाया जा रहा था उधर रोहित के घर मातम पसरा हुआ था उसके पिताजी आग बबूला हो रहे थे गुस्से में उन्होंने उसे घर से निकाल कर उत्तराधिकार से वंटित कर दिया था। रोहित इसके लिए पहले से ही तैयार था इसलिए उसे कोई दुख नहीं हुआ उसने शहर के एक कारखाने में काम करके अनुभव प्राप्त किया। फिर माननीय मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर कि कोई अगर इस क्षेत्र में फेक्ट्री खोलेगा तो उसे अनुदान के साथ कर्ज दिया जाएगा तथा अन्य कई सुविधाएँ मिलेंगी। रोहित के पास जो आधा बीघा जमीन थी उससे लगी हुई दस एकड़ सरकारी जमीन भी थी उसने माननीय्र मुख्यमंत्री जी से इस संबंध में बात की तो वे बड़े खुश हुए वो सरकारी जमीन भी उसे दे दी गई बीस करोड़ रूपये का कर्ज दिया गया जिसमें दस करोड़ की सब्सिडी भी थी। रोहित ने दो साल में वहाँ फेक्टरी शुरू कर दी दो सो लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला बाकी और लोगों को व्यवसाय के अवसर मिले। दो साल में उसने सारा कर्ज उतार दिया उसकी शादी बड़े व्यवसायी की बेटी सुजाता से हुई वो उससे बड़ी फेक्ट्री की मालिक थी रोहित एक शानदार जिंदगी जी रहा था शहर का प्रतिष्ठित व्यक्ति था। फिर भी उसके पिताजी का गुस्सा कम नहीं हुआ था । उन्होंने उसे माफ नहीं किया था अशोक सरकारी नौकरी कर रहा था उसे पैंतीस हजार रुपये महीना वेतन मिल रहा था दो कमरे के सरकारी मकान में रह रहा था फिर भी सरकारी नौकरी के कारण उसका घमंड सातवें आसमान पर था।। मध्यम वरूगीय परिवार के लिए ये बहुत बड़ी बात थी। उनकी सोच यहीं तक सीमित थी इससे हटकर वे कुछ करना ही नहीं चाहते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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