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व्यंग्य: ख़ुशी और ग़म के अलग अलग हिसाब किताब

दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसके पास ख़ुशी ही ख़ुशी हों ग़म बिल्कुल हों हीं नही। या किसी के पास गम ही गम हो खुशी बिल्कुल हो नही हो । खुशी और गम साथ साथ चला करते हैं पर इनके हिसब किताब अलग अलग होते हैं। किसी से किसी की क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती।
वर्मा जी को शराब की लत थी वे सरकारी नौकरी करते थे लडका बेरोजगार था उसे नौकरी मिल नहीं रही थी वर्मा जी के वेतन का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था वे किराये के मकान में रह रहे थे अधिक शराब के सेवन से उनका लीवर खराब हो गया किडनी फेल हो गईं। और वे रिटायरमेन्ट के एक साल पहले ही परलोक सिधार गए उनकी मौत से सब दुखी थे। यह दुख तो कभी दूर नहीं हो सकता था पर इस दुख के साथ बहुत सारी खुशियाँ भी आ गई थीं वर्मा जी को फन्ड ग्रेच्यूटी बीमा जीपी एफ के रूप में एक बड़ी रकम उनकी पत्नी को मिली थी इसके अलावा पेंशन भी अच्छी मिल रही थी लड़के को अनुकंपा नौचरी मिल गई थी फंड के पैसों से उन्होंने मकान खरीद लिया था लड़के की शादी हो गऍई थी। यह सब खुशियाँ उन्हें मिली थीं भले ही वे ये खुशियाँ खुलकर नहीं मना सकते थे पर इनकी अनुभूति तो उन्हें हो ही रही थी। जैसे सुब्ह किसी को चोट लग गई हो और शाम को उसका रुका हुआ पैसा मिल गया हो दुख के साथ खुशी भी मिलेगी औ दोनों के असर भी अलग अलग होंगे। ऐसा प्रायः सभी के साथ होता है। जब अत्यधिक खुशी होती है तो हम हमारे दुख थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं पर उनका अहसास तो रहता ही है । और यह अहसास ही हमें हमारे दुख की याद दिला देता है और हम फिर से दुखी हो जाते हैं। यह क्रम हमारे भीतर ही चलता रहता है।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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