सुख के दिनों में अपनापन जताकर लाभ उठाने वालों की अच्छी खासी संख्या रहती है। जिससे यह पता ही नहीं चलता कि इनमें कौन सही है और कौन गलत। कहते हैं सच्चे दोस्त की पहचान दुख में होती है दुख में जो हमारे साथ खड़ा हो तथा हमें पूरा सहयोग दे वही सच्चा दोस्त होता है पर ऐसे लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। जब कोई दुख से जूझता रहता है तब उसके साथ गिने चुने दोस्त ही होते हैं जो किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते न ही लाग लपेट की बातें करते हैं। जब व्यक्ति दुख से उबर जाता है । और जैसे ही उसके दिन बदलते हैं और सुख के साधन जुटने शुरू हो जाते हैं वैसे ही मतलबी और ख़ुदगर्ज लोग उस के करीब आना शुर्रू कर?देते हैं।तथा अपनेपन का वो अभिनय करते हैं कि सामने वाला पूरी तरह भ्रमित हो जाता है दुख के साथी न दिखावा करते हैं न लाग लपेट भरी बातें न उन्हें चापलूसी करना आता है इसलिए वे जल्दी ही दरकिनार कर दिए जाते हैं सुखी आदमी जब खुशामदियों को अपना चुका होता है इस लिए वो भी उन पर ध्यान नहीं देता सुख में उसे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं होता कि दुख में इनमें से कोई भी आसपास मँडराएगा तक नहीं। रामनरेश सरपंच का चुन...
आज के इस तनाव भरे जीवन में ख़ुशी बहुत दुर्लभ होती जा रही है लोग इतने तनाव में रहते हैं कि छोटी मोटी ख़ुशी उन पर कुछ असर नहीं डाल पाती है। बड़ी ख़ुशी भी वे ठीक से मना नहीं पाते हैं कोई उनकी ख़ुशी पर बधाई दे तो मुँह बनाकर बोलते हैं काहे की ख़ुशी कैसी ख़ुशी । फिर?बुरा मुँह बनाकर अपनी हज़ार परेशानियाँ गिनाने बैठ जाते हैं। और कुछ इस तरह से चित्रण करते हैं कि सुनने वाला जो बधाई देने आया था तब बड़ा ख़ुश मिजाज था अब गहरे दुख के सागर में डूबा दिखाई देने लगता है। ऐसे लोग हमेशा रोनी सूरत बनाए हुए मिलेंगे। कभी किसी ने उन्हें खुलकर हँसते हुए नहीं देखा होगा यह जब घर में आते हैं। तो इनकी त्यौरी चड़ी होती है कभी बच्चों पर झल्लाते हैं तो कभी पत्नी पर अपनी खीझ निकालते हैं इनके आते ही घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे घर में कर्फ्यू लगा हो। जब यह घर से जाते हैं तो पूरे घर का माहौल बदल जाता है। रस्तोगी साहब ने दो लाख में नई इलेक्ट्रिक स्कूटी ली थी। जिसमें डेढ़ लाख रुपये का लोन लिया था। उनके पास जो स्कूटी थी वो ठीक ठाक थी अच्छी चल रही थी मगर दिखावे के फेर मेअं उन्होंने यह इलेक्ट्रिक स्क...