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व्यंग्य : संबंधों की बेकद्री

दूसरों को ख़ुश करने के लिए कभी कभी कुछ लोग अपनों की बेकद्री कर देते हैं जो बाद में उनको बड़ी भारी पड़ती है। जो हमारा शुभचिंतक होता है वो हमें चाहता है इसलिए वो हमारी कड़वी बात भी हँसकर सहन कर लेता है और इसका फायदा उठाकर लोग उसकी बेकद्री करना शुरू कर देते हैं। लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि हर चीज की हद होती है जैसे ही हद पार होजाती है और पानी सर से गुज़र?जाता है। सबंधों की उसी वक्त हत्या हो जाती है और हम सच्चे शुभचिंतक से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं सुनील राकेश का गहरा दोस्त था हर मुश्किल में उसके काम आता था । नर्म स्वभाव का इंसान था राकेश कभी गुस्से में सनील से कुछ कड़वी बात भी कह देता था तो वह इस पर अधिक ध्यान नहीं देता था राकेश ने इसे उसकी कमजोरी समझा वो वह और लोगों के सामने उसका अपमान करने लगा। एक बार राकेश अपने अधीन काम करने वाले मज़दूर की कामचोरी और लेटलतीफी से परेशान था वो उससे खुलकर कुछ नहीं कह सकता था ऐसे ही वो गुस्से से भरा बैठा था तभी सुनील वहाँ आ गया । उसने सुनील को मुहरा बनाया उसको सुनाते हुए उसने सुनील से कहा तुमसे बड़ा कामचोर निकम्मा नकारा मैंने आज तक नहीं देखा तुम ...
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व्यंग्य : झूठी क़समें खाने वाले

जो लोग बार बार क़सम खाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं वे अक्सर झूठै और?धोखेबाज भी हो सकते हैं इसलिए कहा भी जाता है कि कसमें खाने वाले झूठे होते हैं कुछ लोग कहते हैं तुम्हारे सिर की कसम मैं झूठ थोड़ी कह रहा हूँ वे झूठ होते हैं ये लोग ख़ुद के सर की क़सम कभी नहीं खाते। बाज़ार में एक कपड़े की दुकान से नीरज ने जीनूस और?टी शर्ट का सौदा किया । दुकानदार ने उसकी कीमत ढाई हज़ार रुपये बताई नीरज ने कहा यह तो बहुत ज्यादा हैं कुछ कम करो इस पर दुकानदार ने पहले तो खूब कसमें खाईं फिर भाव ताव करते हुए इच्कीस सौ रुपये पर आ गया। बोला दो हज़ार रुपये में तो यह मुझे पड़ी है । फिर कसम खाकर बोला इतनी बड़ी दुकान लेकर बैठा हूँ क्या सौ रुपये भी नहीं कमाऊँ। नीरज जब जाने लगा तो दुकानदार बोला अच्छा बोलो कितना दोगे नीरज ने कहा बारह सौ रुपये से एक रुपया भी ज्यादा नहीं दूँगा उनमें काफी देर तक बहस हुई पर?नीरज टस से मस नहीं हुआ आखिर लुकानदार उसे बारह सौ रुपये में ही देने को तैयार हो गया। शीरज ने बारह सौ रुपये दिए वो उसने चुपचाप गिनकर रख लिए। नीरज ने जब उसको दोस्त को बताया कि ये दुकान से बारह सौ रौपये में लिए ...

व्यंग्य : आसमान से गिरे खजूर?में अटके।

जो लोग अनुचित रूप से धन कमाते हैं वे अभिमान में चूर होकर यह भी भूल जाते हैं कि कभी अगर वक्त ने पल्टी खाई तो उनका अंजाम क्या होगा वे तो यह मानकर चलते हैं कि वो सही हैं बाकी सभी गलत और?ऐसे ही वे सब पर भारी पड़ते रहेंगे और लोग उनसे इसी तरह दबकर रहते रहेंगे । लेकिन जब इनका समय विपरीत होता है तब इनकी हालत आसमान से गिरकर खजूर में लटके रहने वाले की तरह होती है। ऐसे लोगों को किसी की हमदर्दी भी नहीं मिलती क्योंकि इनके आसपास के लोग सभी इनसे तंग रहते हैं ऐसा कोई नहीं बचता जिनको इन्होंने परेशान न किया हो इसलिए जब इनके बुरे दिन आते हैं तो इनसे पीड़ित लोग बड़े खुश होते हैं । सोचते हैं इन्हें अपनी करनी का फल मिला भले ही देर से मिला हो। निखिल एक कमाऊ विभाग में सरकारी अधिकारी था उसके विभाग में धन बरसता था लोग वेतन से कई गुना ज्यादा रिश्वत से कमाते थे जिस से उनका परिवार विलासिता का जीवन जी रहा था वे रिश्वत के पैसे बड़ी बेरहमी से वसूलते किसी को फटेहाल देखकर भी उनका मन नहीं बदलता था जब तक रिश्वत के पैसे पूरे नहीं मिल जाते थे तब तक काम को अटकाए रहते थे। सुरेश की बेपी की शादी थी जिसमें खर्च के लि...

व्यंग्य : बेवज़्ह खिल्ली उड़ाने वाले

जिन के पास कोई काम नहीं होता या काम नहीं करना चाहते या जो जोखिम लेने से बचते हैं आराम तलब होते हैं वे काम करने वाले मेहनती की बिना कारण खिल्ली उड़ा कर अपने आप को सही ठहराते हैं तथा उसे मजाक का पात्र बनाकर ख़ुश होते रहते हैं। जबकि जिसे गरीबी के अभिशाप से मुक्ति पाने की चाह होती है वो सिर्फ अपने काम से मतलब रखता है। वो किसी ऐसे व्यक्ति की परवाह नहीं करता जो खुद लूजर होकर उसकी खिल्ली उड़ाता हो। कुछ लोग मेहनत से धन कमाते हैं । और ओवर टाइम करने से भी नहीं घबराते तथा फिजूल खर्ची से बचकर रहते हैं वे अपनी गरीबी के अभिशाप से जल्दी मुक्ति पा लेते हैं। चंद्रकाँत ने दिनभर काम किया था खाना खाचर शाम को वो चौराहे तक टहलने आया था वहाँ कुछ लोग ताश खेल?रहे थे ताश खेलते हुए उन्हें पूरा दिन हो गया था। चंद्र कांत थोड़ी देर के लिए वहाँ रुका तभी मोहन वहाँ आया वो बोला गन्ने की ट्राली भरना है चार लोगों की जरूरत है दो झंटे का काम है हर एक को पूरे चार सौ रुपये मिलेंगे। यह सुनकर ताश छेलने वालों में से कोई टस से मस तक नहीं हुआ किसी ने उसकी बात पर ध्यान तक नहीं दिया पर चंद्रकांत तैयार हो गया। हारकर दोनों...

व्यंग्य : अहसान भूलने वाले

जो अच्छे लोग होते हैं वो किसी का छोटा से छोटा अहसान भी नहीं भूलते तथा उस अहसान का बदला चुकाने का अवसर तलाशते रहते हैं और जब उन्हें मौका मिल जाता है तो फौरन उस अहसान का बदला चुका देते हैं तभी उनको चैन मिलता है। दूसरी ओर वे लोग भी हैं जो अपने ऊपर किया गया किसी का बड़े से बड़ा अहसान भी नकार देते हैं आजकल इनकी संख्या ज्यादा ही बढ़ती जा रही है। जब इनकी गरज होती है तब खूब चिकनी चिपड़ी बातें करते हैं ख़ुशामद में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहने देते ।और जब उनकी गरज निकल जाती है तो ऐसे मुँह फेर लेते हैं जैसे की जानते ही न हों कई लोगों का बहुत सा पैसा इनके फेर में पड़कर डूब गया है। माँगी लाल ने दस साल पहले रोशन लाल से पाँच लाख रुपये का कर्ज लिया था तब माँगीलाल अपना मकान बनवा रहा था जिसमें लागत का सत्तर प्रतिशत रुपया रोशन लाल द्वारा दिए गए कर्ज से प्राप्त हुआ था रोशनलाल ने अपने गाँव की जमीन बेची थी। उसके पैसे उनके पास थे। जो उन्होंने माँगीलाल की दयनीय दशा पर द्रवित होकर दे दिए थे उस समय?माँगीलाल ने सात लाख में पूरा मकान बनवा लिया था। जाज उस मकान की कीमत सत्तर लाख रूपये हो गई थी। उस समय सो...

व्यंग्य : ब्याज का चंगुल

ब्याज का चंगुल वो चंगुल है जिसमें फँसना तो आसान है पर उससे छूटना आसान नहीं होता लोग कर्ज लेकर बड़े खुश होते हैं जिसका लोन स्वीकृत हो जाए उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। उस समय वो इस पर तनिक भी विचार नहीं करता कि इसे अदा कैसे करेगा फिर नौबत यह आती है कि गिरवी रखी संपदा हाथ से निकल जाती है अशोक जी ने मकान बनवाते समय एक साहूकार से पाँच लाख रुपये का कर्ज लिया था उसकी ब्याज दर भारी थी मकान उन्होंने कुछ ज्यादा ही अच्छा बना लिया था जिसकी छोटी मोटी उधारी बहुत लोगों की बकाया थी। कर्ज देने वाले ने भी तकाजा नहीं किया पाँच साल बाद पूरे बत्तीस लाख रुपये की वसूली करने वो अशॅक के पास आया तीन प्रतिशन मासिक चक्रवर्ती ब्याज बढ़ते बढ़ते पूरे सत्ताइस लाख रुपये हो गया था। इतनी बड़ी राशि का सुनकर अशोक जी के होश गुम हो गए कर्ज देने वाला दबंग था अशोक के पसा और लोगों का कर्ज भी था। हारका उसे वो मकान बेचना पड़ा उस पैसे से अशोक जी ने कर्ज अदा किया। आजकल वे किराये के मकान में रह रहें। हैं कभी कभी वे सोचते हैं अगर उन्होंने बिना कर्ज लिए मकान बनाया होता वो भले ही छोटा तो तो आज ये नौबत नहीं आती...

व्यंग्य : कड़वा बोलने वाले

यह बात सही है कि कड़वा बोलने वाले बहुत कम लोकप्रिय होते हैं वे न किसी के चहेते होते हैं न ही कृपापात्र न कोई उन पर अहसान करता है न वे किसी का अहसान लेना पसंद करते हैं। बोलते कड़वा जरूर?हैं मगर बात पते की करते हैं जिसमें भलाई छिपी होती है इनके बोल बुरे जरूर लगते हैं मगर हितकारी होते हैं। दूसरी ओर मीठा बोलने वाले होते हैं हाँलाँकि मीठा बोलना अच्छा होता है मगर अधिक मिठास हमेशा अच्छी नहीं होती अगर मीठा बोलने वाला चापलूस और?मतलबी हो तो वो बहुत?बड़ा चालाक साबित होता है। मीठा बोल कर ये मुफ्त का चंदन घिसने में माहिर होते हैं जेब दूसरे की होती है और मज़े ये करते हैं ऐसे लोग किसी बड़े आदमी के दरबारी होते हैं जो उसके पैसे पर मौज करते हैं बदले में इन्हें बस जी हुज़ूरी करना होती है जो यह अच्छी तरह करना जानते हैं ।  सुरेश कड़वा बोलता था चाहे किसी को बुरा लगे या भला उसे पता चला कि दिनेश के दोस्त दुश्मन से मिलकर उसकी बुरी तरह पिटाई करने की योजना बना चुके हैं। दिनेश को उन्होंने रोक रखा है उससे बड़ी चिकनी चिपड़ी मीठी बातें कर रहे हैं उसकी खूब आव भगत की जा रही है मन पसंद नाश्ता कराया जा रहा है। ...