यह बात सही है कि कड़वा बोलने वाले बहुत कम लोकप्रिय होते हैं वे न किसी के चहेते होते हैं न ही कृपापात्र न कोई उन पर अहसान करता है न वे किसी का अहसान लेना पसंद करते हैं। बोलते कड़वा जरूर?हैं मगर बात पते की करते हैं जिसमें भलाई छिपी होती है इनके बोल बुरे जरूर लगते हैं मगर हितकारी होते हैं। दूसरी ओर मीठा बोलने वाले होते हैं हाँलाँकि मीठा बोलना अच्छा होता है मगर अधिक मिठास हमेशा अच्छी नहीं होती अगर मीठा बोलने वाला चापलूस और?मतलबी हो तो वो बहुत?बड़ा चालाक साबित होता है। मीठा बोल कर ये मुफ्त का चंदन घिसने में माहिर होते हैं जेब दूसरे की होती है और मज़े ये करते हैं ऐसे लोग किसी बड़े आदमी के दरबारी होते हैं जो उसके पैसे पर मौज करते हैं बदले में इन्हें बस जी हुज़ूरी करना होती है जो यह अच्छी तरह करना जानते हैं । सुरेश कड़वा बोलता था चाहे किसी को बुरा लगे या भला उसे पता चला कि दिनेश के दोस्त दुश्मन से मिलकर उसकी बुरी तरह पिटाई करने की योजना बना चुके हैं। दिनेश को उन्होंने रोक रखा है उससे बड़ी चिकनी चिपड़ी मीठी बातें कर रहे हैं उसकी खूब आव भगत की जा रही है मन पसंद नाश्ता कराया जा रहा है। ...
सुख के दिनों में अपनापन जताकर लाभ उठाने वालों की अच्छी खासी संख्या रहती है। जिससे यह पता ही नहीं चलता कि इनमें कौन सही है और कौन गलत। कहते हैं सच्चे दोस्त की पहचान दुख में होती है दुख में जो हमारे साथ खड़ा हो तथा हमें पूरा सहयोग दे वही सच्चा दोस्त होता है पर ऐसे लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। जब कोई दुख से जूझता रहता है तब उसके साथ गिने चुने दोस्त ही होते हैं जो किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते न ही लाग लपेट की बातें करते हैं। जब व्यक्ति दुख से उबर जाता है । और जैसे ही उसके दिन बदलते हैं और सुख के साधन जुटने शुरू हो जाते हैं वैसे ही मतलबी और ख़ुदगर्ज लोग उस के करीब आना शुर्रू कर?देते हैं।तथा अपनेपन का वो अभिनय करते हैं कि सामने वाला पूरी तरह भ्रमित हो जाता है दुख के साथी न दिखावा करते हैं न लाग लपेट भरी बातें न उन्हें चापलूसी करना आता है इसलिए वे जल्दी ही दरकिनार कर दिए जाते हैं सुखी आदमी जब खुशामदियों को अपना चुका होता है इस लिए वो भी उन पर ध्यान नहीं देता सुख में उसे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं होता कि दुख में इनमें से कोई भी आसपास मँडराएगा तक नहीं। रामनरेश सरपंच का चुन...