सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं कि संसार में दुख तो बहुत है पर सबसे बड़ा दुख भूतपूर्व होने का है। जिसमें व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा रुतबा पद के छिनते ही मिट्टी में मिल जाता है जो झुकझुकक सलाम करते थे वे देखते ही मुँह मोड़ लेते हैं जो चाय मुफ्त में पीने को मिल जाती थी वो अब पैसे देने के बाद भी बेस्वाद मिलती है। कोई उधारी में सामान नहीं देता जो झुक कर बात करते थे वे आँखें तरेरते हैं। हाकिम सिंह जब ग्राम के सरपंच थे तब सत्ताधारी दल के जिला संगठन मंत्री भी थे। उनका बड़ा रुतबा था उनके यहाँ हाजिरी लगाने अच्छे लोग आते थे । सब उनकी कृपा के आकांक्षी रहते थे। जिससे जो कह दिया सो कह दिया बस वाला उनसे कभी किराया नहीं लेता था। जबसे चुनाव हारे और प्रदेश में भी उनकी पार्टी हार गई तब से उनके बुरे दिन शुरू हो गए अब तक तो हवा में उड़ रहे थे चुनाव हारते ही जमीन पर गिरकर चारों खाने चित हो गए थे अब उनकी न तो कोई पूछ परख रह गई थी न सुनवाई हो रही थी। उनसे एक गलती हो गई वे अपने एक समर्थक को छुड़ाने थाने पहुँच गए। उनका मानना था कि प्रभारी महोदय उनके अच्छे परिचित हैं । मगर हुआ उल्टा उन्हें ही हवालात में बंद कर दिया पुलिस ने फिर अप...
हाल की पोस्ट

व्यंग्य : तानाशाह

जो हद दर्जे के अहंकारी अपने आपको सबसे अक्लमंद बाकी सभी को मूर्ख समझने वाले होते हैं वे तानशाह से कम नहीं होते इनके साथ जो रहते हैं वो प्रायः इनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले होते हैं चाहे उसमें सामने वाले का कितना ही नुक्सान क्यों न हो।  जिनका रवैया तानाशाही होता है वो कितना ही नुक्सान उठा लें पर अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं होते । उन्में से कुछ लोग होते हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते बस अपनी सुनाए जाते हैं फिर अंतिम निर्णय भी दे देते हैं कोई तर्क अथवा बहस की कोई गुंजाइश नहीं रखते। इस तरह के लोगों में निशा भी शामिल थी । एक बार क्या हुआ कि वो अपने सगे संबंधियों के साथ किसी तीर्थ यात्रा पर गए वहाँ भी निशा ने किसी की नहीं चलने दी। किसी ने कुछ कहने की कोशिश भी की तो उसे बेइज्जत होना पड़ा। उसके पति अनिल की तो उसने सबके सामने बड़ी बेइज्जती की अनिल को किसी ने बताया था कि यहाँ एक सेवा संस्थान द्वारा मात्र दस रुपये भें भरपेट गरमागरम भोजन मिलता है जिसमें मिष्ठान्न भी शामिल होता है उससे अच्छा भोजन आठ सौ रुपये की रेस्टोरेन्ट की थाली में भी नहीं मिलता। काउण्टर खुला हुआ था कूप...

व्यंग्य : समरथ को नहीं दोष गुसाईँ

हमारे समाज की संरचना शायद कुछ ऐसी है जिसमें समर्थ को कोई दोषी नहीं ठहराता उसके अवगुणों को भी गुण मान लिया जाता है उसकी बड़ी गलतियाँ भी लोग नज़र अंदाज कर देते हैं। जबकि कमज़ोर की छोटी गलती को बढ़ा चढ़ाकर बडी बताई जाती है और उसे कड़ी सजा दे दी जाती है उसकी कहीं कोई सुनवाई भी नहीं होती। कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई समर्थ जब गलती करता है तो उसका बदला छोटों से निकाला जाता है। उसे जबरन दोषी ठहराकर उसे इसकी कड़ी सजा दे दी जाती है। छोटे लाल जमींदार के यहाँ हाली का काम करता था खेत में बनाए मालिक के दिए मकान में रहता था । एक दिन उसका नौ वर्ष का लड़का सतीश रोते हुए आया और बोला एक लड़के ने जब में खेल?रहा था तब मुझे अकारण आकर मारा और बहुत मारा कह रहा था कि तेरे बाप में भी इतनी हिम्मत नहीं है जो मेरा कुछ बिगाड़ सके। सुनकर छोटेलाल को बहुत गुस्सा आया उसने बाँस की पतली छड़ी उठाई ओर उस लड़के के पास आया। लेकिन लड़के को देखते ही उसके हाथ पैर ढीले पड़ गई हाथ की छड़ी छूट गई। बड़े अदब से बोला छोटे मालिक आप । वो लड़का छोटेलाल के मालिक का बेटा था शहर में रहता था नंब एक का घमंडी गरीबों से नफ़रत करने ...

व्यंग्य : संबंधों का निर्वाह

कहते हैं कि अगर अच्छे रिश्तेदार से ज्यादा कोई सुख प्रदान नहीं कर सकता । तो वहीं बुरे रिश्तेदारों से अधिक दुखदायी कोई भी नहीं हो सकता। इन रिश्तों में अपने खून के रिश्ते भी शामिल होते हैं। सबसे निकट का रिश्ता पति पत्नी का माना जाता है पर उनमें भी अगर अहं की लड़ाई हो या किसी एक का स्वभाव खराब हो तो दूसरे की ज़िंदगी नर्क से भी अधिक बदतर हो जाती है एक रिश्ता जीजा साले का भी होता है जिसमें सबसे ज्यादा विवादास्पद रिश्ता साले का समझा जाता है तभी तो किसी को साला कहना गाली समझी जाती है। अगर किसी की तरक्की देखकर सबसे अधिक जलने वालों की सूची बनाई जाए तो उसमें अधिकांश रिश्तेदार ही शामिल होते हुए नज़र आएँगे। हाँलाकि इसमें मतभेद हो सकते हैं पर ज्यादातर लोगों का यही कहना होता है। अनिल ने एक आवासीय भूखण्ड का सौदा किया था पास में ही उसके साले दीपक का भी मकान था। अनिल से इतनी गलती हो गई कि उसने भूखण्ड की रजिस्ट्री होने के पहले यह बात अपने साले को बता दी। साले ने ऊपरी तौर पर तो ख़ुशी जताई पर भीतर ही भीतर?जल भुनकर खाक हो गया। उसने भूखण्ड के मालिक से मिलकर उसे इतना भड़काया कि उसने भूखण्ड बेचने से ...

व्यंग्य : सरकारी नौकरी वाला दूलूहा

वैसे तो सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं है । पर जिनकी सरकारी नौकरी लग जाती हैं उनके यहाँ विवाह योग्य लड़कियों के माता पिता की भीड़ लगना शुरू हो जाती है उसी हिसाब से दहेज भी निर्धारित हो जाता है। ऐसे दूल्हे के पिता को अपने बेटे के लिए दुल्हन की तलाश नहीं करना पड़ती । ऐसे दूल्हों की संख्या बहुत कम होती है तथा विवाह योग्य लड़कियों की संख्या कई गुना अधिक ऐसे में जो सबसे अधिक रुपया देता है वो अपनी बेटी की शादी ऐसे दूल्हे से करने में सफल हो जाता है बाकी सब मायूस हो जाते हैं। जिस तरह सरकारी नौकरी करने वाले लड़कों की पूछ होती है उसी तरह सरकारी नौकरी करने वाली लड़की के पिता के दिमाग भी सातवे आसमान पर होते हैं ऐसी लड़की से विवाह करने वाले लड़कों की संख्या कम नहीं होती वर पक्ष द्वारा इनको दहेज रहित शादी के ऑफर दिए जाते हैं ऐसी लड़की के नैन नक्श पर भी ध्यान नहीं दिया जाता सरकारी नौकरी की विशेषता ही ऐसी है जिसके सामने बाकी सब कुछ गौण हो जाता है। विशाल एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था साठ हजार?रुपये वेतन मिल रहा था उसकी शादी अंजलि से लगभग तय हो गई थी लेकिन जब अंजलि को सरकारी नौकरी करने वा...

व्यंग्य : सफलता की चमक

सफलत की चमक लोगों को भले ही चकाचौंध कर दे पर जिसको सफलता भिलती है उससे पूछो इसके लिए उसने कितने प्रयास किए हैं। सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता यह कठोर?परिश्रम लग्न से प्राप्त होती है जो सफल होता है वो सोने की तरह खरा होता है। हीरा कितना ही कठोर क्यों न हो उसे भी अगर तराशा न जाए तो वह भी अपनी पूरी चमक नहीं बिखरा सकता। । पारखी कहते हैं कि सोने में प्राकृतिक रूप से कोई खोट नहीं होती यही उसकी विशेषता होती है और यही उसकी चमक का सबसे बड़ा कारण जो किसी भी हाल में फीकी नहीं होती ना ही सोने में कभी जंग लगती है। सोने में खोट अगर मिला भी दी जाए तो उसे इतना तपाया जाता है कि खोट सारी जलकर राख हो जातो है पर सोने में और अधिक निखार आ जाता है। शेखर जब कलेक्टर बनकर जिला मुख्यालय पर आए कार्यभार ग्रहण करने के बाद जब उन्होंने स्टॉफ के सदस्यों से परिचय प्राप्त किया तो अपने सहपाठी सुधीर को देखकर चौंक गए। सुधीर ने स्नातक परीक्षा में बहत्तर प्रतिशत?अंक प्राप्त कैए थे जबकि उनके अठ्ठावन प्रतिशत अंक आए थे उसका सबसे बड़ा कारण था कि सुधीर के चाचा यूनिवर्सिटी में सेवारत थे उनके कारण षुधीर के इतने अं...

व्यंग्य : बदला

जिस तरह दिवाली पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं कि जो कि एक बुराई हे। उसमें जो बड़ी रकम हार जाते हैं उसकी क्षतिपूर्ती करने में उन्हें पूरा साल लग जाता है उसी तरह होली पर लोगो को दुश्मनी निकालने का मौका मिल जाता है होली की आड़ में वे अपने दुश्मन की तबियत से पिटाई करके अपना बदला निकाल लेते हैं । तभी तो यह कहावत चल गई कि दिवाली का लुटा और होली के पिटे के ठीक होने में पूरा साल लग जाता है। कुछ लोगों बदला निकालने की भावना बहुत तीव्र होते हैं जब तक यह अपना बदला नहीं निकाल लें ते तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ता सुरेश को कक्षा में शिक्षक की मार?खाना पड़ी वहीं राकेश खड़ा था । सुरेश ने यह मान लिया कि राकेश के कारण उसकी पिटाई हुई। उसके मन में बदला लेने की भावना तीव्र हो गई । उसने छल कपट से राकेश को अपने साथ ले लिया अपने चार दोस्तों को भी इशारा कर दिया फिर किसी खँडहर में?सुन सान जगह उसके और उसके दोस्तों ने मिलकर राकेश की खूब पिटाई कर दी तब कहीं उसके मन को चैन मिला। कई लोग ऐसे होते हैं जो बात तो भले की करते हैं पर वो होती है बहुत कड़वी। जो कुछ लोगों को बुरी लगती है और वो उसका बदला भी निकालते हैं चाहे उ...