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व्यंग्य : असफलता के बहाने

असफल इंसान के पास अपनी असफलता के बहानों की कोई कमी नहीं होती जबकि सफल इंसान के पास कोई बहाना नहीं होता असफल व्यक्ति अपनी असफलता का दोषी दूसरों को ठहराते है जबकि इसके सबसे बड़े दोषी वे खुद होते हैं। क्योंकि वे अनेकों अवसर गँवा चुके होते हैं । या वे आसानी से सब कुछ हासिल करना चाहते हैं ऐसे लोगों में धैर्य लगन की कमी होती है। इनकी निगाहों में बहुत से लोग होते हैं । जिन्हें वे अपनी असफलता का कारण बताते हैं।  रजनी ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की थी बी ए पास तो उसने प्राइवेट परीक्षा देकर किया था। दूसरी ओर उसके भाई आलोक को मँहगे निजी स्कूल में पढ़ाया गया था कोचिंग में भेजा गया पर वो दसवीं पास भी नहीं हो पाया था। और रजनी ने पी एस सी ब्रेच कर प्रशानिक अधिकारी का पद हासिल कर लिया था। उसके ऑफिस में चपरासी का पद खाली थी जिसके लिए आलोक ने आवेदन किया था। रजनी ने उसे टिप्स दिए इंदर व्यू की तैयारी कराई फिर भी उसका चयन नहीं हुआ तो आलोक ने इसे अपनी चूक नहीं मानी बल्कि रजनी को इसका दोषी ठहरा दिया। आलोक की बात सबने सच मान ली रजनी की बात पर किसी ने विश्वास नहों किया हारकर रजनी को सरकारी बँगले ...
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व्यंग्य : झूठ की बुनियाद कहाँ

झूठ की बुनिया नहीं होती फिर भी वो मज़बूती से ज़मा हुआ दिखाई देता हैं। जबकि यह केवल हमारा भ्रम होता है। इतने बड़े से झूठ को एक छोटा सा सच गिराकर चकनाचूर कर देता है। फिर भी लोग झूठ को महत्व देते हैं और सच को झुठलाने का असफल प्रयास करते हुए नज़र आते हैं। झूठ की जुबान बड़ी तेज होती है झूठ बड़ी होशियारी से बहुत दिमाग लगाकर कहा जाता है झूठ कहने का तरीका बड़ा प्रभावशाली होता है उसके मुकाबले सच अधिकतर,ख़ामोश रहता है सच आपनी पैरवी झूठ की तरह नहीं करता न ही सच को किसी को मनवाने की जरूरत पड़ती है जबकि झूठ इसके बिना रह नहीं सकता। राजेश शहर में मज़दूरी करता था एक कमरे के घर में पत्नी बच्चों के साथ रहता था लेकिन सबको यही बताता थे कि वो जागीरदार परिवार से है गाँव में उसकी बहुत बड़ी हवेली है । पिताजी से अनबन होने के कारण वो यहाँ रह रहा है। लोग उसकी बात मान भी लेते थे । एक बार उसके गाँव का एक आदमी अनायास वहाँ आ गया। उसने राजेश की सारी असलियत लोगों को बता दी लोगों ने जब यह सच राजेश को बताया तो उसने उसे झूठा ठहरा दिया और यही उसकी गलती रही उसके सारे प्रयासों के परिणाम आखिर,उल्टे हुए और उसे अपनी झूठ...

व्यंग्य : अपमान के घूँट

मज़बूरी इंसान को इतना झुका देती है कि उसे अपने जीवन से नफ़रत होने लगती है। या फिर एसा व्यक्ति अपमान के कड़वे घूँट पीने का आदि हो जाता है विशेष कर कमजोर,तबके के लोग जो अत्यंत गरीबी में जीवन यापन कर रसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो रहा हो वो अपमान का कड़वा घूँट पी जाते हैं। कुछ जिम्मेदारियों के बोझ के तले दबे होते हैं वे भी अपमान को सहकर हँसते रहते हैं इसके अलावा और वे कर ही क्या सकते हैं। राकेश के पास लोडिंग ऑटो था। जिससे उसे अचछी खासी आय हो जाती थी परिवार की गुजर बसर आराम से चल रही थी । तभी राकेश बीमार हो गया पहले उसे टाइफाइड हुआ फिर पीलिया भी हो गया तीन महीने वो काम पर नहीं जा सका बीमारी के इलाज में उसका लोडिंग ऑटो भी बिक गया था। लेकिन सवाल पेट का था। गृहस्थी की जिम्मेदारी थी तभी किसी ने कहा कि बाबूलाल सेठ को कार के लिए ड्राइवर चाहिए। राकेश ने पन्द्रह हजार रुपये के वेतन पर वो नौकरी कर ली। साबूलाल जी का बर्ताव तो ठीक था बाकी उनके घर में सभी बददिमाग थे। उसने नौकरी तो ज्वाइन कर ली थी। पर इसके बदलें में उसे रोज अपमेन के घूँट पीना पड़ते थे। नौकरी छोड़ नहीं ...

व्यंग्य : भलाई का दंड

जब समाज का नैतिक रूप से पतन होने लगे तो भलाई किसी को अच्छी नहीं लगती यहाँ तक कि भला करने वाला लोगों को बुरा लगने लगता है। जबकि लोभी लालची मतलबी मुनाफाखोर किसी की मज़बूरी का फायदा उठाने वाले खूब फलते फूलते हैं और किसी को उन पर ऐतराज भी नहीं होता पर जो भला करता है वो सभी को खटकने लगता है। शिक्षच राधेश्याम जी को छात्रों के पासपोर्ट साइज के फोटो की आवश्यकता थी कोई फोटोग्राफर नहीं था सो उहह उन्होॅने अपने केमरे से फोटो खींचे और प्रिंट कराकर उनका उपयोग कर,लिया इसके उन्होंने बच्चों से कोई पैसे नहीं लिए। प्रिन्ट में तीस रुपये का खर्च आया था वो उन्होंने स्वयं वहन कर,लिया जबचि एक निजी स्कूल ने एक फोटो के पिचहत्तर रुपये लिए जो लोगों ने बिना ना नुकर के दे दिए। उनसे कुछ गरीब लोग फोटो बनवाने आते और वो दो रुपये में पासपोर्ट फोटो निकाल कर,दे देते थे। एक दिन एक स्थानीय फोटो ग्राफर उनके पास आया बोला सर,यह रेट गिराकर काम करना बंद करो नहीं तो ठीक नहीं होगा हमारे धंधे पर,असर पड़ रहा है। सर को बाद में पता चला कि अगर,उन्होंने काम बंद नहीं किया तो उन्हें पॉक्सो एक्ट के केस में फँसाने की तैयारी ...

व्यंग्य : मुफ्त खोर

व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाकर मुफ्त खोरी करने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। ये दूसरों की कमाई पर मौज करते हैं । निर्माण कार्य,में लगे मज़दूर को दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद ढाइ सौ रुपये मिल रहे थे।पता चला कि उसके मजदूरी चार सौ रुपये थी ।उसके डेढ़ सौ रुपये कोई और हड़प रहा था। उसके पास ऐसे चालीस मजदूर थे जिनसे उसे रोज के छः हजार रुपये मिल रहे थे। बाकी चार,लाख रुपये उसने पन्द्रह प्रति शत मासिक की दर से कर्जे पर भी बाँट रखे थे जिनका प्रतिमाह ब्याज साठ हजार रुपये मिल रहा था। वो कोई काम नहीं करता था दिन भर स्क्रापियो में घूमता रहता था मजदूरों की निगाह मेः वो बड़ा आदमी था । इस तरह के मुफ्तखोर आपको हर,क्षेत् में मिल जाएँगे एक ने अपने परिचित से कहा कि मुझे प्लॉट खरीदना है। उसने एक प्रापर्टी डीलर के पास भेज दिया । प्लॉट बाइस लाख का था इसके उसे चवालीस हजार रुपये बिना कुछ किए धरे ही मिल गए। कुछ लोग सामान खरीदवाने के लिए दुकान पर ले जाते हैं बाद में दुकानदार से मोटी रकम वसूल लेते हैं। एक स्थान पर किसी ने कार खड़ी की सिर्फ जरा सी देर के लिए। जबकि वो कोई पार्किंग वाली जगह ...

व्यंग्य : चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले

कुछ लोग बड़े चालाक चतुर,चपल होते हैं वे किसी की खूब झूठी तारीफ करके उसे फुलाकर कुप्पा बना देते हैं जिससे वो अपनी औकात भूल जाता है फिर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करते हैं चने का ऐसा झाड़ तो नहीं मिलता जिस पर कोई आदमी चढ़ सके। लेकिन जो फूल कर,अपनी औकात भूल जाता है वो ऐसा मिटता है जिसका सँभलना मुश्किल हो जाता है। हाट बाजारों में अगरबत्ती के पैकेट से रुपये निकालने का झाँसा देने के लिए वे ठग अपने आदमी को पैकेट बेचकर मोटी रकम दिदलवा देते हैं उसके धोखे में तमाशबीन अगरबत्ती के पैकेट खरीदते चले जाते हैं लेकिन उन्हें,एक धेला भी नसीब नहीं होता। किसी को चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसा करते हैं। जिसका शिकार बनने वाला बेबस होकर रह जाता है। दंसरी ओर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मनोबल गिराकर उसकी भविष्य की संभावनाओं पर कुठाराघात करते हैं। यह किसी इंसान की योग्यता और कार्यक्षमता देखकर उससे जलन रखने लगते हैं। ऐसा इंसान अगर कोई स्टार्ट अप शुरू करना चाहे तो यह उसका मनोबल बुरी तरह तोड़कर रख देते हैं जिससे उसकी उन्नति के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। य...

व्यंग्य : फ़ुरसत से परेशान

एक ओर जहाँ लोग काम की अधिकता से हैरान है दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो फ़ुरसत से परेशान है उनके पास करने को कोई काम ही नहीं है वे काम करना चाहते हैं पर उनको समझ में ही नही आता कि वे क्या काम करें उनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो पहले काम के बोझ से लदे हुए थे वे चाहते थे कभी उनके पास भी फुरसत ही फुरसत हो। जब उन्हें फुरसत मिली तो कुछ दिन तो वे बड़े खुश रहे फिर वो फुरसत उनकी परेशानी का कारण बन गई अब वे काम करना चाहते हैं पर कोई उनसे काम कराना ही नहीं चाहता। राकेश एक दुकान पर काम करता था वो अपने काम में माहिर था लेकिन उसका व्यवहार सही नहीं था दो और काम करने वाले थे उन्हें वो परेशान करता था। कहता था सारा काम में ही तो करता हं यह दो करते ही क्या हैं। दुकानदार,ने उसे सबक सिखाने के लिए एक दिन कहा आज से राकेश कोई काम नहीं करेगा बस यह दुकान पर,आएगा और चुपचाप बैठा रहेगा इसे बैठे रहने की तनख्वाह मिलेगी राकेश को पहले तो खूब खुशी हुई बाद में वो फुरसत से परेशान हो गया। आखिर उसने काम के लिए मिन्नतें कीं माफ़ी माँगी तब कहीं उसे काम सौंपा गया। ऐसा ही लाभमल जी के साथ हुआ उनकी दुकान ऊनके बेटे नरेन्...