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व्यंग्य : झगड़े के बाद

जब आपस में खूब गहरी दोस्ती रहती है तब किसी को उनकी भलाई बुराई का पता नहीं चलता इसका पता तो तब चलता है जब उनमें दुश्मनी ठन जाती है इसके बाद,उनका आमना सामना होता है फिर वे आपस में लड़ते हुए एक दूसरे की बुराइयाँ खुलकर बताते हैं,एक दूसरे की पोल पट्टी खोलते हैं तब लोग जान पाते हैं,इनकी असलियत क्या है। जिनमें दोस्ती गहरी होती है तथा दोस्ती की जड़ें मज़बूत होती हैं । उनमें थोड़ी बहुत नौंक झौंक होती रहती है कभी हल्की फुल्की तकरार भी हो जाती है फिर मान मनौव्वल से दोस्ती और मज़बूत हो जाती है। क्योंकि वे एक दूसरे के हितैषी होते हैं एक दूसरे का भला चाहते हैं इसलिए वे दोस्ती पर कभी आँच नहीं आने देते सबसे अधिक बुरी मतलबी की दोस्ती होती है। ऐसे लोग दोस्ती का हाथ तभी बढ़ाते हैं जब उन्हें अपना मतलब निकालना होता है मतलब निकलते ही ये फिर कभी किसी प्रकार का वास्ता नहीं रखते । कुसुम और सरोज में ऐसी ही दोस्ती थी कुसुम थोड़ी सरल और भावुक थी जबकि सरोज चपल चालाक तथा मतलबी कुसुम भी मेहनत मजदूरी करती थी तथा उसका पति हलवाई था। सरोज ने उसकी खूब चानलूसी कर के उससे गयारह हजार रुपये उधार ले लिए थे कुसुम के ...
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व्यंग्य : मुझसा बुरा न कोय

अक्सर यह देखा जाता है कि जो लोग बुरे होते हैं वे सबको बुरा समझते हैं उनको किसी में कोई अच्छाई नज़र नहीं आती ऐसे लोग ज्यादातर,तनाव में रहते हैं उनको कभी को ई अच्छे मूड में नही देखता ज़माने भर की शिकायतों का इनके पास पुलिन्दा रहता है । इनके मुँह से कभी की तारीफ़ के दो बोल तक नहीं निकलते जैसा छल कपट छल,छिद्र,धोखा इनकी नस नस में भरा होता है वैसा यह सबमें समझते हैं। यह लोग अहसानफ्रामोश भी होते हैं कोई इनके लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा दे तब भी यह उसका अहसान नहीं मानते यह मतलब से वास्ता रखते हैं मतलब निकलने पर बिना आभार के यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते इनका साथ वो कहावतें पूरी तरह सही होती हैं जैसा करोगे वैसा भरोगे । करनी का फल तो भुगतना ही पड़ेगा जो लोग किसी के प्रति निष्ठा नहीं रखते उन पर कौन निष्ठा रखेगा। राकेश ऐसा ही इंसान था उससे उसके किसी परिचित ने कहा कि उसे मकान खरीदना है कोई बेचने वाला हो तो बताना। यह सुनते ही राकेश की आँखों में चमक आ गई उसने इसमें मोटी रकम वसूलने का मन बनाया। जबकि उस व्यक्ति ने इस पर बहुत अहसान किए थे पर राकेश सब कुछ भूल चुका था । अठ्ठाइस लाख का मकान उसने चौ...

व्यंग्य : विश्वासघाती

कहा जाता है कि जो विश्वासघाती होता हे वो पहले अपना विश्वास जमा देता है वो विश्वास किसी के दिल में इतनी गहराई से जमाता है कि सामने वाला सपने में भी यह नहीं सोच पाता कि यह कभी विश्वासघात भी करेगा । और यही उसकी सबसे बड़ी चूक होती है। वो विश्वास रखकर आश्वस्त हो जाता है विश्वासघाती यह अच्छी तरह से जनता है कि विश्वास को सिर्फ एक बार ही तोड़ा जा सका है। क्योंकि विश्वासघाती पर कोई कभी फिर से विश्वास नहीं करता। इसलिए वो तगड़ा अवसर ढूँढ कर ऐसा विश्वासघात करता है कि सामने वाले को कभी सम्हलने का ही मौका नहीं मिलता वो हक्का बक्का रह जाता है और विशूवासघाती विश्वासघात करके अपने संबंध हमेशा के लिए ख़त्म कर देता है। एक बहुत पुरानी घटना है पोस्ट ऑफिस में डाक सहायक की रिक्ति निकली थी। उस समय स्थानीय स्तर पर ही भर्ती हो जाती थी। दो मित्त थे जीतेन्द्र और,महेन्द्र जीतेन्द्र को इसकी खबर सबसे पहले चली उसके हायर सेकेण्डरी में बावन प्रतिशत अंक थे और महेन्द्र के छियालीस प्रतिशत। उसने यह बात महेन्द्र को बताई दोनों ने आवेदन तैयार किए जीतेन्द्र किसी कारण वश आवेदन जमा करने नहीं जा सका।उसने अपना आवेदन भी ...

व्यंग्य : अपनों की लूट

एक बुजुर्ग व्यक्ति कह रहे थे कि अपनी जीवन भर की कमाई को कौन लूटता है? फिर ख़ुद ही बोले सबसे पहले लुटेरे तो अपने वाले ही होते हैं जो बुढ़ापे में तुमसे तुम्हारी दुकान छीन लेते हैं। जमीन छीन लेते हैं मकान पर कब्जा कर लेते हैं इमोशनल ब्लेकमेल करके रकम जेवरात हथिया लेते हैं । पेंशनर की पैंशन छीन लेते हैं उसके लिए आपस में लड़ते हैं। ऐसा ही एक मामला एस डी एम साहब की कचहरी में पेश हुआ जिसमें बेटे बहू ने माँ की आठ एकड़ जमीन हथिया ली थी पूरा मकान हड़प लिया था माँ के लिए एक छोटी कोठरी छोड़ी थी उससे भी उसे बेदखल,करने की तैयारी चल रही थी। माँ को वो खाना भी नहीं देते थे माँ भीख माँगकर अपना पेट भर,रही थी और उसकी जमीन पर मौज करने वाले बहू बेटे पोते पोती पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। वे भाव शून्य संवेदना शून्य बने हुए थे किसी ने इसकी शिकायत एस डी एम साहब से कर दी तब उन्होंने पन्द्रह सौ रुपये की रेशि भरण पोषण के लिए बेटे से दिलवाने का निर्णय पारित किया। यह तो वो बात है जो सामने आ गई पर बहुत से मामले दबे हुए हैं किसी ने अपने ही घर में चोरी कर के बूढ़ी माँ के जेवर चुरा लिए हैं। एक बहू बेटे ने त...

व्यंग्य : चापलूसी की कला

आजकल चापलूसी ने भी कला का रूप धारण कर लिया है यह ऐसी कला है जिसके कारम मूर्ख भी विद्वानों के बीच में बैठता है।चापलूसी की चला के जाने बिना किसी का आगे बढना बहुत मुश्किल होता है अगर किसी के पास बड़ा पद नहीं है पैसा नहीं है। प्रभाव नहीं है राजनैतिक पॉवर नहीं है तो फिर वो कितना ही योग्य क्यों न हो वो आगे नही बढ़ पाएगा। इस चापलूसी की कला से जहाँ अयोग्य भी विद्वानों की श्रेणी में आ गए हैं तथा बिना योग्यता के पी एच डी हथियाए बैठे है। वहीं बिना इसके अनेक प्रतिभाओं का गला घुट चुका है उनकी संभावनाएँ पूरी तरह ख़त्म हो चुकी हैं। उन्हें नकार दिया गया है। और वे भी साधारण जीवन जीने को विवश हैं जो सभी सुख के साधन और सुविधाओं से वंचित हैं।  एक कार्यक्रम में ऐसे ही एक श्रेष्ठ कवि को किसी भले आदमी के कारण मंच हासिल हो गया जब उसकी बारी आई तो संचालक ने उसको इतना बेइज्जत किया कि वो इस बात पर,अफसोस करने लगा कि वो आखिर यहाँ आया ही क्यों।उसकी खूब हूटिंग कराई उसे कविता चोर तक कह दिया। क्योंकि वो एक आम आदमी था उसके पास कोई बड़ी नौकरी नहीं थी न ही उसे कभी कोई सम्मान मिला था आकाशवाणी दूर दर्शन से भी उसकी...

व्यंग्य: संघर्ष के मज़े

कहते हैं कि सफलता बिना संघर्ष के नहीं मिलती अगर बिना संघर्ष के सफलता मिलती होती तो उसे पाने में कोई आनंद ही नहीं होता यह संघर्ष ही हमे मजबूत बनाता है। यदि सर्कस के शेर को जंगल में छोड़ दिया जाए तो वो भूख से मर जाएगा क्योंकि पिंजरे में बंद रहकर,वो शिकार करना भूल गया है उसे शिकार करना नहीं आता क्योंकि उसे समय पर तैयार भोजन बिना शिकार किए ही मिलता रहा है और,इसका वो आदि हो चुका है। इसी तरह जो संघर्ष से सफलता पाते हैं। उनकी बात ही निराली होती है उनका व्यक्तित्व पूरी तरह संतुलित होता है वे जुझारू स्वभाव के साहसी होते हैं जो हर मुसीबत को पार करने भें सक्षम होते हैं। देखने में सुविधा भोगी संपन्न लोग बड़े अच्छे लगते हैं लोग उन्हें ख़ुश किस्मत वाला समझते हैं। पर जो घोर परिश्रम करके खूब भूख लगने पर खाना खाता है । उसे जो तृप्ति मिलती है। वो आराम तलब आदमी को मेवा मिष्ठान्न चा भोडन करने पर भी नहीं मिलती। खेतिहर मजदूर कुंजीलाल का लड़का किशन और जमींदार का लड़का रूपेश दोनो हम उम्र थे दोनों सेना में जाना चाहते थे। रूपेश ने इसके लिए कोचिंग की थी और,किशन के पिताजी उसे बारिश में चार महीने के लिए ...

व्यंग्य : परीक्षाएँ

परीक्षाएँ सिर्फ विद्यार्थी जीवन में ही नहीं होतीं इसके बाद भी परीक्षाएँ चलती रहतीं हैं जिनमें कुछ में तो वो पास हो जाता है और कुछ में फेल इसी आधार पर उसकी सफलताएँ असफलताएँ निर्धारित होती है। बहुत से ऐसे हैं जो परीक्षाओं से बचकर रहना चाहते हैं यह सोचकर वे न तो कोई परीक्षा देना चाहते हैं और न ही उनकी तैयारी करते हैं इसलिए उनके परिणाम उन पर असरकारी नहीं होते। यह तो सभी जानते हैं कि कोई परीक्षा आसान नहीं होती प्रायः सभी परीक्षाएँ कठिन होती हैं। उनके अच्छे परिणाण जितने आनंद दायक होते हैं उससे ज्यादा तनाव भरा परीक्षा का वक्त होता है और उसकी तेयारी में हमें अपने सुखों का त्याग करना पड़ता है। आशुतोष और,आशीष दोनों सगे भाई थे आशुतोष बड़ा  और आशीष छोटा आशुतोष पढ़ाई में तेज था आशीष फिसड्डी । आशुतोष टॉपर रहता तो आशीष जैसे तैसे पास हो जाता था। फिर भी आशीष माता पिता का चहेता था माँ उसे अपने से अलग नहीं करना चाहती थी आशुतोष ने आठवीं की परीक्षा मेरिट के साथ पास की थी हायर सेकेण्डरी स्कूल बीस किलोमीटर दूर था। वहाँ एडमीशन लेना कमरा किराये से लेना हाथ से खाना बनाना घर से अकेले रहना किसी बड़ी पर...