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व्यंग्य : अपनों का दिया दंश

अपने वाले अगर अच्छे न हों हों तो उनसे अधिक दुख देने वाला कोई ओर नहीं होता अपनों का दिया दंश बहुत?पीड़ा जनक होता है खासकर अपने करीबी रिश्तेदार हों। अब तो यह भी देखा जा रहा है कि पति पत्नी के बीच अगर प्रेम खत्म हो गया हो तो वो एक दूसरे का सताने के अवसर तलाशते रहते हैं।  कई परिवारों में कोई बेटा माँ बाप का ज्यादा चहेता होता है और कोई उपेक्षित जो चहेता होता है वो उपेक्षित को परेशान करता है। और माता पिता भी इसे नजर?अंदाज कर?जाते हैं चहेता अगर उपेक्षित की झूठी शिकायत भी कर दे तो उसे सही मान लिया जाता है । और उपेक्षित को बिना किसी कसूर के कड़ी सजा मिल जाती है जिसे देखकर चहेते को पैशाचिक आनंद की अनुभूति होती है। दूसरी ओर यदि उपेक्षित चहेते की सही शिकायत भी कर दे तो उसे झूठी मानकर?उसे ही प्रताड़ित किया जाता है। इनसा दुखी और कोई नहीं होता क्योंकि ये अपनों के अत्याचार कै शिकार होते हैं। ये अगर घंटों आँसू भी बहाएँ तब भी इनके सगे अपनों का ह्रदय नहीं पसीजता। जबकि चहेता अगर जरा भी उदास हो तो पूरा घर दुखी हो जाता हैं और?उसको खुश करने का प्रयास करता है अगर वो इसका कारण उपेक्षित के द्वारा...
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व्यंग्य : जली हुई रस्सी के बल

एक कहावत है कि रस्सी जल गई फिर भी उसके बल नहीं गए। । रस्सी तो राख में बदल गई औसे भले ही मसलकर धूल की तरह कर दें तो बल का नामोनिशा॔ ही न रहे। इसी तरह से कुछ लोग ऐसे होते हैं । जो किसी ताकतवर से जब लड़ते हैं तो अपनी कमजोरी पर ध्यान नहीं देते और उसको कमजोर समझने की भूल कर लड़ाई छेड़ देते हैं बार बार मात खाते हैं और फिर खड़े हो जाते सैं बलवान उसे पटखनी पर पटखनी देता है और वो उठकर फिर लड़ना शूरू कर देते हैं। यह लड़ाई जब तक लड़ते रहते तब तक पूरी तरह बेदम न हो जाएँ। और इन्हें हराने वाला इनको पूरी तरह मिटा चुका होता है। इनमें समझदारी बिल्कुल नहीं होती लड़ाई करने की पहल इनकी और से ही होती है। और बुरी तरह हारते भी ये ही हैं। एक मोहल्ले की बात है उसमें तरूण नाम का पहलवान था निहायत ही शरीफ पर लड़ने में सबसे तेज उसके सीधेपन को सरलता को एक दुबला पतला कमजोर सा इंसान जिसका नाम जीवन था कमजोरी समझ बैठा और उसे लड़ाई के लिए उकसाने लगा तरुण ने कई बार उसकी चुनौती को नजर अंदाज किया। इससे उसकी हिम्मत बढ़ती चली गई। आखिर एक दिन तरुण उसकी चुनौती स्वकार कर ली इसके बाद तरुण ने उसकी वो धुनाई कि कई महीनों...

व्यंग्य : गुड़ी गाँठ

जो सहज सरल स्वभाव के धनी होते हैं वे अपने मन को हमेशा साफ रखते हैं दुश्मन के प्रति भी उनके मन में कोई बुरा भाव नहीं होता। पर जो कुटिल होते हैं वे ज़रा सी बात पर भी गुड़ी गाँठ पाल कर अपने मन में रख लेते हैं और जब तक अपनी पूरी कसर नहीं निकाल लेते तब तक इन्हें जरा सा भी चैन नहीं मिलता यह दस गुना बदला निकाले बिना नहीं मानते।जो लोग ऐसे लोगों की फितरत को जान लेते हैं वे इनसे बहुत सँभलकर रहते हैं। फिर भी जाने अनजाने में अगर कोई चूक हो जाए और वो इनके दिल पर लग जाए तो समझो सामने वाले की खैर नहीं । इसके लिए ये किसी भी हद तक गुज़रने में जरा सी भी देर नहीं करते। ऐसे ही एक स्वनामधन्य कवि थे अनाम जी एक कवि गोष्ठी में एक युवा कवि ने कुछ ऐसी टिप्पणी कर दी जो उन्होंने अपने ऊपर ले ली जबकि उस कवि की ऐसी मंशा भी नहीं थी । जब अनाम जी की बारी आई तो वे फट पड़े उस कवि की कविता को उन्होंने घटिया स्तरहीन निरूपित कर दिया उस कवि के खिलाफ अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया वे कवि बुरी तरह आहत थे अपमान का कड़वा घूँट पी रहे थे ।कार्यक्रम के बाद जब युवा कवि ने उनसे माफी माँगी तब भी वे उस पर उबल गए लाल पीली आँखें...

व्यंग्य : भावनाओं का लाभ उठाने वाल

भावना भावुक मन की पहचान होती हैं जो भावुक होते हैं वे दिल के भी नर्म होते हैं ऐसे लोग दिल से चलते हैं दिमाग का उपयोग कम करते हैं ज्यादातर भावुक लोग भले और नेक इंसान होते हैं। इनकी नर्मदिली से लोग लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं ये लोग भावुक इंसान के सामने अपने आपकी सबसे दुखी बताकर घड़ियाली आँसू बहाकर इनके दिल को पिघलाने में सफल हो जाकी और शराफत का फायदा चतुर चालाक तथा मतलबी उठा लेते हैं । यह भावुक इंसान इस तरह की ठगी के अक्सर शिकार होते हैं। फिर भी इनकी भावुकता कम नहीं होती न ही इनका दिल कभी कठोर होता है। रमेश इसी तरह के भले इंसान थे एक बार वे अपने पूरे माह का वेतन किसी बेटी की शादी के लिए दान कर के आ गए थे और यह भी कह आए थे ये बेटी की शादी के लिए हैं इसे लौटाने की जरूरत नहीं है। उनकी पत्नी सरला को जब यह बात पता लगी तब सिर पकड़कर बैठ गई सरला जानती थी उनकी भावुकता का फायदा उठाया गया है लड़की वाला कोई गरीब फटेहाल नहीं है बल्कि हद दर्जे का चालाक इंसान हैं । उसने रमेश के बड़े भाई राकेश को फोन कर के यह बात बताई राकेश भी उस आदमी की फितरत को अच्छी तरह जानते थे वे अपने कुछ साथियों क...

व्यंग्य : अकेलेपन से त्रस्त

संयुक्त परिवार टूटने के बाद अनेक विसंगतियाँ साहने आई हैं जिसमें अकेलेपन से त्रस्त बहुत से सीनियर?सिटीजन मिल जाएँगे उनका हालचाल पूछने वाला कोई नहीं है। वे ऐसे पाश इलाके में आलीशान भवन में रह रहे हैं जहाँ कोई किसी से वास्ता तक नहीं रखता। लोग पड़ोस में रहते हुए भी एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं। इनमें ऐसे वरिष्ठ नागरिक भी मिलेंगे जिन्होंने अपने जीवन की शुरूआत गरीबी में की थी लेकिन बाद में खूब मेहनत करके उच्च शिक्षा प्राप्त कर के बड़े अधिकारी बन गए बच्चे पढ़लिखकर विदेश में बस गए पत्नी की मृत्यु हो गई अब वह अकेले रह गए हैं। पाश कॉलोनी में मकान लेना उनके लिए अभिशाप सिद्ध हो गया है । पैसा तो है पर सुख चैन नहीं है अकेलेपन से बड़ा कोई दुख नहीं जिसके ऐसे लोग शिकार हो गए हैं। अशोक जी अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए थे। उनका लड़का अभिषेक विदेश में रह रहा था वो पिता का मकान बेचकर विदेश में घर खरीदना चाहता था पिता को उसने वृद्धाश्रम में में भेजने का निर्णय ले लिया था। वो बार बार उनसे मकान बेचने का दवाब बना रहा था। उसी दौरान अशोक जी के ऑफिस के बगल में चाय की दुकान लगाने वाला घीसीलाल मिला उसकी दुक...

व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं कि संसार में दुख तो बहुत है पर सबसे बड़ा दुख भूतपूर्व होने का है। जिसमें व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा रुतबा पद के छिनते ही मिट्टी में मिल जाता है जो झुकझुकक सलाम करते थे वे देखते ही मुँह मोड़ लेते हैं जो चाय मुफ्त में पीने को मिल जाती थी वो अब पैसे देने के बाद भी बेस्वाद मिलती है। कोई उधारी में सामान नहीं देता जो झुक कर बात करते थे वे आँखें तरेरते हैं। हाकिम सिंह जब ग्राम के सरपंच थे तब सत्ताधारी दल के जिला संगठन मंत्री भी थे। उनका बड़ा रुतबा था उनके यहाँ हाजिरी लगाने अच्छे लोग आते थे । सब उनकी कृपा के आकांक्षी रहते थे। जिससे जो कह दिया सो कह दिया बस वाला उनसे कभी किराया नहीं लेता था। जबसे चुनाव हारे और प्रदेश में भी उनकी पार्टी हार गई तब से उनके बुरे दिन शुरू हो गए अब तक तो हवा में उड़ रहे थे चुनाव हारते ही जमीन पर गिरकर चारों खाने चित हो गए थे अब उनकी न तो कोई पूछ परख रह गई थी न सुनवाई हो रही थी। उनसे एक गलती हो गई वे अपने एक समर्थक को छुड़ाने थाने पहुँच गए। उनका मानना था कि प्रभारी महोदय उनके अच्छे परिचित हैं । मगर हुआ उल्टा उन्हें ही हवालात में बंद कर दिया पुलिस ने फिर अप...

व्यंग्य : तानाशाह

जो हद दर्जे के अहंकारी अपने आपको सबसे अक्लमंद बाकी सभी को मूर्ख समझने वाले होते हैं वे तानशाह से कम नहीं होते इनके साथ जो रहते हैं वो प्रायः इनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले होते हैं चाहे उसमें सामने वाले का कितना ही नुक्सान क्यों न हो।  जिनका रवैया तानाशाही होता है वो कितना ही नुक्सान उठा लें पर अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं होते । उन्में से कुछ लोग होते हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते बस अपनी सुनाए जाते हैं फिर अंतिम निर्णय भी दे देते हैं कोई तर्क अथवा बहस की कोई गुंजाइश नहीं रखते। इस तरह के लोगों में निशा भी शामिल थी । एक बार क्या हुआ कि वो अपने सगे संबंधियों के साथ किसी तीर्थ यात्रा पर गए वहाँ भी निशा ने किसी की नहीं चलने दी। किसी ने कुछ कहने की कोशिश भी की तो उसे बेइज्जत होना पड़ा। उसके पति अनिल की तो उसने सबके सामने बड़ी बेइज्जती की अनिल को किसी ने बताया था कि यहाँ एक सेवा संस्थान द्वारा मात्र दस रुपये भें भरपेट गरमागरम भोजन मिलता है जिसमें मिष्ठान्न भी शामिल होता है उससे अच्छा भोजन आठ सौ रुपये की रेस्टोरेन्ट की थाली में भी नहीं मिलता। काउण्टर खुला हुआ था कूप...