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व्यंग्य: भरोसे की भैंस

ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत खूब प्रचलित है कहावत इस प्रकार है भरोसे की भैंस पाड़े को जन्म देती है। इस कहावत का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी पर पूरा भरोसा करते हैं और वो भरोसा तोड़ देता है । इतना ही नही वो विश्वास घात भी करता है। आज के इस दौर में तो बिश्वास देकर विष देने वाले बहुत मिल जाएँगे।
कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं जो लाभ लेते समय बड़े दावे से कहते हैं कि कभी हम भी तुम्हारे काम आएँगे। इन पर कितने ही अहसान करो ये यही कहेंगे कि आपके सब अहसानों का बदला चुका देंगे। और यही लोग मुसीबत में कन्नी काट कर निकल जाएँगे इनके घर जाओ तो घर से बाहर नहीं निकलेंगे बच्चों से कहलवा देंगे कि पापा घर पर नहीं हैं यह मतलबी लोग सिर्फ मतलब से अपना वास्ता रखते हैं। मतलब निकल जाने के बाद मुड़कर देखते तक नहीं। इसलिए सयाने कहते हैं किसी पर भी पूरा भरॅसा करके आँखें बंद कर मत बैठ जाओ हमेशा इसका विकल्प तैयार रखो। कुछ लोग बड़े घटिया टाइप के होते हैं। वो उस वक्त नदारद हो जाते हैं जिस वक्त उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। समय निकलने के बाद ये अचानक प्गट हो जाते हैं। फिर बड़ी मासूमियत से कहते हैं मैं कहीं गया थोड़ी था यहीं तो था आपने मुझे ठीक से ढूँढा नहीं। यह लोग दुबारा मौका आने पर भी धोखा देने में संकोच नहीं करते।  
प्रकाश ने दिनेश से तीन लाख रुपये उधार लिए थे इस शर्त पर कि वो तीन साल बाद इसके दुगुने छः लाख रुपये अदा कर देगा। दिनेश ने कहा भी था लौटा देना तुम्हारा मुश्किल घड़ी में साथ दिया है तो तुम भी देना तीन साल बाद मेरी बेटी की शादी है। तब मुझे रुपयों की सख्त जरूरत पड़ेगी तब प्रकाश ने कहा था कैसी बातें करते हो तुम्हारी बेटी मेरी बेटी की तरह है।
तीन साल बीत गए बेटी की शादी भी सिर पर आ गई। मगर प्रकाश ने पैसे नहीं लौटाए वे चक्कर लगा लगाकर थक गए। जब शादी के कुछ दिन बचे तब दिनेश ने थोड़े उलाहना भरे स्वर में बात की इस पर प्रकाश नाराज हो गया वो तो लड़ने के बहाने ढंढ रहा था। बोला एक रुपया भी वापस नहीं करंगा तुभसे जो बने सो कर लो। कोई सबूत है तुम्हारे पास प्रकाश ने रुपयों के पीछे अपनी बरसों पुरानी दोस्ती तोड़ दी थी और भरोसे का गला घोंट दिया था। दिनेश मानसिक रूप से बहुत परेशान हो गया था । वो तो लडके वालों ने सारा खर्च वहन कर लिया इस तरह दिनेश की बेटी की शादी संपन्न हो गई प्रकाश और दिनेश की दोस्ती हमेशा के लिए खत्म हो गई थी। इससे यही साबित होता है कि सिर्फ भरोसे के दम पर ही नहीं रहो सबूत जुटाकर रखना भी जरूरी है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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