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व्यंग्य: कसर निकालने वाले

कुछ कपटी कुटिल लोग अपनी दुश्मनी को कुछ इस तरह छिपाकर रखते हैं कि दुश्मन को इसका अहसास जरा भी नहीं हो पाता। ये अपने दुश्मन से दोस्ती का दिखावा करते हैं क्योंकि खुलकर दुश्मनी करना इनकी फितरत नहीं होती ऐसे लोग अपनी कसर निकालने का अवसर तलाशते रहते हैं। और जैसे ही इन्हें मौका मिलता है ये अपना हिसाब बराबर कर लेते हैं।
ऐसे लोग बड़े खतर नाक होते हैं साँप और बिच्छू से भी ज्यादा । क्योंकि साँप के तो मुँह में जहर होता है और बिच्छू की पूँछ से साँप से भी बचा जा सकता है और बिच्छू से भी बचा जा सकता है। पर ऐसे कुटिल कपटी दुश्मन से बचना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकी इनके तो मुँह में भी जहर होता है तथा पूँछ में। जब पूँछ से डँसते हैं तो जानलेवा तड़फाते हैं और मुँह से डँसते हैं तो काम तमाम ही कर देते हैं। समझदार लोगों को इनकी पहचान होती है वे इनकी फितरत से अच्छी तरह वाकिफ रहते हैं इसलिए वे इनका शिकार नहीं बन पाते । बाकी जो भावुक सीधे सादे दयालु टाइप के इंसान होते हैं वे इनका शिकार आसानी से बन जाते हैं। गाँव के सजनसिंह तथा रजन सिंह दोनों मित्र थे सजन सिंह संपन्न थे सपष्ट वादी थे साफ दिल के थे अच्छी बात कहते थे चाहे किसी को बुरी लगे या भली। रजन सिंह इसके विपरीत था। वो अपने मन में कपट कषाय रखता था। जुबान का बहुत मीठा था। सजनसिंह उससे भी कड़वी बात कह जाते थे वो हँसकर उनकी बात सुन तो लेता था। पर मन में हमेशा गाँठ बाँधकर रखता था। जब सजन सिंह के बुरे दिन आए। तब रजनसिंह ने अपनी सारी कोर कसर निकाल ली तब कहीं जाकर रजन सिंह के कलेजे को ठंडक पहुँची। सजन सिंह को जब उसकी चाल समझ में आई तब तक देर हो चुकी थी। उन्हें उसके बदले हुए व्यवहार को देखकर ताज्जुब हो रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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