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व्यंग्य: सुखों के दौर के साथी

कहते हैं जब वक्त अच्छा हो और पास में भरपूर सुख हों तो बहुत से ऐसे होंगे जो आपके खास साथी बनकर रहेंगे वे आपके साथ खूब मजे करेंगे आप से हर तरह का लाभ उठाएँगे आप को ऐसी चपत लगाएँगे जिसका अहसास तक आपको नहीं होगा । आप भी इनको अपना सबसे बड़ा हितैषी मान लेंगे ऐसे लोग सच्चे हितैषियों को आपके पास भी फटकने नहीं देंगे। लेकिन इनसे बड़ा घातक कोई नहीं ये ऊपरी तौर पर संवेदन शील बनेंगे भीतर इनमें जज्बात नाम की कोई चीज नहीं होगी।
कुंदनलाल जब क्षेत्रीय विधायक थे तब उनके यहाँ समर्थकों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी उनमें से कुछ तो उनके बहुत करीबी थे जो उनसे कई प्रकार के उचित अनुचित लाभ उठाते रहते थे वे भी यही सोचते थे कि उनके पास शुभचिंतको की ऐसी भीड़ है जो किसी भी हाल में उनका साथ नहीं छोड़ेंगे वही कुन्दनलाल जी जब चुनाव में पराजित हो गए । तो सारे हितैषी सारे शुभचिंतक नदारद हो गए कोई हालचाल पूछने वाला नहीं रहा। अकेले अपनी हार का वे शोक मना रहे थे और उनके अनेक कथित सच्चे हितैषी जीतने वाले के जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे । वे जब पॉवरलेस हो गए तो उनकी पूछ परख करने वाला कोई न रहा। इसलिए कहा गया है कि सच्चे मित्र की पहचान दुखों में होती है जो दुख में साथ दे वही सच्चे मित्र होते हैं। लेकिन देखने में ऐसा आता है कि जो दुख के साथी हैं। उन्हें सुख के दौर में हाशिए पर रख दिया जाता है उनके स्थान पर मतलबियों चापलूसों की भोड़ आ जाती है जिसमें घिरा हुआ इंसान अपने दुख के साथियों को भूल जाता है। और जब तक भूला रहता है जब तक सुख उसके साथ रहते हैं दुख में घिरते ही उसे दुख के साथी याद आने लगते हैं । जिनका दिल उन्होंने सुख में तोड़ दिया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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