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व्यंग्य: गलती किसकी

आजकल माता पिता इस बात से दुखी रहते हैं कि उनके बच्चे संस्कारी नहीं हैं मतलबी हैं संवेदना विहीन हैं लालची हैं गुस्सैल हैं ।किसी की मजबूरी का फायदा उठाने में भी उन्हें संकोच नहीं होता है। पर इसमें गलती किसकी है । 
कभी इस पर भी तो विचार करों क्या उनके माता पिता की कोई गलती नहीं है क्या एक युवक कह रहा था कि शाम को मैं और पिताजी एक साथ शराब का सेवन करते है। ऐसे लोग अपने बच्चों से भले की उम्मीद रखते हैं। बच्चा छोटा था आपने उसे झूठ बोलना सिखाया आपने उसे छल कपट करना सिखाया बेईमानी करना सिखाई आपने उसे बड़ों की इज्जत करना नहीं सिखाई अगर उसने आपके सामने बड़ों की बेइज्जती की तब भी आपने कुछ नहीं कहा। अब जब वो आपको दुख दे रहा है परेशान कर रहा है तो आप तिलमिला रहे हो ऐसे संस्कार विहीन बच्चे ही तो माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं। यहि आप बच्चों को संस्कारी बनाना चाहते हैं तो आपको भी संस्कारी बनना ही होगा आपको बच्चों के सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ेगा तब कहीं बच्चे संस्कारी हो पाएँगे। बच्चों को अंपनी संस्कृति का ज्ञान चरना भी आवश्यक है। महापुरूषों के जीवन के उदाहरण बताना जरूरी है। ताकि बच्चे उनसे प्रेणा लेकर अपना सुधार कर सकें। रविकाँत जी की किराने की दुकान थी उनका इकलौता बेटा थे सुनील वो बचपन से ही अपने पिता को खोटे काम करते हुए देख रहा था । उसने वो सब काम करना शुरू कर दिया उससे उसका चारित्रिक पतन हो गया । बड़ा होकर उसने पिताजी की दुकान पर कब्जा कर लिया और जब उसकी शादी हुई तो उसने माँ बाप को घर से निकाल दिया अब वे दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। तथा अपने बेटे को कोस रहे हैं । बेटा मतलबी है उस पर इस से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। कि लोग क्या कहेंगे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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