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व्यंग्य: बदले का भाव

बदला निकालने का भाव रखने वाले लोग अपनी सारी शक्ति और समय बदला निकालने में लगा देते हैं इसके लिए वे किसी हद तक गिर जाते हैं। और उनके अगर इरादे सफल हो जाएँ तो उन्हें परम संतुष्टि प्राप्त होती है पर यह सुख थोड़े दिन का होता है। जिससे इन्होंने अपना बदला निकाला था वो भी बदले की भावना से भर जाता है तथा अवसर की तलाश करता रहता है। जिसका फायदा कुछ चालाक लोग खूब उठाते हैं। यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। चाहे जिंदगी भले खत्म हो जाए।
सयाने कहते हैं कि इंसान को वदलाव के लिए प्रयास करना चाहिए अपने आप में सुधार कर बेहतर इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन लोग ऐसा करते नहीं हैं वे बदले निकालने के फेर में बदतर इंसान बनकर रह जाते हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाना और खुद को ऊँचा समझना इंसान को एक घटिया इंसान बना देता है। कई बार आवेश में कही हुई तीखी बात किसी को बुरी लग जाती है । पर वो इसे जाहिर नहीं होने देता। जब वो बदला निकालने में सफल हो जाता है तब हम समझ पाते हैं पर तब तक देर हो चुकी होती है। अगर हम एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश न करें । और सबकी सच्चे मन से मदद करें तो हम बेहतर इंसान बन सकते हैं बेहतर इंसान ही दुनिया को बेहतरीन बनाते हैं।
राकेश और सोहन की एक पार्टी में खूब कहासुनी हो गई हाथापाई की नौबत तक आ गई राकेश भारी पड़ गया। उसने सोहन को सबके सामने खूब जलील किया उस समय वो सोहन अपमान के कड़वे घंट पीकर रह गया। पर हर समय उसको अपना अपमान खटकता रहता था वो अपने अपमान का बदला निकालना चाहता था इसके लिए उसने पंरे पंद्रह हजार रुपये खर्च किए दस लोगों को पार्टी दी उसमें साजिश से राकेश की भी बुलाया गया वहाँ सोहन को देख राकेश जाने लगा तो उसे बलपूर्वक रोक लिये गया पार्टी में सब सोहन के आदमी थे। उसमें सोहन ने पूरी तबियत से अपने अपमान का बदला निकाला था। अपमान के कड़वे घूँट पीकर अब राकेश अपने बदला निकालने के अवसर की तलाश कर रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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