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व्यंग्य: दोस्तों की तलाश

आज की दुनिया में दोस्ती तो है पर दोस्त नहीं हैं। मतलबी हैं अवसरवादी हैं लोभी है लालची हैं धोखेबाज हैं दगाबाज हैं अगर नहीं हैं तो सच्चे दोस्त नहीं है इस भीड़ में दोस्त गुम हो गए हैं । न कोई सच्ची दोस्ती करना चाहता है न दोस्त बनना चाहता। अगर किसी को दोस्त मान भी लो तो वो इसे हमारी कमजोरी समझ लेगा और फिर हमारी कमजोरियों का खूब लाभ उठाएगा।
आप किसी से अपनी तरफ से तो सच्ची दोस्ती कर रहे हैं पर वो आपसे दोस्ती कर रहा है इसकी कोई गारंटी नहीं हो सकता है उसका आपसे कोई मतलब निकल रहा हो इसलिए वो दोस्ती का दिखावा कर रहे है और आप उसे सच्चा समझ रहे हों।
मनीष और%नवीन दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। मनीष के पास बाईक थी नवीन बस से कॉलेज जाता था जिसके किराये में उसका बहुत सा पैसा खर्च हो रहा था। इसे बचाने के लिए उसने मनीष से दोस्ती कर ली। दोस्ती क्या दोस्ती का दिखावा करना शुरं कर दिया। कुछ दिनों में ही उसने मनीष से घनिष्ठता चर ली। उसकी भावनाओं से कुछ इस तरह से खिलवाड़ किया कि मनीष उसे अपनी बाइक पर बिठाकर कॉलेज ले जाने लगा नवीन ने मनीष से तो ये कहा कि उसके पिता पर कर्ज है इसलिए वो बस का किराया भी देने में असमर्थ हैं। मनीष को उससे सहानुभूति हुई । उसने कहा जब हम दोस्त बन ही गए हैं तो फिर कोई बात नहीं हम दोनों साथ ही आना जाना करेंगे। नवीन चतुर चालाक था वो अपने पिताजी से पूरा किराया लेता था पर कभी पचास रुपये तक का भी पेट्रोल मनीष की बाइक में नहीं भरवाता था। तीन साल तक उसने मनीष से दोस्ती का भरपूर लाभ उठाया। जब नवीन की अच्छी नौकरी लग गई। तो उसने मनीष से दोस्ती तोड़ दी। मनीष बेरोजगार था गाड़ी में पेट्रोल के पैसे भी उसके पास नहीं थे। बडी मुश्किल से उसकी एक जगह हेल्पर की नौकरी लगी थी कुछ दिन बाद उसे पता चला कि नवीन वहाँ पर मैनेजर है। वो कार से आता था। जबकि मनीष के पास पुरानी सायकिल थी। नवीन ने उसे पहचानने तक से इंकार कर दिया था। सहारा देने की तो दूर की बात है। उसने मनीष की नौकरी छुड़वा दी। । मनीष बढा दुखी था उसने सब्जी बेचना शुरू किया। अपनी मेहनत से वो एक बड़ा व्यापारी बन गया। एक दिन वो अपने एक व्यावसायिक सहयोगी के साथ बैठा हुआ था। तभी मनीष ने देखा कि नवीन मुँह लटकाए वहाँ आ गया और उस व्यवसायी के पैर पकड़ कर बोला मुझे नौकरी से मत निकालिए मैं अब ऐसी गलती नहीं करूँगा उस व्यवसायी ने मनीष से कहा इसने आनलाइन जुए सट्टे में कंपनी के दस लाख रुपये गँवा दिए। यह सुनकर नवीन ने अपने आपको बेकसूर बताया हुए कहा कि मनीष सर मुझे अच्छी तरह जानते हैं मनीष चुछ नहीं बोला उस व्यवसायी ने भी उसकी बात पर विश्वास नहीं किया और उसे नौकरी से निकाल दिया। अब नवीन मनीष से नौकरी पाने की उम्मीद कर रहा था जबकि मनीष का कोई ऐसा इरादा नहीं था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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