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व्यंग्य: जानबूझकर अवसर गँवाने वाले

जीवन में अच्छे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते है। और जो लोग ऐसा अवसर यह सोचकर गँवा देते हैं कि आगे चलकर इससे अच्छा अवसर मिलेगा उसका लाभ उठा लेंगे ।फिर ऐसा अवसर कभी नहीं आता । और अवसर गँवाने वाले के पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचता। कई बार ऐसा होता है । जिसे हम छोटा अवसर समझकर छोड़ देते बाद में वही बेहतर अवसर साबित होता है। जो फिर हमें कभी नहीं मिलता।
आलोक और सुरेश कामर्स विषय से हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहे थे। बारहवीं की परीक्षा देने के बाद सुरेश को एक अवसर मिला गल्ला व्यापारी लाभमल जी को एक लिखापड़ी करने वाले की जरूरत थी । वे सुरेश को जानते थे। उन्होंने उससे अपने यहाँ काम करने को कहा वेतन कम था । इसलिए उसने मना कर दिया लाभमल जी बोले । कोई ओर काम करने का इच्छुक हो तो बताना सुरेश ने यह बात आलोक से कहते हुए कहा कि बी कॉम करेंगे तो अच्छा रहेगा किसी दुकान पर लिखा पढ़ी का काम कर के क्यों अपना भविष्य बिगाड़ें। मगर आलोक की सोच ऐसी नहीं थी। वो लाभमल जी के पास पहुँचा और काम करने की इच्छा प्रकट की। लाभमल जी ने उसे काम पर रख लिया। दिनभर की लिखापढ़ी का काम तीन घंटे में पूरा हो जाता था। आलोक के काम से लाभमल जी खुश थे एक दिन आलोक ने लाभमल जी से कहा कि मेरा बारहवीं का परीक्षा परिणाम आ गया है । और मैं बी कॉम करना चाहता हूँ कॉलेज की क्लासेज सुबह आठ बजे से साढ़े ग्यारह बजे से हैं। अगर आप इजाजत दें तो मैं एडमीशन ले लूँ । लाभमल जी अच्छे इंसान थे। उन्होंने आगे रहकर आलोक का एडमीशन कराया कॉलेज की फीस जमा की तथा किताबें दिलवाई। आलोक तीन बजे दुकान पर आ जाता था तथा तीन घंटे में अपना लिखा पढ़ी का काम पूरा कर देता था सेठजी को कोई ऐतराज नहीं था वे उसके काम से खुश थे। सेठजी का भतीजा निश्छल सी ए था। आलोक निश्छल के काम में भी सहयोग देने लगा निश्छल और सेठजी के सहयोग से वो भी चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट बन गया था। और बेहतर जिंदगी जी रहा था जबकि सुरेश बी कॉम करने के बाद प्राइवेट में नौकरी कर रहा था सरकारी नौकरी उसे मिल न सकी थी । वो साधारण जिंदगी जी रहा था। उस छोटे से अवसर को गँवाने का उसे बहुत पछतावा था। उसके सारे सपने चूर चूर हो गए थे। इसलिए अवसर का गँवाना ठीक नहीं इसका लाभ उठाने में देर नहीं करना चाहिए हो सकता है यह छोटा सा अवसर जिंदगी सँवार कर रख दे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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