सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: समय की करवट

समय कब किस का कौन सी करवट बदल ले ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता । समय अगर मेहरबान हो तो रंक को राजा बनने में देर नहीं लगती वही समय अगर करवट बदल ले तो राज भी रंक बन जाता है। कई नगर सेठ दर?दर के भिखारी बनते हुए देखे गए हैं।
एक किसान के खेत पर जाने का अवसर मिला उसके खेत में एक लगभग पचास वर्ष का मजदंर काम कर रहा था। खेत मालिक ने उसके विषय में बताया कि ये भी इसी गाँव का है इसके पास सौ एकड़ जमीन थी शानदार हवेली थी पचासों नौकर चाकर इसके यहाँ काम करते थे कभी इसका बड़ा रुतबा था आसपास के पच्चीस गाँवों में इसकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी । लेकिन समय ने करवट बगली इसके हालात बिगड़े और ये मिटता चला गया। अंत में सब कुछ बिक गया न जमीन रही न जायदाद एक छोटी सी झुग्गी में रह रहा है सबने इसका साथ छोड दिया है सारा रुतबा खत्म हो गया है। खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। इसलिए कहा गया है कि समय सबका एक सा नहीं रहता किसी का समय अच्छा होता है तो किसी का बुरा। जो बीज जमीन में पडकर अंकुरित होकर ऊग आते हैं। वे बड़े होकर फल फूल जाते हैं बाकी असंख्य बीच चक्की में पिसकर आटा में बदल जाते हैं जो भोजन में बदलने के बाद मिट जाते हैं उनका अस्तितव ही मिट जाता है। समय जब अच्छा चल रहा हो तो अभिमान नहीं करना चाहिए। और समय अगर बुरा हो तो धैर्यपूर्वक उसे गुजारना चाहिए। इस नश्वर संसार में सबका अंत निश्चित है यह जानते हुए अपना व्यवहार तय करना ही ठीक है। मान अपमान से परे रहकर सब के साथ हिलमिलकर चलने में ही भलाई है अकारण ही किसी से दुश्मनी मौल लेना अच्छी बात नहीं है । यह हमारी परेशानी का कारण बन सकती है।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...