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व्यंग्य: खोटीं की चमक

अक्सर खरे से खोटे ज्यादा चमकदार होते हैं वे अपनी चमक से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं और उनकी चमक से प्रभावित होकर लोग खरे को छोड़कर खोटे को अपना लेते हैं। खरे खोटे की परख तो पारखी ही कर सकता है। और पारखियों की तो वैसे ही कमी बनी रहती है इसिलिए हीरे तो धूल में पड़े रहते हैं और काँच के टुकड़े हीरे मान लिए जाते हैं।
यह खोटे लोग खरे को आगे नहीं बढ़ने देते उनके सारे अवसरों को झटक लेते हैं जहाँ पर खरों को होना चाहिए वहाँ ये खोटे नजर आते हैं। सारे सम्मान ये हड़प लेते हैं खरों को जो पदवी मिलना चाहिए ये उसे हासिल कर लेते हैं।
एक पत्रिका के संपादक इस बात से दुखी थे कि रचनाओं का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है। अच्छे कवि लेखकों की बड़ी कमी है हमने उनसे कहा कि आप कितने रचनाकार की रचनाएँ छापते हैं वे बोवे मुश्किल से आठ की इसके अलावा कोई स्तरीय मिलता ही नहीं है हमने कहा आप खोज ही नहीं करते। जो आपको सहज उपलब्ध हो गए उनको महत्व दे रहे हैं उनके बारे में जरा छानबीन तो करो वे बोले इतना समय किस के पास है हमारे पास और भी काम है। ये आठ लोग वे थे जिनका ग्रुप बना हुआ था उस ग्रुप में पत्रिका का साहित्य संपादक भी शामिल थे। इनके पास प्रतिदिन खूब रचनाएँ प्रकाशन के लिए आती थीं। यह सबको स्तरहीन बताकर खारिज कर देते थे फिर उन्हीं रचनाओं को अपने हिसाब से कुछ फेरबदल कर अपने नाम से छपवा लेते थे। इनकी इस हरकत से कई अच्छे रचनाकारों ने रचना भेजना बंद कर दिया था इनके पास जो कूड़ा करकट आता था उसे यह अपने नाम से छपवा लेते थे। लोगों ने कविताएँ पढ़ना ही बंद कर दिया था हारकर पत्रिका ने साहित्यिक रचनाओं का फिलर की तरह उपयोग करना शुरू कर दिया पत्रिका ने अपना स्वरूप ही बदल दिया था। पर वे आठ लोग अब भी छप रहे थे जो प्रतिभाओं को आगे आने ही नहीं दे रहे थे इनकी दर्जनों किताबें छप चुकी थी सारे सम्मानों पर इनका कब्जा था इन्सोंने मिलकर साहित्य का ठेका ले लिया था। वो तो अच्छा हुआ कि ये लोग तुलसी सूर और कबीर के तुग में नहीं थे। आज के युग में होकर साहित्य का सरूवनाश करने पर तुले हुए हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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