सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: आखिर कब आएगा अच्छा समय

ज्यादातर लोग इसी उम्मीद में अपनी जिंदगी को जीते रहते हैं कि कभी तो उनका अच्छा समय आएगा। ऐसे लोग वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। कल जो गुजर गया उसको दुहराना नहीं चाहते और भविष्य से उम्मीदें रखे रहते हैं।
ऐसा करते करते सारा समय बीत जाता है। जब जिंदगी का आखिर पढ़ाव आ जाता है तब व्यक्ति अपने गुजरे हुए वक्त का आकलन करता है तड उसे पता चलता है कि जो समय गुजर गया उसी में ही अच्छा समय भी था जिसकी हमने कीमत नहीं की और भविष्य में और बेहतर%समय आने की प्रतीक्षा करते रहे जो कभी नहीं आया अब जो समय आ रहा है ये तो पहले से भी खराब है और जो आने वाला है वो और खराब होगा। बुढ़ापे ने अपना शिक॔जा कस लिया शरीर को बीमारियों ने जकड़ लिया है मिठाई खाने के दिन जा चुके हैं अब तो मिठाई से कई गुना ज्यादा मँहगी कड़वी दवाइयाँ खाना पड़ रही हैं यात्रा कर नहीं पा रहे पैसा भी कमा नहीं पा रहे हैं जो पेंशनर हैं उनकी पेंशन का बड़ा भाग गोली दवाओं में खर्च हो रहा है।
जिनके पास बुढ़ापे में खूब धन संपदा है वे भी दुखी हैं वे अब उसका भोग नहीं कर पा रहे हैं दो रूखी रोटी और%कम मिर्च तेल मसाले की सब्जी खाकर रहना पड़ रहा है। यह बात सबको मालूम है कि जो पाई पाई करके जोड़ा है उसे अंत में छोड़कर यहीं सब जाना है। ऐसे लोग जिंदगी भर कमाते रहे लेकिन जब भोग का समय%आया तब तक बुढ़ाने ने बीमारियों के साथ आकर घेर लिया जिससे छुटकारा पाना जीवन रहते असंभव है इससे छुटकारा तो मौत ही दिला सकती है। मौत आने का मतलब ही है सब कुछ खत्म हो जाना। और सब कुछ खोते हुए देखना किसी को भी अच्छा नहीं लगता। फिर भी सब कुछ आखिर यहीं पर छूट ही जाता है।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...