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व्यंग्य: विश्वासघाती

कहते हैं कि विश्वास को बड़ी मुश्किल से कायम किया जाता हैं। आज के दौर में आसानी से विश्वास नहीं जमाया जा सकता जबकि विश्वास को तोड़ना आसान हैं लेकिन फिर टूटे हुए विश्वास को जोड़ना मुमकिन नहीं है। जो विश्वास तोड़ देते हैं । वे विश्वासघाती कहलाते हैं। जिन पर दुबारा कोई कभी विश्वास नहीं करता।
जो चतुर चालाक चपल अवसरवादी टाइप के लोग होते हैं वे जरा से लोभ में विश्वास तोड़ने में देरी नहीं करते। ऐसे लोग बहुत बड़ी गलती कर बैठते हैं जिसके परिणाम का उनको भी अंदाज नहीं होता।
पुरुषोत्तम दास जी एक ईमानदार नेक दिल और भले इंसान थे । उनकी बाजार में दुकान थी कुछ लेनदेन का काम भी करते थे। कुल मिलाकर वे सुखी जीवन जी रहे थे । लोग भी उनसे खुश थे और उन्हें भी किसी से कोई शिकायत नहीं थे। आज तक उन्होंने किसी का विश्वास नहीं तोड़ा था। न ही उनका किसी ने भरोसा तोड़ा था। इसिलिए उनका कारोबार आराम से चल रहा था उनकी जुबान से निकली बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह मानी जाती थी। उनका इकलौता लड़का था। हरीश उसके अपने पिताजी से गहरे मतभेद थे। वो अपने पिताजी की कार्य प्रणाली से संतुषट नहीं था। वो अति महत्वाकाँक्षी था। वो ऐन केन प्रकारेण सफलता हासिल करना चाहता था। वो जल्दी अमीर बनने के लिए शार्टकट में विश्वास रखता था। पुरुषोत्तम दास के अचानक निधन से । सारा कारोबार हरीश के हाथ में आ गया। हरीश का ये मानना था कि वो जब अपने तरीके से काम करेगा तो सफलता के शिखर तक पहुँच जाएगा। जो पिताजी उम्र भर में हासिल नहीं कर सके वो सब वो कुछ महीने भें ही हासिल कर लेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं उसकी चालाकी उसे ले डूबी पिताजी की वर्षों से जमी साख उसने कुछ दिनों में ही मिट्टी में मिला दी। उसके तौर तरीके देखकर पुराने अनुभवी भरोसे मंद सहयोगी उसका साथ छोड़कर चले गए जिन लोगों को उसने काम पर रखा वो अनुभवहीन थे। उसकी नीतियों ने उसे दो साल में ही कंगाल कर दिया था। आज सब कुछ गँवाकर वो एक किराने की दुकान पर नौकरी कर रहा था तथा किराये के मकान में रह रहा था। लोग ऐसे उदाहरणों से भी सीख नहीं लेते तथा गलत राह पर चलकर बर्बाद हो जाते हैं फिर इनके पास सिवाय पछतावे के और कुछ बाकी नहीं रहता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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