वैसे तो सामंतवाद दुनिया से कब का खत्म हो चुका है लेकिन सामंती सोच अभी तक खत्म नहीं हुई है। यह अभी भी कायम है। शहरी क्षेत्र में ये अलग रूप में है और ग्रामीण क्षेत्रों में अलग रूप में है। जो सामंती सोच वाले हैं वे अक्सर संपन्न और प्रभावशाली वर्ग के होते हैं इनके क्षेत्र में कोई भी गतिविधा इनकी सहमति के बिना नहीं हो सकती कोई कितना ही सक्षम क्यों न हो पर इनकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन सामंतवादी सोच रखने वालों ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है।
एक गाँव के त्रिभुवन सिंह का रौब भी ऐसा ही था। गाँव में उनसे बड़ा किसी का मकान नहीं था । कोई उनसे आँख से आँख मिलाकर बात नहीं कर सकता था बाहर से जो भी अतिथि या कोई और किसी काम से आता तो उसे सबसे पहले उनके दरबार में उपस्थित होना पढ़ता था। कोई मँहगे और अच्छे कपड़े भी नहीं पहन सकता था भले ही वो कितना ही संपन्न क्यों न हो कोई अगर मेहमानी करने गाँव से बाहर जाता तो वो अच्छे कपड़े गाँव की सीमा के बाहर पहनता था। और जब वापस आता तो कपड़े बदल कर गाँव की सीमा में प्रेवेश करता था एक बार की बात हैं एक ग्रामीण कुंजीलाल ने एक मँहगी कार खरीद ली वेसी कार त्रिभुवन सिंह जी के पास भी नहीं थी। जैसे ही इसकी खबर उन्हें लगी उन्होंने तुरंत कुंजीलाल को तलब किया फिर उसे खूब गालियाँ सुनाकर उसे उसकी औकात दिखाई । और आदेश दिया कै कार यहीं छोड़कर चला जाए। कुंजीलाल कुछ कह नहीं सका । कुछ दिनों बाद उन्होंने कुंजीलाल को बुलाया और कहा ये कार का सेल लेटर है इस पर हस्ताक्षर कर दे। कुंजीलाल ने चुपचाप दस्तखत कर दिए और आ गया। कार किसको बेची कितने में बेची पैसा मिला या नहीं ये पूछने की उसकी औकात नहीं थी। त्रिभुवन सिंह के गाँव में कोई सरपंच उनकी इच्छा के बिना नहीं बन सकता था। जिसे वो बनाते थे वो उनकी मर्जी का गुलाम बनकर रहता था। इससे हटकर शहर में भी सामंती सोच वाले लोग रहते हैं। चाहे कला का क्षेत्र या साहित्य का या समाज सेवा का हर क्षेत्र में कोई न कोई सामंती सोच वाला मौजूद है जिसका काम ही प्रतिभाओं का गला घोंटना है। इनके कारण चापलूस लोगों की संख्या बढ़ रही है जो इनकी खुशामद कर रहा है उसे आगे बढ़ाया जा रहा है जो स्वाभिमानी है हुनर मंद है उसके अवसर छीनकर चापलूसों को दिए जा रहे हैं। और कोई इसको रोक नहीं पा रहा है।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें