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व्यंग्य: भाईयों का वैर

एक तरफ जहाँ आपस में भाईचारा रखने की बात होती है दूसरी तरफ सगे भाईयों में भी वैर होता हुआ देखा गया है। इनकी आपस की दुश्मनी देखकर तो दुश्मन भी दंग रह जाते हैं। जमीन जायदाद का बँटवारा तो हो जाता है। लेकिन एक दूसरे की जमीन मकान तो पास पास ही होते हैं कभी खेत की मेढ़ को लेकर तो कभी पालतू पशु द्वारा नुक्सान कर देने पर इनके बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं।
यह झगड़े कभी कभी खूनी संघर्ष में बदल जाते है। कभी कभी तो किसी की जान भी चली जाती है।
पिछले दिनों अस्पताल जाना हुआ वहाँ रमेश चंद्र जी भर्ती थे जो ठेकेदारी करते थे। उनके सगे भतीजे ने उन पर हमला कर दिया था उनके सिर में बारह टाँके लगे थे अंदरूनी चोट भी लगी थी भतीजे ने उन्हें बेरहमी से पीटा था। उन्हें इस बात का दुख था कि जिसे बड़े लाड़ से पाला था उसी ने बढ़े होकर उन पर जानलेवा हमला कर दिया था। इससे ज्यादा दुख की बात तो यह थी कि उनका सगा भाई भी अपने बेटे का पक्ष ले रहा था । उनकी भाभी जिसका घर उजड़ने से उन्होंने बचाया था उसी के कहने पर उसके बैटे ने रमेश पर जानलेवा हमला किया था। सबसे ज्यादा दुखी तो माँ थी वो रो भी नहीं सकती थी। इस घटना के बाद उसके बड़े बेटे और पोते ने माँ को रोते हुए देख लिया तो आग बबूला हो गए कड़वे लहजे में बोले उसका पक्ष अगर लोगी तो हमारी तरफ से तुम मर गई हम तुम्हें मरा समझकर अपना मुँडन करा लेंगे।यह सुनकर माँ चुप हो गई उसने अपने आँसुओं के सैलाब को रोक लिया था। आखिर जो अस्पताल में भर्ती था वो भी तो उसका अपना बेटा था जिसे खून से लथपथ देखकर वो बेहोश हो गई थी वो तो आसपास के लोग बीच बचाव नहीं करते तो रमेश जान से हाथ धो बैठता। । बाहर के दुश्मन से ज्यादा खराब और%बेरहम तो ये अपने ही दुश्मन है जो दुश्मनी निकालने का एक भी अवसर नहीं गँवाते। हमारी आपस की लड़ाई ही तो हमें कमजोर बना रसी है। इसी का लाभ बाहरी लोग उठा लेते हैं। वे आसानी से अपने इरादों में कामयाब हो जाते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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