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व्यंग्य: यादों की कसक

इंसान के जीवन में कोई भी घटना शाश्वत नहीं रहती समय कभी नहीं थमता समय गुज़र जाता है लेकिन अपने पीछे अनेक खट्टी मिठी यादें छोड़ जाता है। जो अच्छी यादें होती हैं वो मन को बहुत सुकून देती हैं ।जो कड़वी पीड़ादायी यादें होती हैं उनकी कसक मन को व्याकुल किए रहती हैं।
कभी कभी ऐसा भी होता है जब हम कुछ लोगों को खास महत्व देते हैं। उनकी आव भगत और पूछ परख के फेर में हम कई लोगों की तरफ ध्यान तक नहीं देते कुछ लोगों की हम घोर उपेक्षा करते हैं। यहाँ तक कि उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी कर देते हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि समय से अधिक कोई बलवान नहीं है । कब किसी का समय बिगड़ जाए और कब किसी का समय सुधर जाए यह कोई नहीं जानता। जिनकी हमने अतीत में घोर उपेक्षा की थी जिनको अपमानित किया था । वे जब समर्थ बन जाते हैं। सक्षम बन जाते हैं ।समाज में उनकी खूब मान प्रतिष्ठा हो जाती है। लोग उनकी कृपकाँक्षी हो जाते हैं। तब वे लोग उनसे नजरें मिलाने तक की स्थिति में नहीं रहते जो उनकी कभी घोर उपेक्षा करते थे उन्हें हमेशा उनकी औकात याद दिलाते रहते थे अब वे कहीं के नहीं रहते। लेकिन जिनकी वे उपेक्षा करते थे उनका कद बहुत बढ़ा देखकर मन ही मन झेंपते रहते हैं। हमारा ये नकारात्मक व्यवहार हमारे अहंकार से उत्पन्न होता है। अहंकार तो टूट जाता है मगर वो यादों की कड़वाहट को मिठास में नहीं बदल सकता इन यादों की कसक कभी कम नहीं सोती यह जिंदगी की आखिरी साँस तक पीड़ा देती रहती है। यदि हम अहंकार को खत्म करदें तो हम अहंकार तथा आत्म सम्मान के अंतर को अच्छी तरह समझ जाएँगे। जो आत्म सम्मान को बनाए रखते हैं वे दूसरों के आत्मसम्मान को भी गिरने नहीं देते। तबभी हम सबका दिल जीत सकते हैं और सबके दिलों में अपना स्थान बना सकते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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