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व्यंग्य: अहं पर चोट

अक्सर जो अहंकारी होते हैं उनके अहं पर सबसे ज्यादा चोट लगती है। ऐसे लोग हमेशा विचलित रहते हैं इसका फायदा भतलबी उठाते हैं वे अहंकारी के अहं को संतुष्ट करते हुए उससे लाभ उठाते रहते हैं जब तक उसे इसका अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है। 
जो बड़े पद पर होते हैं वो अगर अभिमिनी हों तो वे सबकी परेशानी का कारण बन जाते हैं। जैसे कोई बड़ा साहब अपने अधीनस्थ को डाँट रहा हो उसे निकम्मा नकारा कह रहा हो उसके खिलाफ कार्यवाही की धमकी दे रहा हो तो अधीनस्थ का परेशान होना स्वाभाविक है बड़े साहब ने अपने अधीनस्थ को बुलाया और काम सौंपते हुए कहा कि दो दिन के अंदर काम पूरा करना है अन्यथा तुम्हारे खिलाफ सख्त कार्यवाही करूँगा अधीनस्थ ने खूब कहा कि यह अकेले के बस का काम नहीं है आप दो दिन की बात कर रहे हैं यह तो दस दिन में भी पूरा नहीं वाला इस पर साहब आग बबूला हो गए और अंतिम निर्णय देते हुए बोले कुछ भी हो दो दिन में काम पूरा होना इससे अधीनस्थ डिप्रेशन में आ गया काम पूरा नहीं होना था। साहब ने सख्त कार्यवाही कर उसकी वेतन वधद्धि रोक दूसरे को काम सौंपा वो भी नहीं कर पाया उसका भी यही हाल हुआ जब तीसरे को शिकार बनाया जा रहा था तो अधीनस्थों में रोष फैल गया कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी काम पूरी तरह ठप्प हो गया पर साहब की अकड़ ढीली नहीं हुई आखिर वरिष्ठ अधिकारियों ने साहब को हटा दिया दूसरा मिलन सार साहब भेजा उसने टीम बनाकर वो काम आसानी से करा दिया। क्योंकि उनमें इगो नहीं था इगो होना भी नही चाहिए क्योंकि इससे कोई लाभ नहीं है उल्टे नुक्सान ही है।फिर भी लोग अहं को पाले रहते हैं इसके उनको बुरे नतीजे मिलते हैं पर वे अहं को छोड नहीं पाते।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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