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व्यंग्य: गलतफहमी चा शिकार

हमारे आसपास अक्सर ऐसे कई लोग मिल जाएँगे जो यह मानकर चलते हैं कि उनके बिना किसी का काम नहीं चल सकता ऐसे लोग अपने आपको महत्वपूर्ण मानकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। ये फिर अभिमानी हो जाते हैं इनकी काफी पूछ परख करना पड़ती है।
यह लोग अक्सर एटीटयूड में रहते हैं कई बार ये दूसरों की बेइज्जती करने में भी संकोच नहीं करते। लोग इनको यह सोचकर बर्दाश्त कर लेते हैं क्योंकि उनका कोई विकल्प उन्हें नजर नहीं आता। वे इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाते हैं ऐसे लोग हर जगह आपके भिल जाएँगे। सामजिक संगठन हों या घर परिवार या संस्थाएँ अथवा प्रतिष्ठान हों यह कई बार तो अपनी मनमानी पर उतर आते हैं। ऐसे लोगों का अभिमान भी चूर चूर होतः है। उमानाथ जी ऐसे ही व्यक्ति थे वे एक संस्था में पदाधिकारी थे। और सर्वेसर्वा बनकर रहते थे वे सभी पर अपने निर्णय थोपते थे। संस्था के अन्य सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को यह अहसास कराते रहतः थः कि उनके दम पर यह संस्था चल रही है वो जिस दिन इस संस्था से हट जाअःगे उस दिन यह संस्था भी खत्म हो जाएगी। यह बहुत दिनों तक चलता रहा फिर एक बार ऐसी स्थिति निर्मित हुई जो उनको अप्रिय लगी उन्होंने इसे अपने सम्मान के प्रतिकूल माना और वो संस्था छोड़ दी सभी ने उन्हें खूब मनाया बिना गलती के लोगों ने उनसे माफी माँगी पर वे टस से मस नहीं हुए। उनके छोड जाने से सब उदास थे दुखी थे । कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा फिर उनके भी विकल्प मिल गए कोई रहे या न रहे संस्था तो चलेगी और ऐसा ही हुआ भी कुछ दिनों बाद संस्था अपनी रफ्तार से चलने लगी उनकी सोच के अनुसार संस्था खत्म नहीं हौई । बाहर रहकर उन्होंने संस्था को खत्म करने के हर संभव प्रयास किए पर सफल नहीं हो सके। उनकी अनुपस्थिति में भी संस्था प्रगति पर थी पर उनका अहं चूर चूर हो गया था । अब वे फिर उस संस्था में सक्रिय होने लगे थे लेकिन अब उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा था । उनकी भी गलतफहमी दूर हो गई थी। और ऐसा होना भी चाहिए था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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