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व्यंग्य: चाहत के रूप


किसी के दिल में किसी के प्रति जो चाहत उत्पन्न होती है उसके कई कारण हो सकते हैं ठीक उसी प्रकार नफरत भी कई कारणों से हो सकती है। चाहत का मतलब प्रेम ही नहीं होता। ये चाहत कभी स्लार्थ के कारण भी हो सकती है। जिससे काम निकालना हो उसके प्रति भी चाहत होती है। 
जो संबंध स्वार्थ के आधार पर बनते हैं उनमें प्रेम का अभाव होता है । ऐसे संबंध स्वार्थ पूरा होने पर टूट भी जाते हैं। 
जिस तरह प्रेम किसी से भी हो सकता है । उसी तरफ नफरत भी किसी से भी हो सकती है प्रेम विवाह करने वाले भी शादी के कुछ साल बाद यह कहते नजर आते हैं कि तुमसे शादी के बाद पछता रहे हैं। जब पति पत्नी के बीच संबंध कटु हो जाते हैं तो बच्चों का मोह उन संबंधों को बनाए रखता है। सच्चा प्रेम इन सबसे हटकर होता है। सच्चे प्रेम त्याग समर्पण और बलिदान का जज्बा रहता है इस में प्रेमी प्रेमिका एक दूसदरे की चाहत में अपनी जान तक भी दे सकते है। यदि हम संबंधों को प्रेम का आधार बना लें तो स्वार्थ का भाव ही तिरोहित हो जाएगा। दिल में प्रेम रखकर हम यदि किसी का काम करेंगे तो उस काम को करने से खुशी मिलेगी । न उकताहट झुँझलाहट और बैचेनी। होगीषअः वैसे इस क्षण भंगुर संसार में जो हर संभव भले का काम कर देते हैं। हितैषी होते हैं । सभी के प्रति सदभाव रखते हैं। वही सच्चे प्रेमी भी होते हैं।  
लेकिन आजकल के दिखावे के दौर में सच्चे प्रेम करने वाले बहुत कम हीं मिलेंग जो मिलेंगे। वही प्रेम के लिए काफी हैं। फूल अगर गुलशन में खिलते हैं तो खुश्बुएँ लुटाना तो उनका स्वभाव है । इसके लिए वे दर्द दुख भी हँसकर सहन कर लेते हैं। पर अपने प्रेम में। जरा कमी नहीं आने दते 


रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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