अक्सर ऐसा होता है कि हालात भले ही कितने अच्छे हों फिर भी ज्यादातर लोग उससे संतुष्ट नहीं होते वे इससे बेहतर की खोज में रहते हैं वो जब उन्हें हासिल नहीं होता तब अपने गुजरे हुए बेहतर हालात का आनंद नहीं उठाने का अफ़सोस प्रकट करते हैं।
ऐसे लोग उस जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी जीती हुई रकम इस आस में दाँव पर लगा देता है कि वो जीतकर मालामाल हो जाएगा और जब हारने लगता है तो और%बढ़चढ़कर दाँव पव दाँव लगाता है । फिर पूरी तरह कंगाल होकर ही दम लेता है। जब किसी का अच्छा समय चल रहा होता है तब उसकी उन्पति के रास्ते खुल जाते हैं। और वो यह मान लेता है कि अब कभी असफलता तो उसके पास आएगी ही नहीं यह सफलता की चकाचौंध उसे अभिमानी और बददिमाग बना देती है जिससे उसे शिखर से शून्य तक आने में देर नहीं लगती इसके बाद वो लाख कोशिशें करता है पर कुछ हासिल नहीं होता तब उसे अपार दुख होता है जिसका सबसे बड़ा कारण वो खुद होता है। इसी तरह हम संबंधों को लेकर भी भूल करते हैं। और अच्छे दोस्त की तलाश में अच्छे दोस्त को खो देते हैं फिर कहीं के नहीं रहते
मंजू के बड़े बेटे की बहू सरला अच्छे स्वभाव की थी सबका ख्याल रखने वाली मधुर भाषी कोमल मन की मंजू अपने छोटे बेटे से अधिक स्नेह रखती थी वह यह मानती थी कि उसके छोटे बेटे की पत्नी इससे अच्छी आएगी वो छोटे बेटे और बहू के पास रहेंगे इसे तो अलग कर देंगे इसके बच्चे भी बढ़े हो रहे हैं। बड़े बेटे का वेतन तो इनमें ही खर्च हो जाएगा। मंजू का छोटा बेटा नौकरी करने लगा था मंजू ने उसके लिए जो बहू की तलाश की थी वो भी नौकरी कर रही थी। अब मंजू ने छोटे बेटे की शादी के तुरंत बाद सरला को अलग कर दिया सरला के पति ने बैंक से लोन लेकर एक फ्लेट ले लिया था वे उसमें रहने लगे थे। उधर मंजू के सपने धराशायी हो गए थे नई बहू ने आते ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए मंजू का छोटा बेटा जोरू का गुलाम बन गया था उसने उनका जीवन नर्क बना दिया था। उसे अब रह रहकर सरला की याद आती थी लेकिन । छोटी बहू ने ऐसा आतंक मचा दिया था कि सरला का आना ही प्रतिबंधित हो गया था। जो मंजू छोटे बेटे बहू के साथ स्वर्ग जैसा जीवन जीने की कल्पना कर रही थी उसका जीवन छोटी बहू ने नारचीय बना दिया था जिसमें वो रहने को विवश थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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