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व्यंग्य: सुख के सपने

जिनके पास दुखों की भरमार है वे सुख के सपने सजाकर अपनी जिंदगी जीते रहते हैं । वे सोचते हैं कि कभी वो दिन भी आएगा जब हमें भी खूब सुख मिलेंगे हमारी भी सारी कामनाएँ पूरी होंगी। दिन गुजरते चले जाते हैं इच्छित सुख भी मिलते हैं फिर भी इंसान सुखी नही दिखता । क्योंकि फिर वो नए सुख के सपने देखने लगता है। नई कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वो इनकी पूर्ति में जुटा रहता है।
यह सब करते हुए वो उम्र की गिनती भी भूल जाता है समय के साथ व्यक्ति तो बूढ़ा हो जाता है लेकिन मन जवान रहता है।
जब शरीर साथ नहीं देता कार्यक्षमता घट जाती है । तब उसे पुराने दिन याद आते हैं। फिर वो सोचता है कि पुराने दिन कितने अच्छे थे सब कुख कितना बेहतर था। आज की तुलना में तो कई गुना बेहतर था । बुढ़ापे में अक्सर लोग पुराने दिनों की यादों को तरोताजा करने लगते हैं। क्योंकि भविष्य से उनकी आस खत्म हो जाती है वे समझ जाते हैं कि बुढ़ापे का भविष्य मौत है । वे इस मौत के डर को भुलाना चाहते हैं इसिलिए अतीत में खोए रहते हैं।
    नरेन्द्र जी एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे खूब रुतबा था मोटी तनखा मिलती थी। ऑफिस में सब उन से डरते थे हर समय लोगों से घिरे रहते थे। वे इससे तंग आ गए थे और रिटायरमेन्ट की तारीख की प्रतिक्षा कर रहे थे। सोचते थे रिटायरमेन्ट के दिन मजे से बिताएँगे। आखिर वो तारीछ भी आ गई वे सेवानिवृत्त हो गए। बड़े खुश लग रहे थे लेकिन ये खुशी अधिक दिनों तक नहीं रह सकी समय इतना अधिक मिलने लगा कि काटे से नहीं कटा अब उनका वो रुतबा नहीं रहा था। कोई उनसे मिलने भी नहीं आ रहा था वे अब वे दुखी रहने लगे थे अब वे अपनी नौकरी के दिनों की याद में खोए रहने लगे थे वे अब न वर्तमान की बात करते थे न भविष्य की बस अतीत की यादों में डूबे रहते थे लोगों से बातें भी अपने सुनहरे अतीत की करने लगे थे। वक्त जो बीत गया वो आने वाला नहीं था वक्त जो चल रहा था उससे वे संतुष्ट नहीं थे और जो वक्त आने वाला था उससे वे डरे हुए थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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