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व्यंग्य: दुश्मनी का दिखावा

जिस तरह कुख लोग दोस्ती का दिखावा कर दुश्मनी पाले रहते हैं और अवसर की तलाश करते रहते हैं उसी तरह कुछ ऐसे भी होते हैं । जो दुश्मनी का दिखावा करते हैं जिससे उनकी दोस्ती होती है। उससे जाहिर तौर पर दुश्मन की तरह लड़ते हैं । पर यह बहुत बड़े झाँसे बाज होते हैं।
इनकी दोस्ती जिससे होति है उसमें छल कपट छिद्र कूट कूट कर भरा होता है वो खुद भी ऐसे होते हैं धोखा दगा इनकी नस नस में भरा होता है यह जिसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं उससे दोस्ती का झूठा दिखावा करते हैं। उसके सामने यह आपस में खूब लड़ते हैं इनमें गर्मागर्म बहस भी होती है कभी कभी तो ऐसे लगता है कि इनमें कहीं खून खराबा न हो जाए अगला बीच बचाव करता है। फिर यह दोनों उससे एक दूसरे की बुराई करते हैं। उसके मन की बात जानते हैं फिर लोग उनके बारे भें क्या सोचते हैं यह मालूम करते हैं। दूसरे दिन शाम को आपस मे एक दूसरे की जान के प्यासे होकर लड़ने वाले गले मे हाथ डालकर घूमते हुए नजर आते हैं। खूब घुट गुटकर बाते करते हैं दोनों की बाते छल कपट भरी होती हैं। इसके बाद यह दोनों मिलकर सबसे ज्यादा क्षति उसे पहुँचाते हैं जिससे यह दोस्ती का दिखावा कर रहे थे। वो तो बेचारा कहीं का नहीं रहता न घर का न घाट का। जो इनको अच्छी तरह जान समझ लेता है वो फिर कभी इनके झाँसे में नहीं आता। 
एक मैनेजर थे दिनेश वर्मा उनकी अपने सहायक सौरभ से हमेशा झड़प होती रहती थी संजय भी उसी ऑफिस में काम करता था दोनों संजय से एक दूसरे की जमकर बुराई करते थे एक दिन दिनेश ने संजय से कहा देखना मैं अगले महीने सौरभ को नौकरी से निकाल दूँगा और तुम्हारा प्रमोशन कर अपना सहायक बना लूँगा। संजय उनके झाँसे को सच समझ बैठा अगले महीने उल्टा हुआ । दिनेश ने संजय को ही नौकरी से निकाल दिया संजय उन दोनों कुटिल कपटी के षडयंत्र का शिकार हो गया था। ऑफिस में बाकी सब उन दोनों को अच्छी तरह जानते थे इसलिए वे उनके झाँसे में नहीं आते थे इसलिए वे किसी नए संजय जैसे युवक की तलाश में थे। जिसका वे संजय की तरह इस्तेमाल कर सकें।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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