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व्यंग्य: मतलबी यार

आज के इस दौर में मतलबियों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। ऐसे मतलबी लोग संवेदना शून्य होते हैं इनमें न दया होती है न सहानुभूति भीतर से यह पूरी तरह भाव शून्य होते हैं।  
जब तक इनका किसी से कोई मतलब न निकलता हो तब तक यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते जान पहचान के होते हुए भी हालचाल तक नहीं पूछते। लेकिन जैसे ही इनका मतलब निकलता है। वैसे ही यह सकिय हो जाते हैं उसे अपना घनिष्ठ बना लेते हैं ऐसा जाहिर करते हैं जैसा आपका उनसे बड़ा हितैषी कोई और हो ही नहीं सकता। इनका आकर्षण इतना ज्रबर्दस्त होता है कि लोगों की सोच ही गुम हो जाती है यह भतलबी जब तक अपना मतलब पूरी तरह हल नहीं कर?लेते तब तक वे आपको अपने आकर्षण के जाल में फँसाए रखते हैं उनकी सम्मोहिनी से आप बाहर ही नहीं निकल पाते जब उनका मतलब पूरा हो जाता है और सम्मोहन टूटता है तब व्यक्ति अपने आपको ठगा सा महसूस करता हैं उसे बहुत अफसोस होता है तब तक देर हो चुकी होती है।
प्रकाश चंद्र इसी तरह के इंसान थे मतलब के आगे उनके रिश्तों की कोई अहमियत नहीं थी। उनका कोई सगा नहीं था वे सिर्फ मतलब से ही वास्ता रखते थे उनकी सगी बहन सरला को मकान खरीदना था । यह बात जैसे ही उनको पता चली इसमें उन्हें अपना लाभ दिखा और वे अपनी बहन के पास पहुँच गए अपने जीजा को उन्होंने अपनी बातों से प्रभावित कर?लिया ये भी कहा आजकल जमाना खराब है मकान खरीद रहे होतो दलालों के फेर में मत पड़ना आपको मैं मकान भाव से दिलवाऊँगा। बहन और जीजा को उनकी बात पर भरोसा करना हो पड़ा। फिर उसने मकान बेचने वाले से संपर्क किया वो चालीस लाख में मकान बेच रहा था और इन्हें दो परसेन्ट की दलाली भी दे रहा। था इन्होंने वो मकान अपने जीजा को पैंतालीस लाख रुपये में दिलवाया। जीजा और बहन से पाँच लाख हड़पे एक लाख रुपये की दलाली मकान बेचने वाले से खाली । उन्होंने अपने बहन बहनोई को पूरे छ लाख रुपये की चपत लगाई थी उनका सबसे बड़ा हितैषी बनकर और वे बहन बहनोई छ लाख की चपत खाकर भी उन्हें हितैषी समझकर उनका अहसान मान रहे थे कि उन्होंने हमें उचित कीमत पर मकान दिलवा दिया।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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