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व्यंग्य: शंका और दुविधा

शंका और दविधा हर व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आती है। जो लोग शंकाओं से घिरे रहते हैं दुविधाओं में पड़े रहते हैं। वे चाहकर भी कोई काम नहीं कर पाते और बाद में सिवाय पछतावे के उनके पास और कुछ नहीं बचता । कहने वाले कहते हैं कि बुरे काम करने से पहले हज़ार बार सोचना चाहिए । और उसे टालने की सूरत निकालना चाहिए अगर टल जाए तो खुश होना चाहिए । इसके विपरीत अगर भला काम करना हो तो उसे करने में देरी नहीं करना चाहिए भला काम करने में सोच विचार की अधिक जरूरत?नहीं होना चाहिए भला काम करने से खुशी होती है साथ ही अदभुत आनंद की प्राप्ति भी।
यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। हमारी सूझबूझ और समझ हमारे अंदर शंका उतूपन्न नहीं होने देती और जब शंका नहीं रहती तो विश्वास का जन्म होता यह विश्वास ही हमें सफल बनाता है। दुविधा में पड़े हौए लोग विश्वास को खो बैठते हैं। जिससे वे आगे नहीं बढ़ पाते और अपने विकास को अवरुद्ध कर लेते हैं। एक व्यापारी ने प्याज और लहसुन के वूयापार में चार महीने में चालीस लाख रुपये कमाए और दूसरे व्यापारी ने उसी व्यापार में बीस लाख का घाटा उठाया इसमें शंका तथा दुविधा प्रमुख कारण रहा । एक के विश्वास और सूझबूझ ने उसे सफल बना दिया। जब फसल पर लहसुन और प्याज मँहगा था एक ने यह सोचकर अधिक से अधिक खरीद लिया की यह और मँहगा होगा लेकिन जैसे ही फसल आई तथा बंपर आवक हुई तो लहसुन प्याज के भाव गिर गए। इससे घबराकर उसने अपना सारा स्टॉक नुक्सान उठाकर बेच दिया जब वो बेच रहा था तब यह कम भाव का लाभ लेकर खूब खरीदारी कर रहा था क्योंकि उसकी सूझ उसे ऐसा करने दे रही थी । और हुआ भी ऐसा इस साल पैदावार कम थी और भाव भी निम्नतर थे। चार महीने बाद ही वहसुन प्याज के दाम आसमान पर पहुँच गए और उसने उन्हें सही समय पर बेचकर चालीस लाख रुपये का मुनाफा कमा लिया। क्योंकि उसके मन में न शंका थी न दुविधा विश्वास था और सूझबूझ थी जिसका लाभ उसे मिला था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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