भाग्य का रोना रोने वालों में अधिकतर वे लोग होते हैं जो अपनी लापरवाहियों और सुस्ती के कारण असफल हो चुके होते हैं ।ये भाग्य के भरोसे बैठे हुए लोग कोई भी कार्य की पहल इसिलिए नहीं करते क्योंकि वे यह मान लेते हैं कि उनकी किस्मत ही खराब है। जो उनकी किस्मत में लिखा ही नहीं है वो उन्हें कैसे मिलेगा यह उनकी सोच होती है।
इसके विपरीत जो मेहनत साहस और बुद्धि बल से सफल हो जाते हैं वे इस विषय में विचार तक नहीं करते उनके पास अपने कार्य की रुपरेखा होती है योजना होती है। वे अपना पूरा समय अपने कार्य को अंजाम देने में लगा देते हैं। और जब तक सफल नहीं हो जाते तब तक चैन से नहीं बैठते। इनकी सफलता को देखकर असफल उन्हें किस्मत का धनी कहकर उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं । और अपनी किस्मत को दोष देने लगते हैं।
कभो कभी ऐसा भी होता है कि दो व्यक्ति एक साथ एक ही स्थान पर मजदूरी करते हैं। दोनों की आय बराबर होती है फिर भी उनमें से जो मेहनती साहसी और बुद्धिमान होता है वो उन्नति के पथ पर चल पड़ता है धीरे धीरे सफलता उसके कदम चूमने लगती है । वो मजदूरी करना बंद कर के छोटा मोटा धंधा शुरू चर देता है फुटपाथ पर बैठकर दुकान लगाता है । उसकी मेहनत रंग लाती है। और वो स्थाई दुकान खोल लेता है धन का सही विनियोग कर के वो धनवान होने लगता है। दूसरी ओर उसके साथ काम करने वाला अब भी मजदूरी कर रहा होता है उनमें से कई तो ऐसे होते हैं जो कर्ज के दलदल में फँसे होते हैं। उनकी सारी जिंदगी जीने के लिए संघर्ष करते हुए बीत जाती है। वो दूसरों की मदद करने की स्थिति में नहीं होते उन्हें खुद ही मदद की जरूरत होती है। वैसे भाग्य का रोना रोते रहने से कुछ हासिल तो होता नहीं है बल्कि ऐसी सोच वाले व्यक्ति अकर्मण्य हो जाते हैं। कुछ लोगों का व्यवहार सही नहीं रहता इनका स्वभाव उग्र होता है इसलिए यह कहीं पर टिक कर काम नहीं कर पाते इनकी अपने नियोक्ता से नहीं बनती और ये काम छोड़कर घर बैठ जाते हैं। जब यह कुछ नहीं करते तो इनका परिवार आर्थिक संकट से घिर जाता है । इनकी पत्नी मजदूरी कर के घर का खर्च चलाती है । और यह अपना दिन बिना कुछ किए ही गँवा देते हैं। ऐसे लोगों की समाज में भी इज्जत नहीं होती । फिर भी यह लोग इसकी परवाह न करते हुए मुफ्त की रोटी तोड़कर अपना समय गुजारते रहते हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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