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व्यंग्य: भलमनसाहत की कीमत

प्रायः अनेकों लोग यह कहते हुए मिल जाएँगे कि आज के ज़माने में भलमनसाहत की भी कीमत चुकानी पड़ती है। बहुत सारे अहसान फरामोश ऐसे मिल जाएँगे जो आपके अहसानों का बदला चुकाने की तो दूर की बात है। आपको धन्यवाद देना तक उचित नहीं समझेंगे।
कुंजीलाल भले आदमी थे अनोखीलाल उनके दोस्त थे कुंजी लाल संपन्न थे । अनोखीलाल गरीब कुँजीलाल जी ने अनोखीलाल जी पर खूब अहसान किए थे। जिनकी कोई गिनती नहीं। उनका मिलना जब होता था जब अनोखीलाल जी को पैसे की जरूरत पढ़ती थी। अनोखी लाल जी को थोड़ा थोड़ा करते हुए वे अब तक दस लाख रुपये कर्ज में दे चुके थे। आजकल अनोखीलाल का लड़का भी कमाने लगा था। घर में पैसे की आवक हो रही थी मगर%अनोखीलाल जी ने कु॔जीलाल जी का एक भी रुपये का कर्ज अदा नहीं किया था बल्कि उनसे मिलना जुलना ही बंद कर दिया था। अनोखीलाल जी की नीयत में खोट आ गई थी। एक दिन कुँजीलाल जी बहुत दुखी थे कह रहे थे जो मेरा दस लाख रुपये का कर्ज खा कर बैठा है वो लोगों से कह रहा है कि उसने कुँजीलाल पर बहुत अहसान किए हैं कुंजीलाल आज जो कुछ हैं वो उनकी बथौलत है। इस बात से वे दुखी थे उन्होंने अपना पैसा जब अनोखीलाल से वापस माँगा तो अनोखीलाल जी बोले कैसा पैसा कौनसा पैसा कब दिया था। किसके सामने दिया था कोई लिखापढ़ी है कि नहीं यह सुनकर कुँजोलाल हक्के बक्के रह गए उल्टा उसने कुँजीलाल जी पर ही आरोप लगा दिया कि वो उनके चार लाख रुपये खाए बैठे हैं। यह सुनकर कुंजी लाल जी की बहुत आत्मा दुखी। उनकी दोस्ती टूट गई संबंध बिगड़ गए थे। कुँजीलाल जी को रात दिन अनोखीलाल जी द्वारा दिया गया धोखा दुख दिया टरता था। ।वक्त फिर पलटा अनोखीलाल जी को भारी घाटा हुआ ।जिसे पूरा करने के लिए उसने किसी से छः लाख का कर्ज लिया। दस प्रतिशत मासिक दर से जिसका महीने का ब्याज साठ हजार रुपये थे। ब्याज अदा करते करते उनकी कमर टूट गई। उस छः लाख के कर्ज के ब्याज में उसने अनोखीलाल जी के पलॉट पर कब्जा कर लिया पच्चीस लाख का मकान भी छः लाख के लेन देन मे चला गया था। अनोखीलाल अब फुटपाथ पर आ गए थे। उन्होंने शहर छोड़ दिया था और अनजान शहर में रह रहे थ घोर गरीबी में अपना जीवन गुजार रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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