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व्यंग्य: बुरी नियत वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी नियत बहुत बुरी होती है ये खुद चिपड़ी रोटी खा रहे हों मेवा मिषाठान्न का सेवन कर रहे हों उसकी उन्हें इतनी खुशी नहीं होती जितना दुख किसी रूखी सूखी खाने वालो को दो टाइम का भर पेट भोजन मिल जाए तब होता है। यह उससे जलने लगते हैं। इनसे कम हैसियत वाला अगर कार खरीद ले तो इनके कलेजे पर साँप लोटने लगता है। फिर ये उसके पीछे हाथ धोकर पड छाते हैं उसकी आय के स्त्रोत बंद करने का प्रयास करते हैं उसके सामने आर्थिक संकट खड़े कर देते हैं। उसका पैसा खर्च कराने की साजिशें रचते हैं ओर जब वो घोर आर्थिक संकट में घिर कर अपनी कार को औने पौने दाम में बेच देता है तो इनके कलेगे को बड़ी ठंडक पहुँचती है।
कुठ लोग की नियत दूसरे की जमीन जायदाद पर लगी होती है । किसी का घर इन्हें समझ में आ जाए तो उसे बिकवाने की कोशिशें करना ये शुरू कर देते हैं। 
रामलाल का मकान सड़क पर था पिछले कुछ सालों में वहाँ अच्छा बाजार विकसित हो गया था । सोहनलाल का मकान गली में था उसकी दुकान किराये की थी । उसकी गलत नजर रामलाल के मकान पर लगी हुई थी । वो उस मकान को हड़पना चाहता था । उसकी सोच यह थी कि अगर रामलाल का मकान मिल जाए तो वो उस पर शॉपैंग मॉल बनवा ले। रामलाल सीधे सरल सज्जन इंसान थे। सोहनलाल कुटिल और धूर्त इंसान था। रामलाल जी का एक ही लड़का था राकेश वो लड़का कपंत था उसकी अपने पिता से बिलूकुल नहीं बनती थी दोनों में मतभेद थे राकेश की आदतें गलत थीं। सोहनलाल ने इसका लाभ उठाया उसने राकेश को कर्ज देना शुरू कर दिया था। जिन पैसों को राकेश जुआ सट्टा शराब खोरी और अय्याशी में उड़ाने लगा जब उस पर पचास लाख का कर्ज हो गया । तो उसने घर से जेवर नकदी चुराना शुरू कर दिए। एक दिन रामलाल जी को पता चला कि राकेश को पुलिस पकड़ कर ले गई है। उसका कर्ज उतारने में रामलाल जी पूरी तरह बर्बाद हो गए उनका वो मकान सोहनलाल ने खरीद लिया रामलाल की जमीन प्लाट सब बिक गए थे जो पैसे बचे थे उससे गली में उन्होंने एक कच्चा मकान ले लिया और फुटपाथ पर बैठकर सामान बेचने लगे। सोहनलाल को उन्हें इस हाल में देखकर अपार खुशी होती थी । राकेश इतनी गरीबी में रह नहीं सका और घर से भाग गया । वो चोर बन गया था। उसको जेल हो गई थी वो सजा काट रहा था और रामलाल जी रूखी सूखी रोटी खाकर अपना गुजारा कर रहे थे।
ये खोटी नियत वाले लोग बड़े बेरहम होते हैं इनके जहर में हजारों साँप बिच्छुओं का मिश्रण होता है जिसको यह ड़स ले वो तड़प तड़प कर मरता है। इनके जहर की कोई दवा आज तक नहीं बनी है। जो इनसे बच जाते हैं वे सौभाग्यशाली लोग बिरले ही होते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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