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व्यंग्य: चमकदार खोटे

यह बात तो सभी कहते हैं कि जो खोटा होता है । उसमें खरे से ज्यादा चमक होती है। और जो पारखी नहीं होते वे खोटे को खरा समझ लेते हैं और खरे को खोटा ये उनकी भूल होती है जिसका नुक्सान ही उठाना पड़ता है। उनकी सोच से समझ से न कभी खोटा खरा हो सकता है न खरा खोटा। पारखी इनको अलग अलग कर देता है। 
इसी तरह लोग भी होते हैं जो झूठा होता है वो उसे सच्चा साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । जबकि सच्चा कभी अपनी सच्चाई को प्रचारित नहीं करता। जो दुश्मनी को छिपाकर दोस्ती का दिखावा करते हैं। उसकी दोस्ती को लोग सच्ची समझ लेते हैं उनका यह भ्रम जब तक दूर नहीं होता तब तक वे अपनी दुश्मनी निकालने में सफल नहीं हो जाते। 
किशोर इसी तरह का फर्जी आदमी था उसकी बोली जितनी मीठी थी उतना ही कड़वा उसमें जहर भरा था। वो सबका लाभ उठा लेता था। पर उसका क ई लाभ नहीं उठा सकता था। लोग उसकी बातों के सम्मोहक जाल में फँसकर छटपटाते रहते थे जिसे देखकर उसे पैशाचिक आनंद की प्राप्ति होती रहती थी। ऐसे लोगों में ईर्ष्या छल कपट लोभ मोह अभिमान कुटिलता कूटकूटकर भरी होती है। इनसे तो सँभलकर रहना ही ठीक है। मगर ऐसा हो नहीं पाता ये लोग बड़े चालाक होते हैं बड़ी शातिरता से अपने शिकार को जाल में फँसाकर तड़फाते हैं। ये वो लोग हैं जो मुर्दे का भी कफन चुरा लें और इनके चेहरे पर जरा भो शिकन तक नहीं आए। जिससे इनकी गरज होती है उसकी ये खूब तरफदारी करते हैं खुशामद करते हैं घनिष्ठ बन जाते हैं और अपना काम पूरा होने पर फिर पलटकर तक नहीं देखते।इनकी नजर सिर्फ अपने शिकार पर रहती है जैसे ही शिकार इनकी जद में आया तो ये कहर बनकर उस पर टूट पड़ते हैं यह अचेले नहीं होते पंरा गिरोह इनका साथ देता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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