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व्यंग्य: अनजानी वक्त की बर्बादी

जो लोग यह सोच कर किसी काम में अपना वक्त खर्च कर रहे हैं कि यही समय का सही उपयोग है शायद उन्हें नही मालूम की वो ऐसा कर के अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हों ।कुछ लोग यह तय ही नहीं कर पाते कि उनकी ज़िंदगी का मक़सद क्या है। जिन्हें वे समझदार समझते हैं वो उन्हें जैसा बताते हैं वैसा ही करने लगते हैं खुद का दिमाग नहीं लगाते । ऐसा करते हुए जब बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है तब उन्हें अहसास होता है कि वे तो अपना वक्त बर्बाद कर रहे थे।
उनकी दशा उस मुसाफ़िर की तरह हो जाती है जो यह उम्मीद लेकर चला था कि वो जिधर जा रहा है वही उसकी मंजिल है यह सोचकर वो हर कठिनाई से गुजरता है हर रुकावट दूर करता है और जब पहुँचता है तो पता चलता है कि यह तो उसकी मंजिल है नहीं वो तो विपरीत दिशा में चल रहा था । यहाँ से तो उसकी मंजिल दोगुनी दूर है। उसके पास समय नहीं बचता हताशा उसे घेर लेती है और वो गहरे अवसाद में डूब जाता है उसके सपने चूर चूर हो जाते हैं जीवन बोझ लगते लगता है।
वैसे देखा जाए तो हमारी हर गलती के सबसे बड़े जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। हम क्यों किसी के बहकावे में आए हमारा किसी ने ब्रेनवाश कर दिया और?हमने वो हो जाने दिया । अपनी अक्ल से सोचा नहीं। जब नतीजे सामने आए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब तो परिणाम भोगने का समय आ गया था। जो लोग छोटे कामों के लिए भी दूसरों की चापलूसी में अपना समय बर्बाद कर देते हैं उन्हें हासिल कुछ नहीं होता। एक उदाहरण से इस बात को और स्पष्ट किया जा सकता है। हाल ही मैं अर्ध सैनिक बल में भर्तियाँ निकली थीं। दो मित्र सुरेश और देवेन्द्र भर्ती होने के इच्छुक थे । सुरेश इसके लिए लम्बे समय से तैयारी कर रहा था। जबकि देवेन्द्र की सोच इससे अलग थी उसका यह मानना था कि आजकल पैसा पाॅवर और सिफारिश के बिना कुछ काम नहीं होता यही सोच उसके पिताजी की थी । उसका लाभ एक अवसरवादी चालू टाइप के इंसान ने उठाया उसने उनसे नूरे बीस लाख रुपये ले लिए और उसकी नौकरी लगवाने का पूरा भरोसा उसे दिलवा दिया। इसके बाद उसने यह मान लिया कि उसकी नौकरी तो लगी लगाई है और वो सुरेश को देखकर सोचता बेचारा अपना समय बर्बाद कर रहा है। आजकल ऐसे नौकरी कहाँ मिलती है। लेकिन उसका भ्रम तब टूट जाता है जब सुरेश का तो चयन हो जाता है। लेकिन देवेन्द्र का कहीं कोई नाम नहीं होता। वो दलाल पैसे लेकर भाग गया होता है और देवेन्द्र के पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचता। अनुचित साधनों के प्रयोग से सफलता पाने की चाह ही नहीं रखना चाहिए समय बहुत कीमती है। जिंदगी एक बार ही मिली है। अगर इसे बर्बाद कर दिया तो सब कुछ खत्म हो जाएगा।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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