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व्यंग्य: समय की करवट

इस बात से तो सभी सहमत होंगे की समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी अच्छा समय होता है तो कभी बुरा और यह कब करवट बदल ले यह कोई जान नहीं सकता। कहते हैं कि समय अच्छा होतो फकीर भी बादशाह बन जाता है और समय अगर खराब हो जाए तो बादशाह को भी फकीर बनते देर नहीं लगती।
जरा हम उन लोगों के विषय में सोचें जिनका समय अच्छा चल%रहा है। वे बहुत प्रभाव शाली हैं समाज में उनका रुतबा है मान है पूछ परख है। इससे उनमें अभिमान आ गया है वे खुद को खूब बड़ा समझने लगे हैं लोगों को हिकारत की नजर से देखते हैं किसी की भी बेइज्जती करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता वे घमंडी हो गए हैं इस घमंड ने उनको यह विश्वास दिला दिया है कि वे हमेशा ही ऐसे रहेंगे। इसी भ्रम में वे जी रहे हैं लेकिन वे यह नहीं जानते जब वक्त करवट लेगा तो उनका क्या होगा हरी भरी बेल भी तो आखिर सूख ही जाती है। बुरे वक्त में उनके अपने भी उनका साथ छोड़ जाएँगे गुमनामी की जिंदगी जीना पड़ेगी और अंत बड़ा खराब होगा। लेकिन इसकी वे कभी कल्पना नहीं करेंगे। वे यह मान लेंगे कि ऐसा उनके साथ कभी नहीं होगा । और जब हो जाएगा तो उसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। एक बड़ी कंपनी मैनेजर थे दीपक दास उनका काफी रुतबा था। खूब पैसा था पास में प्रभाव शाली लोगों से जान पहचान थी ठाट बाट से रहते थे। अचानक उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया। नौकरी छूट गई लोगों की भीड़ भी छँट गई ।एक दिन वे घर से किसी को कुछ बताए फिन निकल गए उन्हें खूब तलाशा पर वे नहीं मिले। इस घटना को घटे पूरे छः साल हो गया तब किसी परिचित को वे महानगर में भीख माँगते। दिखे कपड़े बहुत मैले कुचैले थे कुछ भी बड़बड़ाते रहते थे। उनको इस हाल में देख कईयों को रोना आ गया। क्योंकि उन्होंने सुनहरे दिन देखे थे। ऐसे अनेकों उदाहरण आपको बिल जाएँगे। सच्चा आनंद सच्चा सुख किसमें है इसे बहुत से लोग अब भी नहीं जानते।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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