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व्यंग्य: अपमानित

कई परिवारों में ऐसे बुजुर्ग मिल जाएँगे जो बहू बैटों के द्वारा किए गए अपमान को सहकर अपने बुढ़ापे के दिन गुजार रहे हैं । इनमें उन पिताओं की संख्या ज्यादा है जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी परिवार को सँवारने में गुजार दी व्यवसाय जमायः बच्चों को पढ़ाया लिखाया उनका विवाह किया नाती पोतों की वरवरिश में भी अहम भूमिका निभाई जब वे ज्यादा बूढ़े हो गए और उनके सारे कारोबार पर बेटों ने कब्जा कर लिये तो अब उन्हें अपमानित होकर जिंदगी जीना पड़ रहा है। 
स्थिति तब और बिगड़ जाती है जब उनकी बूढ़ी जीवन संगिनी का निधन हो गया हो ऐसे में वे अपने मन की बातें भी नहीं कह पाते और अपमान सहकर घुटते रहते हैं।
   सोमनाथ जी ने गाँव से शहर आकर एक होटल में वेटर का काम कर धन कमाना शुरू किया था उन्होंने खूब परिश्रम किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने एक मिष्ठान्न भंढार और एक होटल तथा एक भोजनालय खोल लिया । बड़ा मकान बनवाया दो बेपों एक बेटी की शादी धूमधाम से की परिवार को समृद्ध और सुखी बनाया। फिर अपना सारा कारोबार बेटों को सौप दिया वे यह सोचकर खुश थे कि अब वे अपने बुढ़ापे के दिन आराम से गुजारेंगे। बेटे कुछ दिनों तक तो कारोबार के सिलसिले में उनसे सलाह मशवरा लेते रहे । जब उन्हें ऐसा लगा कि उन्होंने कारोबार के सारे गुर सीख लिए हैं तो उन्होंने सोमनाथ जी की उपेक्षा करना शुरू कर दी वे उन्हें अपमानित करने लगे एक दो बार वे दुकान पर गए भी तो बेटों ने बेइज्जत कर के भगा दिया सोमनाथ के लिए दुख की सबसे बड़ी बात यह थी उनची पत्नी भी उनका साथ नहीं दे रही थी वो बेटे बहू की हर बात का समर्थन कर रही थी । अब तो वो भी उनका अपमान करने लगी थी । सोमनाथ जी स्वाभिमानी इंसान थे । अभी उनकी उम्र सत्तर साल की थी वे पूरी तरह स्वस्थ थे एक दिन वे किसी को कुछ भी बताए बिना घर से निकल गए। बेटों ने इस पर ध्यान नहीं दिया न ही उनकी पत्नी पर कुछ असर हुआ जब उन्हें गए हुए पन्द्रह दिन हो गए तब बेटों ने दिखावे के लिए उनकी खोज शुरू की भीतर से तो वे उनके जाने से खुश थे उनके कमरे पर उनके पोते ने कब्जा कर लिया था बेटों ने तय कर लिया था कि अगर वे आ गए तो उनका बिस्तर जीने के नीचे जमीन पर लगा देंगे। लेकिन सोमनाथ जी कभी नहीं आए। भीख माँगना उन्हें मंजूर नहीं था। उनके एक पुराने कर्जदार ने दस हजार रुपये कर्ज की अदाएगी के तौर पर उन्हें दिए थे वे अपने शहर से छः सौ किलोमीटर दूर एक छोटे शहर में आ गए थे यहाँ उन्होंने एक ठेला किराए से लेकर पोहा जलेबी समोसे कचौरी की दुकान लगा ली। उनके हाथों भें स्वाद था। उनकी छोटी सी दुकान चल निकली। तो एक पक्की दुकान लेकर वे उस में होटल करने लगे। किस्मत ने उनका साथ दिया एक अनाथ को सहारा देकर उसे उन्होंने अपना बेटा बनाया उसकी शादी की तथा उसके साथ सुख से रहने लगे वे दोनों पति पत्नी भले इंसान थे वे उनका खूब ख्याल रखते थे। उधर उनके दोनों बेटे न तो उतने अनुभवी थे न समझदार व्यापार की समझ उनमें इतनी थी नहीं कुछ ही दिनों में उनका कारोबार चौपट हो गया मकान बिक गया दोनों बेटे किराये के छोटे से मकान में रहने लगे। तथा प्राइवेट में नौकरी करने लगे माँ को उन्होंने घर से निकाल दिया वो भीख माँगकर अपना पेट भरने लगी। 
लेकिन सभी बुजुर्ग सोमनाथ जैसे नहीं होतः उनका बुढ़ापा नर्क जैसी यातना को सहते हुए गुजरता है जिसका छुटकारा उनकी मौत होने पर ही होता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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