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व्यंग्य: मोह से जुड़े रिश्ते

रिश्ते दो तरह से जुड़ते हैं एक तो स्वार्थ पर आधारित होता है। दूसरा रिश्ता मोह जनित होता है। मोह को कोई गुण नहीं कहा गया नही उस को अच्छा कहा गया पहले के मनीषियों ने मोह को व्याधि का मूल कहा है यदि कहा जाए कि सारी बुराई पाप मोह के कारण भी होते हैं। तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
कहते हैं कि यदि अंधा मोह नहीं होता तो पिता के सौ पुत्र युद्ध में नहीं मारे जाते पिता को पुत्र से मोह था और पुत्र को राज्य से कर्ण को मित्र से। इस मोह के कारण इंसान न तो भले बुरे का विचार करता है न ही परिणामों की परवाह करता है। मोह के कारण व्यक्ति पक्षपात करता है सरासर अन्याय करता है। झूठ बोलता है नैतिकता अनैतिकता की भी उसे चिंता नहीं रहती। इसलिए काम क्रोध मद मोह को नरक के पंथ कहा गया है। इस मोह को छोड़ना आसान नहीं है। माया मोह का कारण होती है। मोह इंसान की सोच पर भी असर डालता है । कई परिवारों में देखा जाता है कुछ माता पिता मोह के कारण अपनी ही संतानों के साथ पक्षपेत करने लगते हैं। जो लाड़ला होता है उसके सौ गुनाह भी माफ कर दिए जाते हैं और जो उपेक्षित होता है उस पर लगे झूठे आरोपों को भी सच मानकर प्रताड़ित किया जाता है। कई माता पिता तो अपनी जायदाद से ही वंचित कर देते हैं जो अपनों के द्वारा भेदभाव का शिकार होता है उसके दुख दर्द की कोई सीमा नहीं होती राकेश के दो बेटे थे प्रकाश और आकाश प्रकाश के साथ वे भेदभाव करते थे और आकाश को चाहते थे उससे खूब दुलार करते थे। आठवी के बाद पिता ने प्रकाश को काम पर लगा दिया था और आकाश को छूब पढ़ाया लिखाया था उसकी हर जिद पूरी की थी उसने बुढ़ापे में माता पिता का साथ नहीं दिया जबकि प्रकाश ने आगे बढ़कर उनका साथ दिया। फिर भी प्रकाश अपने माता पिता से वो लाड़ दुलार नहीं पा सका जो आकाश को मिलता था। यह सब घटनाएँ हमारे आस पास ही घटित होती रहती हैं फिर भी इनका समाज पर कोई खास असर नहीं पड़ता। लोग फिर भी मोह को छोड़ नहीं पाते।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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