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व्यंग्य: ख़ुद को महान समझने वाले

कुछ दंभी खोखले घटिया दर्जे के लोग खुद को महान समझने की गलतफहमी पाल बैठते हैं यह लोग अपने सामने किसी की भी तारीफ बर्दाश्त नहीं कर सकते ये चाहते हैं कि सब इनकी तारीफ करें इसके लिए ये हर हद सू गुजर जाते हैं ये लोग कुछ खुशामदियों को अपने साथ रखते हैं जो इनकी जी भर कर झूठी तारीफ करते हैं। 
ऐसे खुशामदिए लोग इनसे अपना स्वार्थ हल करते रहते हैं इनका उनसे कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता जब तक इनका मतलब हल होता रहता है तब तक ये झूठी खुशामद करते रहते हैं। इनका झूठी तारीफ सुनकर दिमाग सातवे आसमान पर पहुँच जाता है ये खुद को महान समझने लगते हैं । पर कोई ऊँट पहाड़ से ऊँचा नहीं होता ऊँट अपने आपको भले सबसे बड़ा समझ ले लेकिन जब वो पहाड़ के नीचे आता है तब उसे अपने कद का अहसास होता है। पर पहाड़ से गुजरने के बाद फिर ये अपने आपको महान समझने लगते हैं। यह लोग झूठ बोलने में माहिर होते हैं अपनी झूफी महानता के किस्से सबको बढ़ चढ़कर सुनाकर दूसरों पर रौब गाँठने में इन्हें खूब मजा आता है। ऐसे लोगों की पीठ फेरते हो लोग इनकी बुराइयों का पुलंदा खोलना शुरू कर देते हैं । दिनेश एक जगह लोगों के बीच में अपनी झूठी महानता का बखान कर रहा था लोग भी उसकी बातों से प्रभावित हो रहे थे । तभी वहाँ पर सुरेश आ गया सुरेश उसकी सारी असलियत जानता था। सुरेश को देखकर दिनेश की बोलती बंद हो गई वो ज्यादा देर तक वहाँ नहीं रह सका और बहाना बनाकर वहाँ से चला गया उसके जाने के बाद लोग दिनेश की कही हुई बातों पर चर्चा करने लगे। जिसे सुनकर सुरेश ने दिनेश के कारनामों का चिठ्ठा खोलना शुरू किया तो लोग हैरत में पड़ गए सुरेश के आने के पहले जो लोग दिनेश को हीरो समझ रहे थे वो अब जीरो साबित हो गया था। सुरेश ने लोगों का भर्म दूर कर दिया था ।
सच बात तो यह है कि अच्छा बनने के लिए अच्छा होना पड़ता है। बुरे लोग आत्म प्रचार से कभी अच्छे नहीं बन सकते। फूल कभी किसी चे सामने अपनी प्रशंसा नहीं करता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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