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व्यंग्य: झूठी सहानुभूति जताने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके हितैषी बनने का दिखावा करते हो पर भीतर से वो आपका भला होते हुए देखना नहीं चाहते। कई बार यह हमें नुक्सान पहुँचाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं लेकिन कभी खुलकर सामने नहीं आते । ऐसे लोग हमारा बना बनाया काम बिगाड़कर फिर हमारे सामने झूठी सहानुभूति दिखाने आते हैं । अपनी खुशी को भीतर छिपाकर। फिर दुख प्रगट करते हुए सारी जानकारी प्राप्त करते हैं।
ऐसे लोग हमारे दोस्त भी हो सकते हैं। परिचित भी हो सकते हैं। हमारे निकट संबंधी भी हो सकते हैं जिनके बारे में हम सपने में भी यह नहीं सोच सकते कि यह ऐसे होंगे। यह हमारा सौदा फेल करा देंगे। रिश्ता तुड़वा देंगे दोस्त से झगड़ा करा देंगे सुलझते मामले को उलझा देंगे। अपने किए का इल्जाम दूसरों पर मढ़ देंगे। 
राकेश और मोहन दो दोस्त थे। राकेश के पास निजी मकान था मोहन किराये के घर में रह रहा था। राकेश इसी बात को लेकर उसकी खिल्ली उड़ाया करता था। औरों के सामने नीचा दिखाता रहता था। इससे तंग आकर मोहन ने एक फ्लेट खरीदने का विचार किया। फ्लेट देख भी लिया वो उसे समझ में भी आ गया उसका सौदा भी हो ही गया था। उस फ्लेट के विषय में मोहन ने राकेश को बता दिया। सुनकर राकेश ईर्ष्या की आग में जलने लगा उसने जब तक मोहन का सौदा फेल नहीं करा दिया तब तक दम नहीं लिया। जब उसका सौदा फेल हो गया तब उसे परम संतुष्टि मिली। फिर वो झूठी सहानुभूति जताने उसके पास पहुँच गया। और उसकी बेबसी का मज़ा लेता रहा। और अपनी हरकत पर मन ही मन खुश होता रहा। यह लोग किसी की शादी होने के पहले ही बनती बात बिगाड़ कर रिश्ता नहीं जुड़ने देते। सजन सिंह अपने बेटे के रिश्ते को लेकर बेटी वाले के घर गए साथ में वे अपने सगे रिश्तेदार को भी ले गए और उसी ने मौका देखकर कुछ ऐसी बात कह दी जिससे वो रिश्ता जुड़ नहीं पाया । सजन सिंह को पता ही नही चल पाया कि यह सब कैसे हो गया।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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