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व्यंग्य: हारने वाले की पीड़ा

चुनाव में जिनकी जीत होती है उनके तो जलवे ही निराले होते हैं पर जो चुनाव हार जाते हैं उनकी पीडा का बखान नहीं किया जा सकता है हारने वाला जिस दौर से गुजर रहा होता है इस विषय में सोचते ही दिल?काँप जाता है ।हार का अंतर अगर बहुत कम रहा हो तो हारने वाले की पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है । हारने वाला भी चुनाव में खूब खर्च करता है लगभग दीवालिया हो जाता है। जीतने वाला तो अपना खर्च वसूल कर ही लेता है। लेकिन हारने वाले के माथे पर तो सारा खर्च ही मढ़ जाता है।
रतन सिंह ने विधायक का चुनाव लड़ा था सुनते हैं कि टिकट के लिए उन्होंने पूरे पाँच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसके बाद पंरे दो महीने उन्होंने अथक परिश्रम किया पानी की तरह पैसा बहाया उनका हाईवे वाला ढाबा बिक गया दो बसें बिक गईं पूरी जमा पूँजी खर्च हो गई । उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा था ढोल ढमाके मिठाई सबकी व्यवस्था उन्होंने कर ली थी। मतगणना शुरू हुई वे दोपहर तक लीड बनाए हुए थे दोपहर बाद बराबरी पर आ गए आखिरी राउंड में आठ सौ मतों से पीछे रह गए। सारे सपने चकनाचूर हो गए कोई उनके पास नहीं रहा अकेले घर आए । दुख के साथ इस बात की उन्हें कसक थी कि उनका भरोसा उठ गया था लोगों ने किस तरह से उनसे रुपये ऐंठे थे और फिर विश्वासघात कर दिया था यह अखरने वाली बात थी। इसी तरह सोहनलाल रिटायर हो गए तो उनको लोगों ने सरपंच के चुनाव में खडा कर दिया उस चुनाव में उनका सारा फन्ड खर्च हो गया इसके बाद भी बीस लाख का कर्ज चढ़ गया था जिसके लिए उन्हें अपनी एक एकड़ जमीन बेचना पड़ी थी वे भी चुनाव हार गए थे और अब पछता रहे थे। उनका तो सारा ही फन्ड खर्च हो गया था। वो तो पुराने मकान तुड़वाकर नया मकान भी नहीं बनवा पाए थे खपरैल वाले घर में ही रह रहे थे। पेंशन से तो मकान बनवा नहीं सकते थे। उनका दुख तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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