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व्यंग्य: आगे निकलने की होड़

एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने आदमी का सुख चैन छीन लिया हैं अच्छा मकान है अच्छी नौकरी है सारे सुख साधन है। फिर भी व्यक्ति को संतोष नहीं है वो अपने सुखों से इतना सुखी नहीं होता जितना दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होता है।
किसी के पास सात लाख की कार है और कोई उसका परिचित पन्द्रह लाख की कार ले आया तो उसे अपने सात लाख की कार बुरी लगने लगेगी ऐसा रोहन के साथ हुआ जैसे ही उसके प्रतिद्वंदी रितिक ने पन्द्रह लाख की कार खरीदी वैसे ही रोहन की सात लाख की कार की खुशी दुख में बदल गई । उसकी पत्नी उससे ज्यादा दुखी रहने लगी उनका इम्प्रेशन डाउन हो रहा था। वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे। रोहन की इतनी आमदनी भी नहीं थी। फिर भी वे बैचेन थे ये कार खरीदे उन्हें छ़ महीने ही हुए थे। और अंततः यह हुआ कि वो कार उन्होंने चार लाख रुपये में बेच दी और बाइस लाख की कार वे ले आए अब रोहन का परिवार खुशी से फूला नहीं समा रहा था जबकि रितिक के यहाँ मातम पसरा हुआ था उन्हें अब अपनी पन्द्रह लाख की कार बुरी लगने लगी थी। इस प्रतियोगिता ने उन्हें गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया था। हम भौतिक वस्तुओं पर गर्व कर रहे हैं विलासिता के साधन जुटा रहे हैं और बेचैन होकर जिंदगी गुजार रहे हैं। यह लोग अपने बचपन के दिन भूल गए हैं जब दो कमरे के किराये के घर में वे सात लोग रहते थे पिताजी क्लर्क थे। वेतन कम था पर उनका गुजारा चल जाता था और वे सब बहुत खुश थे। आज रोहन के पास बाइस सौ वर्ग फिट का मकान था एक बच्चा था। डेढ लाख रुपया वेतन मिल रहा था। फिर भी वो दुखी था उसे डिप्रेशन था। जब साधनों की कमी थी । तब इंसान खुश था आज साधनों की बाहुल्यता है फिर भी आदमी खुश नहीं है। और न रह पाएगा उसके लिए उसे अपने मन में संतोष को रखना पड़ेगा तभी वो खुश रह सकता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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