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व्यंग्य: मोह का टूटना

हर घटना का वक्त निर्धारित होता है। उसी तरह हम भी लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह पाते। अक्सर हम जिस शहर में रहते हैं जिस मोहल्ले में रहते हैं जिस घर में रहते हैं उससे हमें मोह हो जाता है वहाँ रहने वालों से भी हमारा मोह होता है। उनमें से कुछ हमारे बचपन के साथी होते हैं। कुछ दोस्त होते हैं । कुछ रिश्तेदार जिनके बीच हम रहते हैं उनमें जो बिछड़ जाते हैं उनके बिछड़ने का हमें दुख होता है। सबसे ज्यादा पीड़ा हमें तब होती है जब हमारा प्रिय जन इस दुनिया को छोड़कर ही चला जाता है।
बेबालाल जी सेवानिवृत्त पोस्टमेन थे वे जिस शहर के रहने वाले थे वहीं उनकी नौकरी लग गई थी वे जिस मोहल्ले में रहते थे वहाँ आपस मे बहुत भाई चारा था वहाँ उनका पैतृक मकान था पूरा परिवार उसमें सुखपूर्वक रहता था बाबूलाल जी भी रिटायर होने के बाद वहाँ खुश रहते थे क्योंकि वहाँ उनके हम उम्र बहुत थे जिनसे उनकी मेल मुलाकात होती रहती थी उनके बच्चे आधुनिच सोच के थे उन्हें वो घर असुविधाजनक लगता था वे शहर की पॉश कॅलोनी में घर लेना चाहते थे पर इतने पैसे उनके पास नहीं थे उन्होंने पिताजी पर दवाब डाल कर वो पुशूतैनी घर बिकवा दिया जिस दिन उनका घर बिका उस दिन वे बच्चों की तरह फूटफूटकर देर तक रोते रहे जबकि उनके बेटे बहू बड़े खुश थे।घर बेचकर सब पॉश कालोनी में बंग्ला लेकर रहने लगे थे। बाबूलाल जी भी उनके साथ ही रह रहे थे पर यहाँ वे खुश नहीं थे उनका मोह नहीं टूट रहा था। यहाँ खामोशी रहती थी कोई किसी से वास्ता नहीं रखता था। वो जबसे आए थे तब से ही दुखी थे। उनकी पत्नी का निधन हो गया था उनसे कोई बात करने वाला नहीं था। धीरे धीरे उनकी जीने की इच्छा भी खत्म होती जा रही थी यह ऐसा दुख था जिसे वो साझा भी नहीं कर सकते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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