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व्यंग्य: अपमान का घाव

व्यक्ति सब कुछ भूल सकता है हर तरह का घाव भी भर सकता है । पर जो घाव अपमान से दिल को लगता हो वो कभी नहीं भरता उससे जो दर्द होता है वो भी किसी उपाय से बंद नहीं होता।जो अपने अपमान का बदला ले लेते हैं वे भी अपने अपमान को भूल नहीं पाते।
किसी का अपमान अगर सार्वजनिक रूप से किया जाए तो वो अत्यंत दुखदायी होता है। जो सबसे ज्यादा दर्द देता हैं । कुछअहंकारी लोग जो अपने सामने सबको कमतर समझते हैं । वे किसी का भी अपमान करने में जरा भी नहीं हिचकते ऐसे लोग तो अपमानित करके भूल जाते हैं लेकिन अपमानित व्यक्ति उस अपमान को कभी नहीं भूलता । जिनका ये अपमान नहीं कर सकते उसे ताने देते हैं या दूसरों को माध्यम बनाकर उनको अप्रत्यक्ष रूप से अपमानित करते हैं। अक्सर ये लोग अपने से छोटे कमजोर दुखी लाचार बेबस का सबसे ज्यादा अपमान करते हैं उसके सामने कभी इज्जत से पेश नहीं आते जो दबा हुआ होता है वो अपना अपमान चुपचाप सह तो लेता है पर उसे कभी भूल नहीं पाता। जो लोग अपमान का बदला नहीं चुका पाते वे बददुआ देते हैं रात दिन कोसते रहते हैं और जब संयोग से कुछ अप्रिय घटित हो जाए तो इसे अपनी बददुआ को फलीभूत मानकर ख़ुश हो लेते हैं।
दो सगे भाई थे बड़े भाई को पिताजी ने सब्जी बेचकर पढ़ाया था। उसकी नौकरी भी उन्होंने लगवाई उसी ने शादी के बाद अपने माँ बाप भाई बहन से मुँह मोढ़ लिया उनके रकम जेवर नगदी भी हजम कर गया। एक दिन उसने अपने छोटे भाई को अपमानित कर खूब पीटा छोटे भाई की पढ़ाई छूट गई थी और वो पिताजी के काम में हाथ बँटा रहा था वे अपने छोटे बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे अपने छोटे बेटे की बेरहमी से पिटाई को वे बर्दाश्त नहीं कर सके उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया ऐसी स्थिति में वे छत से गिर गए उनका दुखद अंत हो गया उनके निधन के बाद बड़े बेटे ने अपनी माँ और भाई तथा बहन को घर से निकाल दिया वो वहीं पास में किराये के घर में रहने लगा बड़ा बेटा सकारी नौकरी करता था रिश्वत से भी उसकी कमाई होती थी वो बड़े ठाठ बाट से रहता था। जब उसने अकारण छोटे बाई को पीटा तो उसकी माँ ने उसे बहुत कोसा उसे खूब बददुआएँ दीं। संयोगवश बड़े बेटे को लकवा मार गया और उसकी पत्नी को हार्ट अटेक आ गया। देखते ही देखते उसकी स्थिति भी दयनीय हो गई। इसे देखकर छोटा भाई तो पसीज गया पर उसकी पत्नी अपने जेठ को माफ नहीं कर सकी उसने कोसना बंद नहीं किया।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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