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फ़रवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य : खुली लूट

जबसे उच्च स्तर के कुछ विशिष्टों ने आम जनता के साथ खुली लूटा का मुद्दा उठाया है तबसे सोशल मीडिया पर यह सबसे बड़ी चर्चा का विषय भन जया है जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आम आदमी मुखर नजर आ रहा है बाकी अधिकाँश विशिष्ट लोग इस पर चुपूपी साथकर बैठे हुए हैं सोशल मीडिया चर यह भी चल रहा है कि टोल आम आदमी से ही क्यों वसंला जाए बाकी सभी लोगों से क्यों नहीं सक्षम होते हुए भी उन्हें ये छूट किस कारण से दी जा रही है। कोई यह भी कह रहा है कि जो करोड़ों के पर्स लाखों का पानी एक कप चाय अथवा कॉफी गटक रहें हैं वो भी दो सौ रुपये रोज की दिहाड़ी करने वाले मजदूर की गाढ़ी कमाई की जेब से निकला हुआ पैसा है। जो कुछ खास लोगों को करोड़ों रुपये के गिफ्ट दिए गए हैं वो भी आम आदमी के जेब से निकाले गए पैसे हैं। जो वैधानिक रूप से वसूले गए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण मोनो पाली है चार कंपनियों के हाथ में पूरा कारोबार है उन्होंने आपस में मिलकर रेट फिक्स कर लिए हैं आम आदमी के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया है। ऐसे ही पेनल्टी के नाम से सर्विस चार्ज के नाम से अनाप शनाप रुपये की वसंली भी आम आदमी का कचूमर निकाल रही है। उसके...

व्यंग्य : जज्बाती होने की सजा

आज के इस मतलबी संसार में जज्बाती लोगों को अपनी भावुकता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है कुछ ख़ुदगर्ज अपनी झूठी मज़बूरी का रोना रोकर उनको जज्बाती बना देते हैं फिर अपना मतलब हल कर के अलग हो जाते हैं विशेष कर कर्ज माँगने वाले अपनी मजबूरियों का ऐसा रोना रोते हैं कि सुनने वाले की आँखो में आँसू आ जाएँ। अपने हाव भाव और अभिनय से जब यह सामने वाले को पूरी तरह प्रभावित कर लेते हैं तब उसे कर्ज माँग लेते हैं भारी भरकम कर्ज लेने के बाद कर्ज अदा करना ही भूल जाते हैं जज्बाती लोग इन्हें बिना ब्याज के कर्ज देते हैं। ऐसे कर्ज को वो कभी अदा नहीं करते । और कभी खूब लड़ाई लड़ के संबंध ही खत्म कर लेते हैं। ऐसे लोगों में निकटतम रिश्तेदार भी शामिल होते हैं। दामाद ससुर सास साली बहनोई बहू कोई भी हो सकता है ये कर्ज लेने के बाद भूल जाते हैं। सामने वाला तकाजा कर कर के हार जाता है और चुप होकर बैठ जाता है। पर कर्जदार को इस पर कुछ असर नहीं पड़ता। किशन लाल की देहात में नौकरी थी वो शहर में आना चाहते थे। उनकी इस कमजोरी का लाभ एक शातिर दिमाज इंसान ने उठाया जो उनका अपना भाई थः। वो किशनलाल से डेढ़ लाख रुपये तबादला कर...

व्यंग्य : असफलता के बहाने

असफल इंसान के पास अपनी असफलता के बहानों की कोई कमी नहीं होती जबकि सफल इंसान के पास कोई बहाना नहीं होता असफल व्यक्ति अपनी असफलता का दोषी दूसरों को ठहराते है जबकि इसके सबसे बड़े दोषी वे खुद होते हैं। क्योंकि वे अनेकों अवसर गँवा चुके होते हैं । या वे आसानी से सब कुछ हासिल करना चाहते हैं ऐसे लोगों में धैर्य लगन की कमी होती है। इनकी निगाहों में बहुत से लोग होते हैं । जिन्हें वे अपनी असफलता का कारण बताते हैं।  रजनी ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की थी बी ए पास तो उसने प्राइवेट परीक्षा देकर किया था। दूसरी ओर उसके भाई आलोक को मँहगे निजी स्कूल में पढ़ाया गया था कोचिंग में भेजा गया पर वो दसवीं पास भी नहीं हो पाया था। और रजनी ने पी एस सी ब्रेच कर प्रशानिक अधिकारी का पद हासिल कर लिया था। उसके ऑफिस में चपरासी का पद खाली थी जिसके लिए आलोक ने आवेदन किया था। रजनी ने उसे टिप्स दिए इंदर व्यू की तैयारी कराई फिर भी उसका चयन नहीं हुआ तो आलोक ने इसे अपनी चूक नहीं मानी बल्कि रजनी को इसका दोषी ठहरा दिया। आलोक की बात सबने सच मान ली रजनी की बात पर किसी ने विश्वास नहों किया हारकर रजनी को सरकारी बँगले ...

व्यंग्य : झूठ की बुनियाद कहाँ

झूठ की बुनिया नहीं होती फिर भी वो मज़बूती से ज़मा हुआ दिखाई देता हैं। जबकि यह केवल हमारा भ्रम होता है। इतने बड़े से झूठ को एक छोटा सा सच गिराकर चकनाचूर कर देता है। फिर भी लोग झूठ को महत्व देते हैं और सच को झुठलाने का असफल प्रयास करते हुए नज़र आते हैं। झूठ की जुबान बड़ी तेज होती है झूठ बड़ी होशियारी से बहुत दिमाग लगाकर कहा जाता है झूठ कहने का तरीका बड़ा प्रभावशाली होता है उसके मुकाबले सच अधिकतर,ख़ामोश रहता है सच आपनी पैरवी झूठ की तरह नहीं करता न ही सच को किसी को मनवाने की जरूरत पड़ती है जबकि झूठ इसके बिना रह नहीं सकता। राजेश शहर में मज़दूरी करता था एक कमरे के घर में पत्नी बच्चों के साथ रहता था लेकिन सबको यही बताता थे कि वो जागीरदार परिवार से है गाँव में उसकी बहुत बड़ी हवेली है । पिताजी से अनबन होने के कारण वो यहाँ रह रहा है। लोग उसकी बात मान भी लेते थे । एक बार उसके गाँव का एक आदमी अनायास वहाँ आ गया। उसने राजेश की सारी असलियत लोगों को बता दी लोगों ने जब यह सच राजेश को बताया तो उसने उसे झूठा ठहरा दिया और यही उसकी गलती रही उसके सारे प्रयासों के परिणाम आखिर,उल्टे हुए और उसे अपनी झूठ...

व्यंग्य : अपमान के घूँट

मज़बूरी इंसान को इतना झुका देती है कि उसे अपने जीवन से नफ़रत होने लगती है। या फिर एसा व्यक्ति अपमान के कड़वे घूँट पीने का आदि हो जाता है विशेष कर कमजोर,तबके के लोग जो अत्यंत गरीबी में जीवन यापन कर रसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो रहा हो वो अपमान का कड़वा घूँट पी जाते हैं। कुछ जिम्मेदारियों के बोझ के तले दबे होते हैं वे भी अपमान को सहकर हँसते रहते हैं इसके अलावा और वे कर ही क्या सकते हैं। राकेश के पास लोडिंग ऑटो था। जिससे उसे अचछी खासी आय हो जाती थी परिवार की गुजर बसर आराम से चल रही थी । तभी राकेश बीमार हो गया पहले उसे टाइफाइड हुआ फिर पीलिया भी हो गया तीन महीने वो काम पर नहीं जा सका बीमारी के इलाज में उसका लोडिंग ऑटो भी बिक गया था। लेकिन सवाल पेट का था। गृहस्थी की जिम्मेदारी थी तभी किसी ने कहा कि बाबूलाल सेठ को कार के लिए ड्राइवर चाहिए। राकेश ने पन्द्रह हजार रुपये के वेतन पर वो नौकरी कर ली। साबूलाल जी का बर्ताव तो ठीक था बाकी उनके घर में सभी बददिमाग थे। उसने नौकरी तो ज्वाइन कर ली थी। पर इसके बदलें में उसे रोज अपमेन के घूँट पीना पड़ते थे। नौकरी छोड़ नहीं ...

व्यंग्य : भलाई का दंड

जब समाज का नैतिक रूप से पतन होने लगे तो भलाई किसी को अच्छी नहीं लगती यहाँ तक कि भला करने वाला लोगों को बुरा लगने लगता है। जबकि लोभी लालची मतलबी मुनाफाखोर किसी की मज़बूरी का फायदा उठाने वाले खूब फलते फूलते हैं और किसी को उन पर ऐतराज भी नहीं होता पर जो भला करता है वो सभी को खटकने लगता है। शिक्षच राधेश्याम जी को छात्रों के पासपोर्ट साइज के फोटो की आवश्यकता थी कोई फोटोग्राफर नहीं था सो उहह उन्होॅने अपने केमरे से फोटो खींचे और प्रिंट कराकर उनका उपयोग कर,लिया इसके उन्होंने बच्चों से कोई पैसे नहीं लिए। प्रिन्ट में तीस रुपये का खर्च आया था वो उन्होंने स्वयं वहन कर,लिया जबचि एक निजी स्कूल ने एक फोटो के पिचहत्तर रुपये लिए जो लोगों ने बिना ना नुकर के दे दिए। उनसे कुछ गरीब लोग फोटो बनवाने आते और वो दो रुपये में पासपोर्ट फोटो निकाल कर,दे देते थे। एक दिन एक स्थानीय फोटो ग्राफर उनके पास आया बोला सर,यह रेट गिराकर काम करना बंद करो नहीं तो ठीक नहीं होगा हमारे धंधे पर,असर पड़ रहा है। सर को बाद में पता चला कि अगर,उन्होंने काम बंद नहीं किया तो उन्हें पॉक्सो एक्ट के केस में फँसाने की तैयारी ...

व्यंग्य : मुफ्त खोर

व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाकर मुफ्त खोरी करने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। ये दूसरों की कमाई पर मौज करते हैं । निर्माण कार्य,में लगे मज़दूर को दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद ढाइ सौ रुपये मिल रहे थे।पता चला कि उसके मजदूरी चार सौ रुपये थी ।उसके डेढ़ सौ रुपये कोई और हड़प रहा था। उसके पास ऐसे चालीस मजदूर थे जिनसे उसे रोज के छः हजार रुपये मिल रहे थे। बाकी चार,लाख रुपये उसने पन्द्रह प्रति शत मासिक की दर से कर्जे पर भी बाँट रखे थे जिनका प्रतिमाह ब्याज साठ हजार रुपये मिल रहा था। वो कोई काम नहीं करता था दिन भर स्क्रापियो में घूमता रहता था मजदूरों की निगाह मेः वो बड़ा आदमी था । इस तरह के मुफ्तखोर आपको हर,क्षेत् में मिल जाएँगे एक ने अपने परिचित से कहा कि मुझे प्लॉट खरीदना है। उसने एक प्रापर्टी डीलर के पास भेज दिया । प्लॉट बाइस लाख का था इसके उसे चवालीस हजार रुपये बिना कुछ किए धरे ही मिल गए। कुछ लोग सामान खरीदवाने के लिए दुकान पर ले जाते हैं बाद में दुकानदार से मोटी रकम वसूल लेते हैं। एक स्थान पर किसी ने कार खड़ी की सिर्फ जरा सी देर के लिए। जबकि वो कोई पार्किंग वाली जगह ...

व्यंग्य : चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले

कुछ लोग बड़े चालाक चतुर,चपल होते हैं वे किसी की खूब झूठी तारीफ करके उसे फुलाकर कुप्पा बना देते हैं जिससे वो अपनी औकात भूल जाता है फिर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करते हैं चने का ऐसा झाड़ तो नहीं मिलता जिस पर कोई आदमी चढ़ सके। लेकिन जो फूल कर,अपनी औकात भूल जाता है वो ऐसा मिटता है जिसका सँभलना मुश्किल हो जाता है। हाट बाजारों में अगरबत्ती के पैकेट से रुपये निकालने का झाँसा देने के लिए वे ठग अपने आदमी को पैकेट बेचकर मोटी रकम दिदलवा देते हैं उसके धोखे में तमाशबीन अगरबत्ती के पैकेट खरीदते चले जाते हैं लेकिन उन्हें,एक धेला भी नसीब नहीं होता। किसी को चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसा करते हैं। जिसका शिकार बनने वाला बेबस होकर रह जाता है। दंसरी ओर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मनोबल गिराकर उसकी भविष्य की संभावनाओं पर कुठाराघात करते हैं। यह किसी इंसान की योग्यता और कार्यक्षमता देखकर उससे जलन रखने लगते हैं। ऐसा इंसान अगर कोई स्टार्ट अप शुरू करना चाहे तो यह उसका मनोबल बुरी तरह तोड़कर रख देते हैं जिससे उसकी उन्नति के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। य...

व्यंग्य : फ़ुरसत से परेशान

एक ओर जहाँ लोग काम की अधिकता से हैरान है दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो फ़ुरसत से परेशान है उनके पास करने को कोई काम ही नहीं है वे काम करना चाहते हैं पर उनको समझ में ही नही आता कि वे क्या काम करें उनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो पहले काम के बोझ से लदे हुए थे वे चाहते थे कभी उनके पास भी फुरसत ही फुरसत हो। जब उन्हें फुरसत मिली तो कुछ दिन तो वे बड़े खुश रहे फिर वो फुरसत उनकी परेशानी का कारण बन गई अब वे काम करना चाहते हैं पर कोई उनसे काम कराना ही नहीं चाहता। राकेश एक दुकान पर काम करता था वो अपने काम में माहिर था लेकिन उसका व्यवहार सही नहीं था दो और काम करने वाले थे उन्हें वो परेशान करता था। कहता था सारा काम में ही तो करता हं यह दो करते ही क्या हैं। दुकानदार,ने उसे सबक सिखाने के लिए एक दिन कहा आज से राकेश कोई काम नहीं करेगा बस यह दुकान पर,आएगा और चुपचाप बैठा रहेगा इसे बैठे रहने की तनख्वाह मिलेगी राकेश को पहले तो खूब खुशी हुई बाद में वो फुरसत से परेशान हो गया। आखिर उसने काम के लिए मिन्नतें कीं माफ़ी माँगी तब कहीं उसे काम सौंपा गया। ऐसा ही लाभमल जी के साथ हुआ उनकी दुकान ऊनके बेटे नरेन्...

व्यंग्य : सफेदपोश लुटेरे

अधिक व्याख्या करने की आवशूयकता नहीं जो थोड़े भी समढदार हैं वो अच्छी तरह से जानते हैं कि सफेद पोश लुटेरे कौन है। जितने भी हैं वे सबसे अधिक प्रभाव शाली है। वे आम आदमी का सब कुछ बिगाड़ सकते हैं पर,आम आदमी उनका बाल बाँका भी नहीं कर सकता। अखबार में खबर आई कि सरकार ने डी ए डी आर बढ़ा दिया है अभी इसके आदेश भी नहीं हुए हैं कि एक होल सोल एजेन्सी वाले ने अपनी वस्तु के दाम बढ़ा दिए उसने बढ़ाए तो फुठकर वालों ने भी बढ़ा दिए एक आम आदमी ने पूछा कल के भाव में और आज के भाव में ये अंतर कैसा उसने कहा सरकार ने भी तो डी ए डी आर बढ़ा दिया है। आम आदमी ने कहा अभी कहाँ बढ़ाया अभी तो घोषणा की है ।आदेश जारी होने के बाद बढ़ेगा वो बोला हमें इससे कोई मतलब नहीं लेना है तो लो नहीं तो आगे बढ़ो आम आदमी बोला डी ऐ डी आर का लाभ तो सरकारी वेतन भोगियों को मिलेगा मैं तो मजदूर हूँ मेरी मजदूरी थोड़ी बढ़ी है। इस पर,उसने कहा आगे बढ़ो मेरे पास फालतू समय नहीं है। वो आम आदमी हर दुकान पर गया पर सब पर भाव बढ़े हुए थे इसका कारण यही था कि सबका होलसोल डीलर एक ही था उसने भाव बढ़ाए तो सबका भाव बढ़ाना स्वाभाविक था यह आम आदमी के सा...

व्यंग्य : साधारण होने का सुख

जो चकचौंध की असलियत जानते हैं वे साधारण होना पसंद करते हैं वे अपनी इच्खा से साधारण जिंदगी जीते हैं उनकी कोई बड़ी महत्वाकाँक्षा नहीं होती। वे जानते हैं साधारण होने का सुख कुछ अनोखा ही है। साधारण आदमी को जीवन जीने की सरलता मिली होती हृ वो खास लोगों को कभी नहीं मिलती। पंडित बृजबिहारी कभी साधारण व्यक्ति थे छोटे से आयोजनों में शामिल होते थे। एक बार उनके कुछ शिष्यों के कहने से उन्होंने भगवत कथा सुनाई । उससे जो उनका कथा वाचन करने का क्रम शुरू हुआ तो फिर वो कभी बंद नहीं हुआ। कभी घर के लिए भरपेट भोजन नहीं जुटा पाते थे । मकान का किराया देना मुश्किल होता था ।बहुत कम दान दक्षिणा मिलती थी लेकिन भागवत कथा के वाचन ने उनकी जिंदगी बदल कर रख दी। खूब पैसा मिला पहले लाखों में अब करोड़ों में बहुत बड़ा आश्रम बनाया। लाखों शिष्य बनाए पाँट सौ करोड़ का बैंक बेलेंस और अरबों की पार्पटी आज उनके पास प्राइवेट जेट है। अच्छा प्रभाव है ऊँची राजनैतिक पहुँच है। नौकर चाकरों की फौज है। बॉडी गार्ड हैं। सुख साधन संपन्नता तो है पर आजादी पूरी तरह छिन गई है। वे बिना अंगरक्षक के कहीं आ जा नहीं सकते। सार्वजनिक जगह पर साधारण...

व्यंग्य : पीठ फेरते ही बुराई करने वाले

 कुछ,लोग की बोली में जितनी मिठास होती है उससे अधिक उनके मन में कड़वाहट भरी रहती है अगर किसी के सामने उसकी जब जी खोलकर ख़ूब तारीफ करते हैं तो वो यही समझता है कि इनसे बड़ा और कोई शुभचिंतक हो ही नहीं सकता । लेकिन ऐसे लोग पीठ फंरते ही कड़वा मुँह बनाकर,ऐसी बुराई करते हैं कि अगर वो सुन ले तो उसके तन बदन में आग लग जाए। यह सामने बुराई करने की हिम्मत नहीं कर सकते । एक ऑफिस में निरीक्षण के समय छोटे साहब बड़े साहब अपनी अधीनस्थ मेडम रंजना की खूब बुराई कर रहे थे। बड़े साहब यही समझ रहे थे कि इनके बीच में मन मुटाव होगा। वे बुराई करते हुए थक भी नहीं रहे थे बड़े साहब के सामने उन्होंने मेडम को नकारा बददिमाग और,लापरवाह घोषित कर दिया तभी अचानक रंजना मेडम आ गई उन्हें देखकर वे पहले तो सकपका गए फिर उन्होंने रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे दी। अब वे रंजना मेडम की तारीफों के पुल बाँध रहे थे बड़े साहब उनको इतनी जल्दी पलटी मारते हुए देखकर चकित थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई इतनी जल्दी रंग भी बदल सकता है। ऐसे लोग कभी किसी के काम से संतुष्ट नहीं होते पर सामने अपने असंतोष को कभी जाहि...

व्यंग्य : धुन के पक्के

जो लोग धुन के पक्के होते हैं वे विपरीत परिस्थिति में भी मज़बूती से खड़े रहते हैं। जैसे मोती की तलाश में बहुत से लोग गहरे पानी मे खूब डुबकियाँ लगाएँ पस्त होकर,थक जाएँ उन्हें एक भी मोती नहीं मिले वे हारकर लौट आएँ लेकिन उनमें जो धुन का पक्का है वो अपनी खोज जारी रखे अंततः सफल होकर जब वो मुठ्ठी भर कर मोती लेकर लौटे तो यह उसके धुन के पक्के होने का प्रतिफल है जो उसी को मिला है इस प्रतिफल ने उसकी सारी मेहनत सार्थक कर दी है जबकि जो डाँवाडोल हो गए वे खाली हाथ लौट आए अपनी सारी मेहनत को निष्फल बनाकर। जो अस्थिर मति के लोग होते हैं वो कोई भी काम ठीक से नहीं करते इसके कारण वो बार बार मुँह की खाते हैं तथा हमेशा परेशानियों से घिरे रहते हैं इनके पास असफल होने के अनेकों कारण होते हैं अंत में यह अपनी किस्मत को दोष देकर शाँत हो जाते हैं फिर इनकी कुछ नया करने की मनोदशा भी नहीं रहती। राकेश पाँच भाई थे उनके पिताजी के पास दस एकड़ जमीन थी । पाँचों भाइयों की शादी हो गई थी।उनकी माँ के निधन पर,पिताजी ने सन्यास ले लिया था अपनी जमीन पाँचों भाईयों में बराबर बाँट दी थी सबको दो दो एकड़ जमीन मिली थी। राकेश को छोड़कर,च...

व्यंग्य : दिखावे की भलाई

वैसे तो जो स्वभाव से भले होते हैं वे हर हाल में भले बने रहते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं । जिनके अंदर छल कपट कूट कूट कर भरा होता है जो हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं मगर भलाई का दिखावा करने में सबसे आगू रहते हैं जहाँ उनका स्वार्थ हल करना होता है वहाँ ये शराफ़त की हद तक पार कर देते हैं । सामने वाले को जब तक पटकनी नहीं मिलती तब तक वो उन्हें दुनिया का सबसे भला इंसान समझता रहता है। जो लोग इनकी फितरत को जान जाते हैं । वो इन के फायदे की बात करके इनसे धन ऐंठते हैं फिर उसके अनुसार वे उन्हें लाभ भी पहुँचाते हैं जिसे देखकर उन्हें संतुष्टि मिलती है। एक ग्रामीण स्तर के कर्मचारी थे उन्हें अपना प्रमोशन लेना था उन्होंने साहब की निगाह में भले बनने के हर हथकण्डे अपनाना शुरू कर,दिए । साहब को पाँच हजार वर्ग फीट का भूखण्ड फार्म हाऊस के लिए खरीधना साहब उसके लिए पचास ,लाख रुपये देने को तैयार थे इन्होंने उन्हें दस हजार वर्ग फीट का भूखण्ड साठ लाख में दिलवा दिया तथा दस लाख रुपये की दलाली भी खा ली। साहब को इसकी भनक भी नहीं लग पाई साहब की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था साहब के मित्र सी एम ओ साहब थे।...

व्यंग्य : क्रोध किया ही क्यों

अक्सर क्रोध के कारण जो अपना काम बिगाड़ लेते हैं । बाद में उन्हें ख़ूब पछतावा होता है । तब वे सोचते हैं आखिर उन्होंने क्रोध किया ही क्यों शाँत रहकर भी तो बात की जा सकती थी । तब काम बिगड़ने की नौबत ही नहीं आती। क्रोध करने वाला अपनी आदत से मज़बूर होता है वो दूसरों का पक्ष सुनना ही पसंद नहीं करता उसकी निगाह में उसको छोड़ कर सब गलत होते हैं।  रवि अपने गुस्सैल स्वभाव से खुद ही परेशान था। गुस्से में वो किसी का लिहाज नहीं करता था। खूब जली कटी सुनाए बिना उसे चैन नहीं पड़ता था। एक साल में तीन बार उसे किराये का मकान बदलना पड़ता था तीन महीने से ज्यादा उसकी किसी मकान मालिक से नहीं निभती थी। आखिर लड़ाई हो ही जाती थी। जिसके नतीजे में उसे मकान खाली करना पड़ता था। पन्द्ह साल में दस जगह वो नौकरी कर चुका था कोई उसकी बात अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाता था । ऐसे लोग बार बार ठोकर खाते हैं । इनका गुस्सा बुरा ही हुआ करताहै इस बात को अच्छी तरह जानते हुए भो यह गुस्सा करने से कभी बाज नहीं आते। आत्म सम्मान सबका होता है कोई अपना अपमान सार्वजनिक रूप से सहन नहीं कर सकता। ऐसे लोग जब क्रोध में क...

व्यंग्य : भ्रष्टाचारी का रिटायर मेन्ट

जो भ्रष्टाचार से खूब धन अर्जित कर रहा हो तनख्वाह से कई गुना अमदानी उसे रिश्वत से हो रही हो जिसका पूरा परिवार फिजूल खर्ची का आदी हो लाख दो लाख उड़ा देना उनके लिए मामूली बात हो वो रिश्वत खोर अपने बेटों सै कहे खूब खुले हाथ से पैसा खर्च करो। उसका रिटायर मेन्ट हो जाए तो उसकी और,उसके परिवार की क्या हालत होगी इसकी आप सहज ही कल्पना कर सकते हैंउ। ओ पी एस के अनुसार रिटायर मेन्ट के बाद पेंशन तनख्वाह की आधी मिलती है। भ्रष्टाचार से धन अर्जित करने के सारे अवसर खत्म हो जाते हैं। वो और उनका परिवार कई महीनों तक उस सदमे से उबर नहीं पाते कुछ का मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है कुछ गहरे अवसाद में चले जाते हैं। राजेश एक कमाऊ सरकारी विभाग में अधिकारी थे जहाँ बिना माँगे रिश्वत मिलती थी राजेश रोज अपनी जेबें भरकर रिश्वत के रुपये लाते थे उनके दो बेटे थे दोनों बेटे खुलकर पैसा उड़ाते थे वे महीने में पाँच से छृ लाख रुपये खर्ट कर देते थे। उनके पिताजी को तनख्वाह तो डेढ़ लाख रुपया महीना मिलती थी । घर का खर्चा पूरे पन्द्रह लाख रुपये में चलता था बाकी सारे पैसे रिश्वत से आते थे जिसमें उनका परिवार मौज करता था।...

व्यंग्य : सफलता के गलत मापदण्ड

जब गलत लोग गलत तरीकों से सफलता हासिल कर लेते हैं और सही लोग सही तरीके से प्रयास करने के बाद भी असफल हो जाते हैं तो ऐसा समाज के लिए अच्छा नहीं होता यह नैतिक रूप से पतनशील समाज की निशानी बन जाता है। जहाँ योग्यता को नकार,दिया जाता हो और,अयोग्य को उसका स्थान दिला दिया जाता है वहाँ के लोग कैसे होंगे उनकी सोच कैसी होगी इस का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे अयोग्य लोग योग्य,लोगों को पीछे धकेल कर आगे बढ़ जाते हैं। एक विभाग में लेखा विभाग के प्रभारी बड़े योग्य और,ईमानदार थे। पर उनके साहब भ्रष्ट थे। उनके कारण वे भ्रष्टाचार नहीं कर पा रहे थे। साहब ने कई झूठे आरोप लगाकर उनकी गोपनीय चरित्रावलि पर प्रतिकूल टीप लिखकर उनका डिमोशन करा दिया और उन्हें लूप होल में पटक दिया। उनके स्थान पर,एक अयोग्य,जो उनके जैसा ही भ्रष्ट था ।की सी आर अच्छी लिखकर उसका प्रमोशन करा दिया । अब वे दोनों मिलकर खुला भ्रष्टाचार कर रहे हैं उनसे लोग परेशान तो हैं पर उनका कोई बाल बाँका करने वाला नहीं है। क्योंकि उनका सुरक्षा कवच भ्रष्टाचार के घेरे से मजबूत है जब योग्य,ईमानदार को हटाया गया तो उसकी पैरवी करने वाला कोई नहीं ...

व्यंग्य : झगड़े के बाद

जब आपस में खूब गहरी दोस्ती रहती है तब किसी को उनकी भलाई बुराई का पता नहीं चलता इसका पता तो तब चलता है जब उनमें दुश्मनी ठन जाती है इसके बाद,उनका आमना सामना होता है फिर वे आपस में लड़ते हुए एक दूसरे की बुराइयाँ खुलकर बताते हैं,एक दूसरे की पोल पट्टी खोलते हैं तब लोग जान पाते हैं,इनकी असलियत क्या है। जिनमें दोस्ती गहरी होती है तथा दोस्ती की जड़ें मज़बूत होती हैं । उनमें थोड़ी बहुत नौंक झौंक होती रहती है कभी हल्की फुल्की तकरार भी हो जाती है फिर मान मनौव्वल से दोस्ती और मज़बूत हो जाती है। क्योंकि वे एक दूसरे के हितैषी होते हैं एक दूसरे का भला चाहते हैं इसलिए वे दोस्ती पर कभी आँच नहीं आने देते सबसे अधिक बुरी मतलबी की दोस्ती होती है। ऐसे लोग दोस्ती का हाथ तभी बढ़ाते हैं जब उन्हें अपना मतलब निकालना होता है मतलब निकलते ही ये फिर कभी किसी प्रकार का वास्ता नहीं रखते । कुसुम और सरोज में ऐसी ही दोस्ती थी कुसुम थोड़ी सरल और भावुक थी जबकि सरोज चपल चालाक तथा मतलबी कुसुम भी मेहनत मजदूरी करती थी तथा उसका पति हलवाई था। सरोज ने उसकी खूब चानलूसी कर के उससे गयारह हजार रुपये उधार ले लिए थे कुसुम के ...

व्यंग्य : मुझसा बुरा न कोय

अक्सर यह देखा जाता है कि जो लोग बुरे होते हैं वे सबको बुरा समझते हैं उनको किसी में कोई अच्छाई नज़र नहीं आती ऐसे लोग ज्यादातर,तनाव में रहते हैं उनको कभी को ई अच्छे मूड में नही देखता ज़माने भर की शिकायतों का इनके पास पुलिन्दा रहता है । इनके मुँह से कभी की तारीफ़ के दो बोल तक नहीं निकलते जैसा छल कपट छल,छिद्र,धोखा इनकी नस नस में भरा होता है वैसा यह सबमें समझते हैं। यह लोग अहसानफ्रामोश भी होते हैं कोई इनके लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा दे तब भी यह उसका अहसान नहीं मानते यह मतलब से वास्ता रखते हैं मतलब निकलने पर बिना आभार के यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते इनका साथ वो कहावतें पूरी तरह सही होती हैं जैसा करोगे वैसा भरोगे । करनी का फल तो भुगतना ही पड़ेगा जो लोग किसी के प्रति निष्ठा नहीं रखते उन पर कौन निष्ठा रखेगा। राकेश ऐसा ही इंसान था उससे उसके किसी परिचित ने कहा कि उसे मकान खरीदना है कोई बेचने वाला हो तो बताना। यह सुनते ही राकेश की आँखों में चमक आ गई उसने इसमें मोटी रकम वसूलने का मन बनाया। जबकि उस व्यक्ति ने इस पर बहुत अहसान किए थे पर राकेश सब कुछ भूल चुका था । अठ्ठाइस लाख का मकान उसने चौ...

व्यंग्य : विश्वासघाती

कहा जाता है कि जो विश्वासघाती होता हे वो पहले अपना विश्वास जमा देता है वो विश्वास किसी के दिल में इतनी गहराई से जमाता है कि सामने वाला सपने में भी यह नहीं सोच पाता कि यह कभी विश्वासघात भी करेगा । और यही उसकी सबसे बड़ी चूक होती है। वो विश्वास रखकर आश्वस्त हो जाता है विश्वासघाती यह अच्छी तरह से जनता है कि विश्वास को सिर्फ एक बार ही तोड़ा जा सका है। क्योंकि विश्वासघाती पर कोई कभी फिर से विश्वास नहीं करता। इसलिए वो तगड़ा अवसर ढूँढ कर ऐसा विश्वासघात करता है कि सामने वाले को कभी सम्हलने का ही मौका नहीं मिलता वो हक्का बक्का रह जाता है और विशूवासघाती विश्वासघात करके अपने संबंध हमेशा के लिए ख़त्म कर देता है। एक बहुत पुरानी घटना है पोस्ट ऑफिस में डाक सहायक की रिक्ति निकली थी। उस समय स्थानीय स्तर पर ही भर्ती हो जाती थी। दो मित्त थे जीतेन्द्र और,महेन्द्र जीतेन्द्र को इसकी खबर सबसे पहले चली उसके हायर सेकेण्डरी में बावन प्रतिशत अंक थे और महेन्द्र के छियालीस प्रतिशत। उसने यह बात महेन्द्र को बताई दोनों ने आवेदन तैयार किए जीतेन्द्र किसी कारण वश आवेदन जमा करने नहीं जा सका।उसने अपना आवेदन भी ...

व्यंग्य : अपनों की लूट

एक बुजुर्ग व्यक्ति कह रहे थे कि अपनी जीवन भर की कमाई को कौन लूटता है? फिर ख़ुद ही बोले सबसे पहले लुटेरे तो अपने वाले ही होते हैं जो बुढ़ापे में तुमसे तुम्हारी दुकान छीन लेते हैं। जमीन छीन लेते हैं मकान पर कब्जा कर लेते हैं इमोशनल ब्लेकमेल करके रकम जेवरात हथिया लेते हैं । पेंशनर की पैंशन छीन लेते हैं उसके लिए आपस में लड़ते हैं। ऐसा ही एक मामला एस डी एम साहब की कचहरी में पेश हुआ जिसमें बेटे बहू ने माँ की आठ एकड़ जमीन हथिया ली थी पूरा मकान हड़प लिया था माँ के लिए एक छोटी कोठरी छोड़ी थी उससे भी उसे बेदखल,करने की तैयारी चल रही थी। माँ को वो खाना भी नहीं देते थे माँ भीख माँगकर अपना पेट भर,रही थी और उसकी जमीन पर मौज करने वाले बहू बेटे पोते पोती पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। वे भाव शून्य संवेदना शून्य बने हुए थे किसी ने इसकी शिकायत एस डी एम साहब से कर दी तब उन्होंने पन्द्रह सौ रुपये की रेशि भरण पोषण के लिए बेटे से दिलवाने का निर्णय पारित किया। यह तो वो बात है जो सामने आ गई पर बहुत से मामले दबे हुए हैं किसी ने अपने ही घर में चोरी कर के बूढ़ी माँ के जेवर चुरा लिए हैं। एक बहू बेटे ने त...

व्यंग्य : चापलूसी की कला

आजकल चापलूसी ने भी कला का रूप धारण कर लिया है यह ऐसी कला है जिसके कारम मूर्ख भी विद्वानों के बीच में बैठता है।चापलूसी की चला के जाने बिना किसी का आगे बढना बहुत मुश्किल होता है अगर किसी के पास बड़ा पद नहीं है पैसा नहीं है। प्रभाव नहीं है राजनैतिक पॉवर नहीं है तो फिर वो कितना ही योग्य क्यों न हो वो आगे नही बढ़ पाएगा। इस चापलूसी की कला से जहाँ अयोग्य भी विद्वानों की श्रेणी में आ गए हैं तथा बिना योग्यता के पी एच डी हथियाए बैठे है। वहीं बिना इसके अनेक प्रतिभाओं का गला घुट चुका है उनकी संभावनाएँ पूरी तरह ख़त्म हो चुकी हैं। उन्हें नकार दिया गया है। और वे भी साधारण जीवन जीने को विवश हैं जो सभी सुख के साधन और सुविधाओं से वंचित हैं।  एक कार्यक्रम में ऐसे ही एक श्रेष्ठ कवि को किसी भले आदमी के कारण मंच हासिल हो गया जब उसकी बारी आई तो संचालक ने उसको इतना बेइज्जत किया कि वो इस बात पर,अफसोस करने लगा कि वो आखिर यहाँ आया ही क्यों।उसकी खूब हूटिंग कराई उसे कविता चोर तक कह दिया। क्योंकि वो एक आम आदमी था उसके पास कोई बड़ी नौकरी नहीं थी न ही उसे कभी कोई सम्मान मिला था आकाशवाणी दूर दर्शन से भी उसकी...

व्यंग्य: संघर्ष के मज़े

कहते हैं कि सफलता बिना संघर्ष के नहीं मिलती अगर बिना संघर्ष के सफलता मिलती होती तो उसे पाने में कोई आनंद ही नहीं होता यह संघर्ष ही हमे मजबूत बनाता है। यदि सर्कस के शेर को जंगल में छोड़ दिया जाए तो वो भूख से मर जाएगा क्योंकि पिंजरे में बंद रहकर,वो शिकार करना भूल गया है उसे शिकार करना नहीं आता क्योंकि उसे समय पर तैयार भोजन बिना शिकार किए ही मिलता रहा है और,इसका वो आदि हो चुका है। इसी तरह जो संघर्ष से सफलता पाते हैं। उनकी बात ही निराली होती है उनका व्यक्तित्व पूरी तरह संतुलित होता है वे जुझारू स्वभाव के साहसी होते हैं जो हर मुसीबत को पार करने भें सक्षम होते हैं। देखने में सुविधा भोगी संपन्न लोग बड़े अच्छे लगते हैं लोग उन्हें ख़ुश किस्मत वाला समझते हैं। पर जो घोर परिश्रम करके खूब भूख लगने पर खाना खाता है । उसे जो तृप्ति मिलती है। वो आराम तलब आदमी को मेवा मिष्ठान्न चा भोडन करने पर भी नहीं मिलती। खेतिहर मजदूर कुंजीलाल का लड़का किशन और जमींदार का लड़का रूपेश दोनो हम उम्र थे दोनों सेना में जाना चाहते थे। रूपेश ने इसके लिए कोचिंग की थी और,किशन के पिताजी उसे बारिश में चार महीने के लिए ...

व्यंग्य : परीक्षाएँ

परीक्षाएँ सिर्फ विद्यार्थी जीवन में ही नहीं होतीं इसके बाद भी परीक्षाएँ चलती रहतीं हैं जिनमें कुछ में तो वो पास हो जाता है और कुछ में फेल इसी आधार पर उसकी सफलताएँ असफलताएँ निर्धारित होती है। बहुत से ऐसे हैं जो परीक्षाओं से बचकर रहना चाहते हैं यह सोचकर वे न तो कोई परीक्षा देना चाहते हैं और न ही उनकी तैयारी करते हैं इसलिए उनके परिणाम उन पर असरकारी नहीं होते। यह तो सभी जानते हैं कि कोई परीक्षा आसान नहीं होती प्रायः सभी परीक्षाएँ कठिन होती हैं। उनके अच्छे परिणाण जितने आनंद दायक होते हैं उससे ज्यादा तनाव भरा परीक्षा का वक्त होता है और उसकी तेयारी में हमें अपने सुखों का त्याग करना पड़ता है। आशुतोष और,आशीष दोनों सगे भाई थे आशुतोष बड़ा  और आशीष छोटा आशुतोष पढ़ाई में तेज था आशीष फिसड्डी । आशुतोष टॉपर रहता तो आशीष जैसे तैसे पास हो जाता था। फिर भी आशीष माता पिता का चहेता था माँ उसे अपने से अलग नहीं करना चाहती थी आशुतोष ने आठवीं की परीक्षा मेरिट के साथ पास की थी हायर सेकेण्डरी स्कूल बीस किलोमीटर दूर था। वहाँ एडमीशन लेना कमरा किराये से लेना हाथ से खाना बनाना घर से अकेले रहना किसी बड़ी पर...

व्यंग्य : बेआवाज लाठी

पहले सयाने लोग कहा करते थे मूक पशुओं को अकारण मत सताओ किसी बेबस गरीब का दिल मत दुखाओ उनकी हाय अच्छी नहीं होती वे जो बददुआएँ देते हैं वे असर जरूर करती हैं ऐसा उनका मानना था। मगर,आजकल के ज्यादा पढ़ लिखे लोगों ने इसे वाहियात मानकर नकार दिया है ये भौतिक वादी लोग जो ईश्वर को भी नहीं मानते ये अहंकारी होकर मनमानी पर,उतर आते हैं । कमजोरों का शोषण करते हैं उनका हक छीनकर खा जाते हैं और ऐशो आराम की जिंदगी बसर करते हैं। यह कोई मेहनत का काम नहीं करते और जो मेहनतकश होते हैं उसे इतनी कम मजूरी देते हैं जिससे वे जीवित रह सकें और काम करने लायक बने रहें। कई बार,यह उनकी मजूरी का भुगतान भी नहीं करते। तब बेबस दुखी लाचार सिवाय बददुआएँ देने के और कुछ कर भी नहीं सकता है। जब ऐसे लोगों का अहंकार,टूटता है जब इन पर भारी विपदा आती है तब यह सताए हुए इंसान इसे कुदरत का दिया गया दंड मानते हैं वे इसे बेआवाज लाठी कहते हैं जिसकी मार तो तगड़ी होती है पर,इसमें आवाज नहीं होती इस लाठी का प्रहार किसने किया कहाँ से किया यह भी पता नहीं चलता है। तब यह सताए हुए लोग यह कहकर संतोष कर,लेते हैं कि इनको अपने किए की सजा मिल गई व...