सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: कहीं नाम न डूब जाए

जब किसी का जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता नाम बाद में रखा जाता है वही नाम उसकी पहचान बन जाता है वो अपने नाम से इतना अधिक जुड़ जाता है कि हमेशा अपना नाम ऊँचा रखने की कोशिश में लगा रहता है ।कोई भी मशहूर होता है तो नाम से ही होता है। और अगर बदनाम होता है तो वो भी नाम से ही होता है।
हर व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक उसकी यही सोच होती है कि वह कुछ ऐसा करे कि उसका नाम अमर हो जाए इसके लिए वो हर संभव प्रयत्न करता है । किसी की तारीफ भी नाम से होती है और बुराई भी नाम से नाम जब चलता है तो बहुत से काम तो नाम से ही हो जाते हैं कुछ लोग कहते भी हैं कि मेरा नाम ले देना तुम्हारा काम हो जाएगा। अखबारों में नाम भी यही सोचकर छपवाया जाता है कि लोग उनको याद रखें। लेकिन इस पर जरा गंभीरता से विचार करें तो समय बीतने के साथ नाम भी भुला दिए जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि बेटे से वंश चलता है पिता का नाम भी चलता है। पर कोई ऐसा विरला ही होगा जिसे अपने चौथी पीढ़ी के पूर्वज का नाम याद हो । क्षेत्र कोई भी हो नाम हमेशा के लिए नहीं होता। तभी तो आए दिन ऐसी खबरे आती रहती हैं कि अपने ज़माने के कई मशहूर गुमनामी की जिंदगी जी रहे होते हैं अंतिम समय में उनके पास गिने चुने लोग ही होते हैं। इसी तरह ऊँचा पद हासिल करने वालो का भी हाल होता है जब तक वे पद पर होते हैं तब तक उनकी बडी पूठ परख होती है। जैसे ही वे पद से हट कर भूतपूर्व हो जाते हैं तो उन्हें कोई पूछने वाला नहीं होता दुख में भी उनकी खबर लेने वाला कोई नहीं होता कई आए और चले गए कई आएँगे और चले जाएँगे और ये दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...