अक्सर ऐसा होता है । कि हम जिसके साथ रहते हैं उसके महत्व का हम आँकलन नहीं कर पाते हमे उससे उकताहट होने लगती है फिर हमारे उससे संबंध खराब होने लगते हैं। अगर वो हमारा आश्रित तो हम उसे बोझ समझने लगते हैं। कुछ तो यह तक कह देते हैं कि हराम की खा रहा है । जब खुद कमाकर खाएगा तब पता चलेगा कि कितनी मुश्किल से पैसा कमाया जाता है। डससे संबंध अधिक कटु हो जाते हैं तो इनका अंत तभी होता है जब कोई छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद उसकी अहमियत का पता चलता है। तब उसकी कमी खूब खलती है लेकिन फिर वो हमारी पहुँच से बहुत दूर हो जाता है।
रश्मि ने जब बी एस सी कर ली तो बी एड करने के लिए वो अपने भाई भाभी के पास बड़े शहर में आ गई। भैया भाभी और उनका एक वर्ष का बैटा था रिंकं भाई का थ्री बी एच के फ्लेट था। एक कमरा उसे रहने के लिए दे दिया गया। रश्मि पढ़ाई के अलावा घर के कामों में भी सहयोग करती थी उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उसके पापा उठा रहे थे भाई के यहाँ तो वो भोजन करती थी और रहती थी। बाजार से सामान भी खरीद कर वो लाती थी रिंकू की देखभाल भी करती थी। कभी कभी रसोई में भी हाथ बँटाती थी । फिर भी रश्मि की भाभी को ऐसा लगता था जैसे वो उन पर भार हो जबकि पिताजी इसके बदले भैया को रुपया देते थे। फिर भी भाभी को वो खटकने लगी थी। उसने भैया को उसके खिलाफ भडॠकाना शुरू कर दिया। । उनके संबंध बिगड़ने लगे रश्मि उनके ताने सुनकर तंग हो गई थी। वे उससे अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। जब रश्मि का उनके साथ रहना मुश्किल हो गया तब उसने अपने मम्मी पापा को सारी बात बताई। पापा ने रश्मि की खाने पीने रहने की पी जी में व्यवस्था कर दी जो वे बारह हजार रुपये रश्मि के भाई को देते थे वे पीजी में देने लगे । रश्मि के जाने के बाद पिताजी ने जब भैया को पैसे नहीं दिए तो भैया ने कहा पापा पैसे नहीं भिजवाए आपने पापा बोले कैसे पैसे जब बेटी रह ही नहीं रही तो किस बात के पैसे भैया। कुछ बोल नहीं सकी रश्मि के जाने के बाद सारे काम का बोझ भाभी पर आ गया। भैया ऑफिस से थके हुए घर आते तो उन्हें बाजार खरीदारी करने जाना पड़ता था। उधर रिंकू भी रो रोकर परेशान कर रहा था। आठ हजार रुपये महीने पर उन्होंने कामवाली बाई रखी बारह हजार रुपये बंद हो गए बीस हजार रुपये के घाटे के बाद भी वो परेशान थे घर का बजट चरमरा गया था। भैया भाभी को अब रश्मि की कमी खल रही थी उन्होंने खूब कोशिश की रश्मि फिर से आ जाए। पर रश्मि भाभी की याद कर सिहर उठती थी उसने साफ मना कर दिया था पी जी में वो आराम से आजादी के साथ रह रही थी और खुश थी। भाई भाभी के पास सिवाय पछतावे के कुछ नहीं बचा था। इसलिए हमें रिश्तों की कीमत करना चाहिए। हमारे साथ रहने वाले की अहमियत कम नहीं होती हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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